भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 543
५००* अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सच्चिदानन्द ब्रह्म ही नाना प्रकारके आकारोंमें प्रकट होता है । वत्स ! तुम सङ्कल्परूपी कलङ्कोंसे रहित चित्तको परमात्मामें स्थापित करके कर्म करते हुए भी कर्त्तापनके अभिमानसे रहित, शान्त और सुखपूर्वक ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित हुए राज्य-पालन करो ।

जैसे चन्द्र, सूर्य, अग्नि, तप्तलोह एवं रत्न आदिके प्रकाश, वृक्षोंके पत्ते तथा झरनोंके कण कल्पित हैं, वैसे ही इस ब्रह्ममें जगत् तथा बुद्धि आदि भी कल्पित ही हैं तथा वही ब्रह्म जगद्रूप होकर अज्ञानियोंके लिये दुःखप्रद हो रहा है। अहो ! विश्वको मोहमें डाल देनेवाली यह माया कैसी विचित्र है, जिसके कारण संपूर्ण अङ्गोंमें भीतर और बाहर सब जगह व्याप्त परमात्माको यह जीव नहीं देख सकता । इसलिये अहंकारसे रहित निर्मल सात्त्विक अन्तःकरणसे 'सभी पदार्थ निराकार सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है'--ऐसी भावना करे । 'यह रमणीय है और यह रमणीय नहीं है'--इस प्रकारकी भावना ही तुम्हारे दुःखका कारण है। वह भावना जब सर्वत्र समदृष्टिरूपी अग्निसे जल जाती है, तब कहीं भी दुःखका नामोनिशान भी नहीं रह जाता । निर्वासनारूप अस्त्रसे प्रियाप्रिय-रूप विषमताको परम पुरुषार्थके द्वारा तुम स्वयं ही काट डालो । राजन् ! तुम निर्वासनारूप अस्त्रसे वासनारूप कर्म-वृक्षको काटकर सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर ब्रह्मभाव प्राप्तकर शोकरहित हो जाओ। पुत्र ! तुम सदसद्वस्तुके विवेकरूप विचारसे युक्त होकर समस्त कल्पनाओंसे रहित हो जाओ तथा समस्त विशाल भुवनोंको परमात्माके स्वरूपसे परिपूर्ण समझो । तदनन्तर जन्म-मरणरूप रोगसे रहित होकर परब्रह्म परमात्माके आनन्दका अनुभव करते हुए दीर्घकालतक स्थिर रहो और समता तथा शान्तिसे युक्त होकर निर्मथ चेतन ब्रह्मस्वरूप बन जाओ ।

( सर्ग ११७-११९ )


सात भूमिकाओंका, जीवन्मुक्त महात्मा पुरुषके लक्षणोंका एवं जीवको संसारमें फँसानेवाली और संसारसे उद्धार करनेवाली भावनाओंका वर्णन करके मनु महाराजका ब्रह्मलोकमें जाना

मनु महाराजने कहा-राजन् ! सबसे पहले शास्त्र और सज्जनोंकी संगतिसे अपनी बुद्धि शुद्ध और तीक्ष्ण करनी चाहिये । यही योगीके योगकी पहली भूमिका कही गयी है । इसका नाम 'श्रवण' भूमिका है। सच्चिदानन्द ब्रह्मके स्वरूपका निरन्तर चिन्तन करना 'मनन' नामक दूसरी भूमिका है । संसारके संगसे रहित होकर परमात्माके ध्यानमें नित्य स्थित रहना 'निदिध्यासन' नामक तीसरी भूमिका है। जिसमें वासनाका अत्यन्त अभाव है, वह ब्रह्म-साक्षात्कारसे अज्ञान आदि निखिल प्रपञ्चकी निवृत्ति करनेवाली 'विलापनी' नामकी चौथी भूमिका है। इस 'ब्रह्मवित्' पुरुषको संसार स्वप्नवत् प्रतीत होता है । विशुद्ध चिन्मय आनन्दस्वरूपकी प्राप्ति पाँचवीं भूमिका है । इस भूमिकामें जीवन्मुक्त पुरुष आधे सोये या जागे हुए पुरुषके सदृश रहता है। अर्धसुप्त पुरुषको संसारकी जैसी प्रतीति होती है, वैसी ही इस 'ब्रह्मविद्वर' जीवन्मुक्त पुरुषको होती है। छठी भूमिकामें एक विज्ञानानन्दघन परमात्माका ही अनुभव रहता है, संसारका अनुभव ही नहीं रहता । जैसे सुषुप्ति अवस्थामें मनुष्यको संसारकी प्रतीति नहीं होती, वैसे ही इस 'ब्रह्मविद्वरीयान्' योगीको जाग्रत् अवस्थामें भी संसारकी प्रतीति नहीं होती । इसे स्वसंवेदनरूप शान्तिमय 'तुर्यावस्था' कहते हैं । केवल विदेह-मुक्तिरूप अवस्था ही सप्तम भूमिका है। यह अवस्था समता, स्वच्छता और सौम्यतारूप है*। (इस


* शास्त्रसज्जनसम्पर्कैः प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् ।
प्रथमा भूमिकैषोक्ता योगस्यैव च योगिनः ॥
विचारणाद्वितीया स्यात्तृतीयाऽसङ्गभावना ।
विलापनी चतुर्थी स्याद्वासनाविलयात्मिका ॥
शुद्धसंविन्मयानन्दरूपा भवति पञ्चमी ।
अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवन्मुक्तोऽत्र तिष्ठति ॥