भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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निर्वाण-प्रकरण पू०] * भरद्वाज मुनिके प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा उपदेश * ५०९


भरद्वाज मुनिके उत्कण्ठापूर्वक प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा जगत्की असत्ता और परमात्माकी सत्ताका प्रतिपादन करते हुए कल्याणकारक उपदेश

श्रीभरद्वाजजीने पूछा—गुरो ! निश्चय ही श्रीरामभद्र तो परम योगी, सबके वन्दनीय, देवताओंके भी ईश्वर, जन्म-मरणसे रहित, विशुद्ध ज्ञानमय, समस्त उत्तम गुणोंकी खान, समस्त ऐश्वर्योंके आधार तथा तीनों लोकोंके उत्पादन, रक्षण एवं अनुग्रह करनेवाले थे । उन ब्रह्मानन्दसे परिपूर्ण पूर्णज्ञानी और विशुद्धबुद्धि रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामभद्रने मुनिवर वसिष्ठजीके द्वारा उपदिष्ट इस अति प्राचीन समस्त ज्ञानरूपी सारका श्रवण कर क्या और भी कुछ पूछा था ?

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! वसिष्ठ मुनिके वेदान्तशास्त्रके सङ्ग्रहरूप वचनोंका श्रवण कर अखिल विज्ञानोंके ज्ञाता कमललोचन श्रीरामभद्र अपने चिन्मय आनन्द-स्वरूपमें स्थित रहे । उस समय वे प्रश्न, उत्तर और विभाग आदि करनेकी पद्धतिसे उपरत हो गये थे । उनका चित्त आनन्दरूप अमृतसे पूर्ण था । वे चिन्मय और सर्वव्यापी होनेके कारण अपने मङ्गलमय स्वरूपमें ही समभावसे नित्य स्थित थे । अतः उन्होंने उस समय वसिष्ठजीसे कुछ भी नहीं पूछा ।

श्रीभरद्वाजजीने पूछा—मुनिनायक ! कहाँ तो मेरे-जैसे मूर्ख, स्तब्ध, अल्पज्ञ, पापी और कहाँ ब्रह्मा आदि देवता भी जिसकी आकाङ्क्षा करते हैं—उन भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी अपने स्वरूपमें स्थिति ! मुनीश्वर ! अहो ! मैं किस प्रकार परमात्मपदमें विश्राम पा सकूँगा और इस दुस्तर संसाररूपी महासागरके मोहरूपी जलसे किस प्रकार पार हो सकूँगा ? यह शीघ्र मुझसे कहिये ।

श्रीवाल्मीकिजी बोले—शिष्य ! श्रीवसिष्ठजीके द्वारा कथित आरम्भसे अन्ततक सम्पूर्ण राम-वृत्तान्त, मैंने तुमको सुना दिया, अब तुम अपनी बुद्धिसे पहले विवेकपूर्वक विचारकर पीछे उसका मनन करो । मैं भी इस विषयमें तुमसे जो वर्णन करने योग्य रहस्य है, उसे कहता हूँ, सुनो । भद्र ! यह जो यहाँ संसाररूप अविद्या-प्रपञ्च दीख रहा है, वह तनिक भी सत्य नहीं है। अर्थात् समस्त संसाररूप प्रपञ्च सर्वथा मिथ्या ही है । विवेकी पुरुष वास्तविक तत्त्वको विवेचनपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं, किंतु अविवेकी मनुष्य वाद-विवाद करते रहते हैं । प्रिय मित्र ! वास्तवमें सच्चिदानन्द परमात्मासे अतिरिक्त कोई वस्तु ही नहीं है अतः प्रपञ्चसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है ? मैं तुमसे आगे जो वेदान्तशास्त्रोंके रहस्य बतलाता हूँ, उनके अभ्याससे तुम अपने चित्तको परम विशुद्ध बना डालो।

मित्र ! यह जो संसाररूप प्रपञ्च दीखता है, इसके मूलमें भी सत्ताका अभाव ही है और इसके अन्तमें भी सत्ताका अभाव ही है । मध्यकालमें भी विचार करनेपर इसकी कोई सत्ता न होनेके कारण केवल प्रतीतिमात्र ही है । अतः विवेकी पुरुष इस संसारमें किसी तरहका विश्वास नहीं करते; क्योंकि अनादि वासनाके दोषसे ही यह असत् संसार दिखायी देता है । इसका गन्धर्वनगरके सदृश मिथ्या स्वरूप है और यह अनेक प्रकारके भ्रमोंसे भरा है। भद्र ! तुम चिन्मय कल्याणरूपी अमृत-लताका अभ्यास न कर विषय-वासनारूपी विषलताका आश्रय कर क्यों व्यर्थ मोहमें फँसे हो ? सखे ! यह समस्त जगत् न तो आरम्भमें है और न अन्तमें ही है । इसलिये तुम यह भी समझ लो कि मध्यमें भी यह है ही नहीं । इस जगत्का सारा वृत्तान्त स्वप्न-जैसा है। अज्ञानमूलक ये सारे भेद जलमें बुद्बुदोंकी तरह क्षण-क्षणमें उत्पन्न होते रहते हैं; और अज्ञानका नाश होते ही एकमात्र ज्ञानरूप समुद्रमें विलीन हो जाते हैं । अकेला अज्ञानरूपी समुद्र ही समस्त जगत्को व्याप्त करके स्थित है। इस समुद्रमें