संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१० * अविच्छिन्नसंविदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अविद्यारूप वायुसे उत्पन्न सबसे बड़ा यह 'अहम्' नामक तरङ्ग है। उन-उन विषयोंमें चित्तके गिरनेके जो नाना प्रकार हैं, उनके हेतुभूत राग आदि दोष इस समुद्रके छोटे-छोटे कल्पित तरङ्ग हैं। ममता ही इसमें आवर्त है, जो स्वतः ही इच्छानुसार प्रवृत्त होता रहता है। इस समुद्रमें राग और द्वेष बड़े-बड़े मगर हैं, उन्हीं दो मगरोंसे मनुष्य पकड़ लिया जाता है और उसका निश्चय ही अनर्थरूपी पातालमें प्रवेश हो जाता है। यह प्रवेश किसीसे भी रोका नहीं जा सकता। भद्र ! प्रशान्त तथा अमृतरूप तरङ्गोंसे पूर्ण केवल आनन्दामृतके समुद्रमें ही प्रवेश करना चाहिये। व्यर्थ द्वैतरूप मकरोंसे पूर्ण लवणसागरके तरङ्गोंमें क्यों प्रवेश करते हो ?
प्रसिद्ध परमात्माका जो सूक्ष्म तत्त्व है, वह अज्ञानी लोगोंके लिये अज्ञानसे आवृत रहता है। इसलिये जैसे साधारण मनुष्यको जलमें स्थल और स्थलमें जलका भ्रम हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी मनुष्योंको अनात्मामें आत्माका और आत्मामें अनात्माका भ्रम हो जाता है। मित्र ! वास्तवमें न तो असद् वस्तुकी उत्पत्ति होती है और न सद् वस्तुका कभी अभाव होता है। केवल मायाद्वारा रचित चित्र-विचित्र रचनाओंके ये आविर्भाव और तिरोभाव होते रहते हैं। इसलिये प्रचण्ड बने हुए अज्ञानकी इस व्यामोह-शक्तिको विशुद्ध सत्त्वके बलसे जीतकर विश्वासयुक्त मनसे अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि साधनोंका अनुष्ठान करो। इसके अनन्तर ध्यान-समाधिके द्वारा अपने-आप ही परमात्माके शुद्ध स्वरूपका अनुभव करो, जिसके द्वारा अज्ञानसे आच्छादित तुम्हारी बुद्धिरूपी रात्रि दिनके रूपमें परिणत हो जाय। केवल पुरुष-प्रयत्नरूप कर्मोंसे महेश्वरकी कृपा प्राप्त होनेपर ही मनुष्य प्राप्तव्य वस्तु परमपदरूपी परमात्माकी प्राप्ति कर लेते हैं। भरद्वाज ! तुम अपने विवेकसे इस मोहका स्पष्टरूपसे त्याग कर दो। फिर तो तुम असाधारण परमात्माके यथार्थ ज्ञानको प्राप्त कर लोगे। इसमें संदेह नहीं है। पुत्र ! कामना और आसक्ति होनेपर शत्रुरूप हुए जिस पुण्यकर्मसे तुम्हें इस प्रकारका बन्धन प्राप्त हुआ है, कामना और आसक्तिसे रहित होनेपर मित्ररूप हुए उसी पुण्यकर्मसे ज्ञानके द्वारा तुम मोक्ष पा जाओगे; क्योंकि रागादि दोषोंसे रहित सज्जनोंका यह सत्कर्मोंका संवेग प्राणियोंके पूर्वजन्मके पापोंको नष्ट करता हुआ उनके त्रिविध तापोंको वैसे ही शान्त कर देता है, जैसे वर्षाका जलसमूह दावानलको ।
मित्र ! संसारचक्रके आवर्तरूपी भ्रममें यदि तुम भ्रमण करना नहीं चाहते तो सारे काम्य-कर्मोंको छोड़कर केवल ब्रह्ममें आसक्त हो जाओ । ब्रह्ममें प्रीति न होकर जबतक बाह्य विषयोंमें आसक्ति है, तभीतक विकल्पसे उत्पन्न हुआ यह सब जगत् दिखायी देता है। जैसे जलके तरङ्गयुक्त होनेपर ही समुद्र अपने तटकी ओर जाकर उससे टक्कर खा करके विक्षिप्त होता है, जलके निश्चल रहनेपर तो वह केवल जलरूप ही दिखायी देता है। इसी प्रकार ब्रह्ममें चित्तकी स्थिरता होनेपर केवल ब्रह्म ही दिखायी देता है। किंतु जैसे समुद्रकी तरङ्गोंसे तृण विचलित रहते हैं, वैसे ही जो हर्ष और शोकसे विचलित हो जाते हैं, वे लोग श्रेष्ठ नहीं माने जाते । सखे ! वह सारा जीवसमूह हर्ष-विषाद आदि अवस्थारूप झूलेपर निरन्तर आरूढ़ है। इसे राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह आदि रूप छः झूलोंमें झुलाकर काल क्रीडा करता है। अतः इसमें तुम खिन्न क्यों हो रहे हो ? इस तरह क्रीडा करनेवाला काल ही अनेक उपायोंसे एकके पीछे एक अनेक सृष्टियोंको उत्पन्न करता है, विनाश करता है, फिर तत्काल ही उत्पन्न करता है और फिर विनाश करता है। जब देवगण भी दुष्ट कालके पिण्डसे छुटकारा नहीं पाते, तब क्षणभङ्गुर विनाशशील शरीरोंकी तो बात ही क्या ! इसीलिये भरद्वाज ! अनेक तरङ्गोंसे युक्त इस जगत्को क्षणभङ्गुर देखकर ज्ञानी पुरुष तनिक भी