भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


न बनाइये, क्योंकि भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके समाधिसे उठनेपर उनके अवतारके जो अन्य प्रयोजन, देवताओं और ऋषियोंके कार्य हैं, उनका भी हमलोग सम्पादन कर लेंगे। जब मैं श्रीरामचन्द्रजीको अपने आश्रममें ले जाऊँगा, तब वे राक्षसोंका नाश करेंगे और उसके बाद अहल्याको शापसे मुक्त करेंगे। तदनन्तर निश्चयपूर्वक भगवान् शङ्करका धनुष तोड़कर जनकदुलारी सीताके साथ अपना विवाह करेंगे। इस संसारमें पिता-पितामहके राज्यका त्यागकर वनवासके निमित्त वनमें पहुँचकर अभय और निःस्पृह श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंका वध करके दण्डकारण्यके निवासी मुनियो, अनेक तीर्थों तथा अन्यान्य प्राणियोंका उद्धार करेंगे। सीताहरणके निमित्त रावण आदिका वध करके श्रीरामचन्द्रजी इन्द्रके वरदानद्वारा युद्धमें मरे हुए वानर आदिको पुनर्जीवित हुए दिखलायेंगे। तदनन्तर साध्वी सीताकी अग्निमें प्रवेशके द्वारा शुद्धिके उद्देश्यसे भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अपने चरित्रकी आदर्शता दिखलायेंगे। जो लोग भगवान् श्रीरामका दर्शन करेंगे, उनके चरित्रका स्मरण तथा श्रवण करेंगे एवं जो लोग भगवान्‌के स्वरूपका दूसरोंको बोध करायेंगे, उन सम्पूर्ण अवस्थाओंमें स्थित अपने भक्तोंको भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जीवन्मुक्ति प्रदान करेंगे। इस प्रकार तीनों लोकोंका तथा मेरा भी हित इन महापुरुष भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा सम्पूर्णरूपसे सम्पन्न होगा। सज्जनो! आप सब लोग इन भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार कीजिये। इनके नमस्कारसे ही आपलोग सारे संसारको जीत लेंगे अर्थात् आपलोगोंको किसी दूसरे साधनकी आवश्यकता न होगी। आपलोग चिरकालतक बढ़ते रहें।

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! इस प्रकारका विश्वामित्रजीका भाषणरूप श्रीरामचन्द्रजीकी भावी चरित्ररूप दुर्लभ कथा सुनकर श्रीवसिष्ठ आदि सभी श्रेष्ठ योगीन्द्र तथा सिद्ध पुनः भगवान् श्रीरामकी चरणकमलरजके आदरमें यानी नमस्कारमें तथा उनके स्मरण में स्थित हो गये। जानकीपति श्रीरामकी भावी कथा सुननेसे भगवान् वसिष्ठजी तथा और दूसरे महर्षि भी तृप्त नहीं हो सके। इसलिये उन सबने दूसरोंके द्वारा 'कहे गये उन गुणसागर भगवान्‌के गुणोंका पुनः श्रवण किया तथा सुने हुए गुणोंका दूसरोंसे वर्णन किया। तदनन्तर महर्षि भगवान् वसिष्ठजी मुनिवर विश्वामित्रजीसे कहने लगे।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—मुनि विश्वामित्रजी ! इन श्रोताओंको आप साफ-साफ बतला दीजिये कि ये राजीवलोचन रघुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पूर्वमें देव या मनुष्य क्या थे।

श्रीविश्वामित्रजीने कहा—सज्जनो! आप सब लोग इन्हीं श्रीरामचन्द्रजीमें विश्वास कीजिये कि परमपुरुष परब्रह्म परमात्मा ये ही हैं। इन्होंने ही विश्वके कल्याणके लिये विष्णुरूपसे क्षीरसागरका मन्थन किया था। गूढ़ अभिप्रायसे भरे उपनिषदादि शास्त्रोंके तत्त्वगोचर साक्षात् परब्रह्म ये ही हैं। परिपूर्णपरमानन्द, समस्वरूप, श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित भगवान् विष्णुरूप यही श्रीरामचन्द्रजी जब भक्तिसे भलीभाँति प्रसन्न होते हैं, तब सब प्राणियोंको परम पुरुषार्थरूप मोक्ष देते हैं। कुपित होकर यही श्रीरामचन्द्रजी शिवरूपसे संसारका संहार करते हैं और यही ब्रह्मारूपसे विनाशशील संसारकी रचना करते हैं। यही विश्वके आदि, विश्वके उत्पादक, विश्वके धाता, पालनकर्ता तथा महासखा भी हैं। यही भगवान् ऋक्, यजु., सामवेदमय हैं, तीनों गुणोंसे परे अति गहन यही हैं और शिक्षा, कल्प आदि छः अङ्गोंसे समन्वित वेदात्मा अद्भुत पुरुष भी यही हैं। विश्वका पालन करनेवाले चतुर्भुज विष्णुभगवान् यही हैं, विश्वके रचयिता चतुर्मुख ब्रह्मा यही हैं और सारे संसारका संहार करनेवाले त्रिलोचन भगवान् शिव भी यही हैं। ये अजन्मा होते हुए भी