संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५१२ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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कर दे। समष्टि प्राणका वायुमें, वाणीका अग्निमें और हस्तेन्द्रियका इन्द्रमें लय कर दे। अपने पादेन्द्रियका विष्णुमें तथा गुदा-इन्द्रियका मित्रमें लय कर दे। उपस्थेन्द्रियका कश्यपमें लय करके मनका चन्द्रमामें लय कर दे। बुद्धिका ब्रह्मामें लय कर दे। मित्र ! इन्द्रियोंके रूपमें देवता ही स्थित हैं। इनका मैं तुम्हें तत्त्वोपदेश-द्वारा लय करनेका आदेश श्रुति-वाक्यको प्रमाण मानकर ही दे रहा हूँ। मैंने अपने मनसे किसी तरहकी कोई कल्पना करके इन अर्थोंको तुम्हारे सामने प्रकट नहीं किया है। इस तरह अपनी देहको उसके कारणमें विलीन करके 'मैं विराट् हूँ' ऐसा चिन्तन करे। (इसके बाद पूर्वोक्त क्रमसे परमात्मामें आत्मभावना करे।) सारे ब्रह्माण्डके भीतर जो यह सदाशिवरूप परमात्मा व्यापक है, वही सम्पूर्ण भूतोंका आधार तथा कारण कहा गया है। वही परमात्मा जगत्के व्यवहारमें यज्ञके रूपमें स्थित है।
(अब पृथ्वी आदि भूतोंके लयका क्रम बतलाते हैं—) योगीको चाहिये कि वह पृथ्वीका जलमें लय करके उस जलको फिर तेजमें लीन कर दे। तेजको वायुमें विलीन करके उस वायुको फिर आकाशमें विलीन कर दे और आकाशका समस्त भूतोंकी उत्पत्तिके कारणभूत महाकाशमें लय कर दे। योगी उस महाकाशमें एकमात्र लिङ्गशरीर धारण किये हुए स्थित रहे। वासनाएँ, सूक्ष्मभूत, कर्म, अविद्या, दस इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—इन सबको पण्डितलोग लिङ्गशरीर कहते हैं।* तदनन्तर वह योगी बाहर निकलकर वहाँ 'मैं शुद्ध आत्मा हूँ' यों चिन्तन करे। फिर वह बुद्धिमान् योगी सूक्ष्म और निराकार अव्याकृत प्रकृतिमें अपने लिङ्गशरीरको भी विलीन करके स्थित रहे। जिसमें यह समस्त जगत् रहता है वह अव्यक्त अव्याकृत (माया) नाम और रूपसे रहित है। उसीको कोई प्रकृति, कोई माया तथा कोई परमाणु एवं कोई अविद्या कहते हैं। उस अव्याकृतमें प्रलयकालमें सभी प्राणीपदार्थ लयको प्राप्त होकर अव्यक्त-रूपसे अवस्थित रहते हैं। जबतक दूसरी सृष्टि नहीं होती तबतक वे सभी प्राणी-पदार्थ परस्परके सम्बन्धसे शून्य तथा आस्वादसे रहित होकर उस अव्याकृत (प्रकृति) स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं और प्रलयके अनन्तर सृष्टिकालमें फिर उसी प्रकृतिभूत अव्याकृतसे सब उत्पन्न हो जाते हैं। सर्गके आदिमें प्रकृतिसे अनुलोम-क्रमसे सृष्टि होती है और प्रलयके आरम्भमें प्रतिलोम-क्रमसे प्रकृतिमें सारी सृष्टि विलीन हो जाती है। इसलिये जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनो अवस्थाओंसे रहित होकर अविनाशी तुरीय पदकी प्राप्तिके लिये ब्रह्मका ध्यान करे। पूर्वोक्त प्रकारसे लिङ्गशरीरको भी कारणमें विलीन करके स्वयं सच्चिदानन्द परमात्मामें प्रविष्ट हो जाय।
श्रीभरद्वाजजीने कहा—महाराज ! मैं अब लिङ्गशरीर-रूपी बेड़ीके बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो गया हूँ और सच्चिदानन्दका अंश होनेसे सच्चिदानन्द ब्रह्ममें प्रविष्ट हो गया हूँ। अंश और अंशीका वस्तुतः अभेद होनेके कारण अब मैं समस्त उपाधियोंसे रहित परब्रह्म परमात्मा ही हूँ। मैं कूटस्थ, शुद्ध और व्यापक हूँ। जैसे जलमें छोड़ा हुआ जल, दूधमें छोड़ा हुआ दूध और घीमें छोड़ा हुआ घी—सब-के-सब विनष्ट न होते हुए ही तद्रूप हो जाते हैं, किसी पृथक्रूपसे गृहीत नहीं होते, वैसे ही सर्वभावसे नित्य आनन्दस्वरूप सर्वसाक्षी, परम कारण चेतन परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट होकर मैं तद्रूप ही हो गया हूँ। नित्य, सर्वव्यापी, शान्त, सर्वदोषरहित, अक्रिय, शुद्ध, परब्रह्म परमात्मा मैं ही हूँ। पुण्य और पापसे रहित, जगत्का परम कारण अद्वितीय, आनन्दमय, अविनाशी और चिन्मयस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही मैं हूँ। इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त, प्रकृतिके सत्त्व, रज, तम—तीनों गुणोंसे अतीत, सर्वव्यापक और
* वासना भूतसूक्ष्माश्च कर्माविद्ये तथैव च ॥
दशेन्द्रियमनोबुद्धिरेतल्लिङ्ग विदुर्बुधाः।
(नि० पू० १२८ । १८-१९)