भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 556

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका वर्णन * ५१३

सर्वस्वरूप ब्रह्मका निष्काम भावसे अपने कर्त्तव्यका पालन करते हुए सदा ध्यान करना चाहिये । इस रीतिसे परब्रह्मविषयक अभ्यास करनेवाले पुरुषका मन ब्रह्ममें विलीन हो जाता है और मनके विलीन हो जानेपर उसे स्वयं ही अपने आत्मस्वरूपका अनुभव हो जाता है । आत्माका अनुभव होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका अन्त होकर आत्मामें आनन्दका अनुभव होने लगता है तथा आत्मा स्वयं ही अपने-आप अपने परमानन्द परमात्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है। तदनन्तर 'मुझसे अतिरिक्त कोई दूसरा सच्चिदानन्दमय परमात्मा नहीं है। मैं ही अद्वितीय परब्रह्म हूँ'—इस प्रकार हृदयमें परमात्माका अनुभव हो जाता है । गुरो ! आपके द्वारा कहा गया यह सब ज्ञान मुझे अवगत हो गया। मेरी बुद्धि सर्वथा निर्मल हो गयी । अब मेरा यह संसार चिरकाल-तक स्थिर नहीं रह सकता । भगवन् ! अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि ज्ञानियोंके लिये कौन-सा कर्म विहित है ? क्या उन्हें कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करना चाहिये और यदि करना चाहिये तो क्या केवल प्रवृत्तिरूप कर्मोंका ही अनुष्ठान करना चाहिये या निवृत्तिरूप कर्मोंका भी ?'

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—मुमुक्षु पुरुषोंको वही कर्म करना चाहिये, जिसमें कोई दोष नहीं हो, विशेष करके मुमुक्षुको काम्य और निषिद्ध कर्म कभी नहीं करना चाहिये । संकल्पोंसे रहित होकर जब जीवात्मा ब्रह्मके लक्षणोंसे युक्त हो जाता है, तब उसकी सभी इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं और वह सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मस्वरूप बन जाता है। 'देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे परे जो जीवात्मा है उससे भी परे जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है, वही मैं हूँ' इस प्रकार निश्चयपूर्वक जब जीवात्मा एकत्वभावसे ध्यान करता है, तब वह सदाके लिये मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है । जब जीवात्मा कर्तृत्व, भोक्तृत्व और ज्ञातृत्वसे तथा सम्पूर्ण देहादि उपाधियोंसे एवं सुख और दुःखोंसे रहित होता है, तब वह सर्वथा मुक्त समझा जाता है । जब जीवात्मा सम्पूर्ण भूतोंमें आत्माको तथा आत्मामें सम्पूर्ण भूतोंको अभेदरूपसे देखने लगता है, तब यह जीवात्मा संसारसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित होकर जब जीवात्मा तुरीय आत्मानन्द-रूपमें प्रवेश करता है, तब वह सर्वथा मुक्त समझा जाता है; क्योंकि शास्त्रोंके विवेकपूर्वक विचारसे, गुरुके वाक्योंका अर्थ और भाव यथार्थ समझनेसे तथा श्रवण, मनन, निदिध्यासनके अभ्याससे सब प्रकारसे सिद्धि प्राप्त होती है अर्थात् वह सदाके लिये मुक्त हो जाता है, यह वेदोंका आदेश है। इसलिये भरद्वाज ! तुम सब कुछ छोड़कर केवल ध्यान समाधिके लिये अभ्यासमें अपना मन तत्परतापूर्वक स्थिर करो । जब महामना साधु-स्वभाव श्रीरामचन्द्रजी अपने ब्रह्मरूपमें समाधिरथ थे, उस समय ऋषियोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजीसे श्रीविश्वामित्रजी कहने लगे ।

श्रीविश्वामित्रजीने कहा — ब्रह्मपुत्र महाभाग वसिष्ठजी! आप महान् हैं । आपने अपना गुरुत्व शीघ्र ही हमलोगोंको दिखला दिया; क्योंकि अपने दर्शन, स्पर्श और वाक्यप्रयोगसे जो कृपा करके शिष्यके शरीरमें शिव-स्वरूप परमात्मभावका समावेश करा दे, वही सच्चा गुरु है । गुरुवाक्य-श्रवणसे होनेवाले ज्ञानमें शिष्यकी श्रद्धा-पूर्वक पवित्र बुद्धि ही कारण है । यह ज्ञानकी प्राप्ति ही गुरु और शिष्यके समागमका वास्तविक प्रयोजन है । विभो ! आप तो परमपदमें स्थित हैं, परंतु हमलोग अभीतक यज्ञादि कार्योंमें लगे हुए हैं । बड़े कष्टके साथ जिसके लिये मैंने स्वयं राजा दशरथसे प्रार्थना की है और जिस उद्देश्यसे मैं यहाँ आपके पास आया हूँ, उस मेरे निर्विघ्न यज्ञसिद्धिरूप कार्यका स्मरण करते हुए आप श्रीरामचन्द्रजीको अब समाधिसे उठानेकी कृपा कीजिये । मुने ! मेरे उस समस्त कार्यको आप अपने शुद्ध मनसे व्यर्थ