भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका वर्णन * ५११


शोक नहीं करता। अतः तुम अमङ्गलस्वरूप शोकको छोड़ दो, कल्याणकारी वस्तुओंका विचार करो और विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माका चिन्तन करो। जो पुरुष देव, द्विज और गुरुओंके ऊपर परिपूर्ण श्रद्धा रखकर निर्मल चित्तवाले हो गये हैं और जो वेदादि सत्-शास्त्रोंमें विश्वासपूर्वक प्रामाण्य बुद्धि रखते हैं, उन पुरुषोंके ऊपर परमात्माका परम अनुग्रह होता है।

भरद्वाजजीने कहा—भगवन् ! आपके प्रसादसे मैंने पूर्णरूपसे ब्रह्म और जगत्का सारा तत्त्व जान लिया। वैराग्यरूप साधनसे बढ़कर दूसरा कोई बन्धु नहीं है और संसारकी प्रीतिसे बढ़कर दूसरा कोई शत्रु नहीं है। अब मैं महाराज वसिष्ठजीद्वारा समस्त ग्रन्थमें कहे गये ज्ञानरूपी रहस्यका सम्पूर्ण निचोड़ थोड़े शब्दोंमें सुनना चाहता हूँ। कृपाकर कहिये।

श्रीवाल्मीकिजी बोले—भरद्वाज ! मुक्ति देनेवाले इस महान् ज्ञानको तुम सुनो। इसके केवल सुननेसे ही तुम फिर संसाररूपी सागरमें नहीं डूबोगे। जो देव वास्तवमें एक होता हुआ भी ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि भेदोंसे अनेक प्रकारका होकर स्थित है, उस सच्चिदानन्द-रूप परमात्माको नमस्कार है। जब सारे प्रपञ्चका अपने कारणमें लय किया जाता है, तब जिस उपायसे परम तत्त्व प्रकाशित होता है, उस उपायको तुम्हें संक्षेपमें भूमिके अनुसार कहता हूँ। अपने अन्तःकरणमे तरङ्गरूपसे ही विचार करना चाहिये। इसीसे वह परमात्मा प्राप्त किया जा सकता है। उसके प्राप्त होनेपर पुरुष फिर शोक नहीं करता। सत्सङ्ग और सत्-शास्त्रसे प्राप्त विवेक-से वैराग्ययुक्त होकर पुरुषको उसी तत्त्वका बार-बार चिन्तन करना चाहिये। ( सर्ग १२७ )


श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका और भरद्वाजजीके द्वारा अपनी स्थितिका वर्णन, वाल्मीकिजी-द्वारा मुक्तिके उपायोंका कथन, श्रीविश्वामित्रजीद्वारा भगवान् श्रीरामके अवतार ग्रहण करनेका प्रतिपादन एवं ग्रन्थश्रवणकी महिमा

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! निषिद्ध कर्म, सकाम कर्म तथा विषयोंके साथ इन्द्रियोंके सम्बन्धसे जनित सुख-भोगसे रहित शम, दम और श्रद्धासे युक्त पुरुष कोमल आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको जीत करके तबतक ॐकारका उच्चारण करता रहे, जब-तक मन पवित्र और प्रसन्न न हो जाय। तदनन्तर अपने अन्तःकरणकी विशुद्धिके लिये प्राणायाम करे और उसके बाद विषयोंसे इन्द्रियोंको धीरे-धीरे खींच ले। देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और क्षेत्रज्ञ इनमें जिस-जिसकी जिस-जिससे उत्पत्ति हुई है, उस-उसको जानकर उन-उनके उपादानकारणमें उन सबको विलीन कर दे। पहले अपने-आपको चराचर विश्वमें अनुभव करे। इसके बाद सारे विश्वको अपने आत्माके अंदर अनुभव करे; फिर विवेकके द्वारा इसका भी अभाव करके केवल आत्मामें ही

सं० यो० व० अं० १८—

स्थित रहे। तदनन्तर प्रकृतिसहित जगत्के स्वरूपमें आत्मभावना करे। इसके पश्चात् परम कारणरूप चैतन्य निर्विशेष निराकार शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मामें आत्मभावना करे।

(अब देह, इन्द्रिय आदिमें जिसकी जिससे उत्पत्ति हुई है, उसका उसमें लय करनेका प्रकार बतलाते हैं—) अपने स्थूल देहके मांस आदि, जो पार्थिव भाग हैं उनका पृथिवीमें, रक्त आदि जो जलीय भाग हैं उनका जलमें तथा जो तैजस भाग हैं उनका अग्निमें विवेकके द्वारा विलय कर दे। व्यष्टि प्राणवायुका महावायु-में और आकाश-अंशका आकाशमें लय कर दे। अपने श्रोत्रेन्द्रियका दिशाओंमें और त्वगिन्द्रियका विद्युत्में लय कर दे। चक्षुरिन्द्रियका सूर्यमें तथा रसनेन्द्रियका उसके देवता वरुणमें (एवं घ्राणेन्द्रियका अश्विनीकुमारोंमें) लय

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