भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू०]    * महाराज मनुका इक्ष्वाकुके प्रति उपदेश *    ४९९


महाराज मनुका इक्ष्वाकुके प्रति, 'मैं कौन हूँ, यह जगत् क्या है'—यह बताते हुए देहमें आत्मबुद्धिका परित्यागकर परमात्मभावमें स्थित होनेका उपदेश

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— श्रीराम ! तुम्हारे वंशके आदिपुरुष इक्ष्वाकु नामक राजा जिस प्रकारके विवेकपूर्वक विचारसे मुक्त हो गये, उस विचारको तुम सुनो। अपने राज्यका परिपालन करते हुए इक्ष्वाकु नामक राजा किसी समय एकान्तमें जाकर अपने मनमें स्वयं यह विवेकपूर्वक विचार करने लगे कि 'बुढ़ापा, मृत्यु, क्षोभ, सुख, दुःख तथा भ्रमसे युक्त इस दृश्य-प्रपञ्चका हेतु क्या है।' इस प्रकार विचार करते हुए भी वे जब जगत्के कारणको न समझ सके, तब उन्होंने एक दिन ब्रह्मलोकसे आये हुए सभामें बैठे तथा पूजित हुए अपने पिता प्रजापति मनुसे पूछा।

इक्ष्वाकुने कहा— भगवन् ! आपकी दया ही आपसे पूछनेके लिये मुझे प्रेरित कर रही है। करुणानिधे ! 'यह सृष्टि कहाँसे आयी है, इसका स्वरूप कैसा है तथा कब किसने इसकी रचना की है ?' यह आप कहिये। भगवन् ! विस्तृत जालमें फँसे हुए पक्षीकी भाँति मैं इस विषम संसारजालसे किस प्रकार मुक्त हो सकूँगा ?'

मनु बोले— राजन् ! तुम्हारे अंदर सुन्दर विकासयुक्त विवेकका उदय हुआ है, तभी तुमने यह प्रश्न किया है। यह प्रश्न किया मिथ्या संसारजालका उच्छेद करनेवाला तथा सब प्रश्नोंका सार है। महीपते ! यह जो कुछ जगत् दिखायी दे रहा है, वस्तुतः कुछ भी नहीं है। यह आकाशमें प्रतीत होनेवाले गन्धर्वनगरकी भाँति तथा मरुस्थलमें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मिथ्या है। किन्तु जो अविनाशी परब्रह्म है, वही 'सत्' और 'परमात्मा' इत्यादि नामोंसे कहा जाता है। उस परमात्मारूप दर्पणमें यह दृश्यरूप जगत् प्रतिबिम्बकी तरह प्रतीतिमात्र है। इसलिये वस्तुतः संसारमें न तो किसीका बन्धन है और न मोक्ष है। केवल एकमात्र सब विकारोंसे शून्य ब्रह्म ही है। जैसे समुद्रमें एक ही जल अनेक तरङ्गोंके रूपमें प्रतीत होता है, उसी तरह एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही जगत्के अनेक रूपोंमें प्रतीत होता है। उस ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, इसलिये राजन् ! तुम द्वन्द्व और शोकसे रहित होकर निर्भय-पदरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाओ।

अज्ञानकी उपाधिसे युक्त जीव कर्मानुसार सुख-दुःख भोगते हुए अनेक योनियोंमें भ्रमण करते रहते हैं। किन्तु वास्तवमें सुख-दुःख और मोह आदि चित्तके धर्म ही होते हैं, आत्मामें नहीं। परमेश्वर न तो ग्रन्थोंके स्वाध्यायद्वारा और न गुरुके द्वारा ही दिखायी देता है, वह तो अपनी सुप्रसन्न-श्रद्धायुक्त पवित्र और स्थिर बुद्धिसे ही अपने आप दिखायी देता है। इसलिये जैसे मार्गमें राग-द्वेषरहित बुद्धिसे पथिक दौड़े जाते हैं, वैसे ही अपनी राग-द्वेषरहित बुद्धिसे ही इस अपनी इन्द्रिय आदिका अवलोकन करना चाहिये। अपनी बुद्धिमें देहादि पदार्थमात्रका दृश्य ही त्यागकर अपने अन्तःकरणको शान्तिमय बनाकर नित्य परमात्ममय हो जाओ। 'मैं ही देह हूँ' यह बुद्धि संसारमें फँसानेवाली है। इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको इस प्रकारकी बुद्धिको कभी नहीं अपनाना चाहिये। 'मैं सब पदार्थोंमें भी सूक्ष्मतर सच्चिदानन्दघन हूँ'— ऐसी जो निष्प्रपञ्च बुद्धि है, वह संसार-बन्धनसे छुड़ानेवाली है। जैसे केयूर, कड़े, कुण्डल आदि जाम्बूनदके भूषण सुवर्णके रूप ही हैं, वैसे इस प्रपञ्चके कार्यरूप जगत्का उपादान जो परमात्माका संकल्प होनेसे परमात्मा ही है। इसलिये अनात्म देहादि दृश्यसमूहोंमें आत्मभावका त्यागकर अन्तःकरणको वासनारहित करके, परमात्मामें अपना अनायास अखण्ड निवास हो। जैसे केवल जल-प्रवाह ही फेन, बुद्बुद और तरङ्ग आदिके रूपमें विभिन्न आकारोंमें दिखायी देता है, वैसे ही जगत् भी ब्रह्मरूप ही है।