भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 558

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका वर्णन * ५१५


अपनी योगमायाके सम्बन्धसे अवतार लेते हैं। ये सबसे महान् हैं। ये सदा जागते रहते हैं और रूपरहित हुए भी ये विश्वरूप हैं। ये भगवान् ही इस विश्वको अपने संकल्पसे धारण करते हैं। ये राजा दशरथजी धन्य हैं, जिनके पुत्र परमपुरुष परमात्मा हुए। वह दशग्रीव रावण भी धन्य है, जिसका ये अपने चित्तसे चिन्तन करेंगे। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले विष्णुभगवान् ही श्रीरामचन्द्रजीके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। ये ही श्रीरामचन्द्रजी सच्चिदानन्दघन अविनाशी परमात्मा हैं। अपनी इन्द्रियोंको रोक रखनेवाले योगीलोग ही श्रीरामचन्द्रजीको वस्तुतः जानते हैं। हमलोग तो इनके इस सगुण साकार स्वरूपका ही निरूपण या दर्शन करनेमें समर्थ हैं। वसिष्ठजी! हमलोगोंने ऐसा सुना है कि ये ही भगवान् श्रीरामचन्द्रजी रघुवंशके पापोंका सर्वथा विनाश करनेवाले हैं। अब आप कृपाकर इन्हें व्यवहारमें लगाइये।

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज! यों कहकर महामुनि विश्वामित्रजी चुपचाप बैठ गये। तदनन्तर महातेजस्वी वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीसे कहने लगे।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—चिन्मय महापुरुष महाबाहु श्रीराम! यह विश्रामका समय नहीं है। उठो और इस संसारके लिये आनन्दकारक बनो। पुत्र! विनाशशील राज्य कार्योंका अवलोकन करके देवताओं और मुनियोंको संकटसे उद्धार करनेके भारका वहन करो और सुखी रहो।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! गुरु वसिष्ठजीके उपर्युक्त वचनोंको सुनकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी समाधिसे सचेत हो गये और सावधान होकर कहने लगे।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—महामुने! वेदों, आगमों, पुराणों और स्मृतियोंमें भी गुरु-वाक्यका पालन करना ही विधि कहा गया है और उसके विरुद्ध आचरण करना निषेध कहा गया है। यों कहकर उन महात्मा वसिष्ठजीके चरणोंमें अपने सिरसे नमस्कार कर सबके आत्मस्वरूप करुणासागर श्रीरामचन्द्रजी सबसे बोले—'सभ्य पुरुषो! आप सब लोग हमारे इस निर्णयको अच्छी तरह सुन लीजिये। इससे आपलोगोंका बड़ा कल्याण होगा। कल्याणकामी पुरुषके लिये इस संसारमें परमात्मज्ञान तथा परमात्मज्ञानी गुरुसे बढ़कर कुछ भी नहीं है।'

सिद्ध आदि सब लोगोंने कहा—श्रीरामचन्द्रजी! आप जैसा कह रहे हैं, वैसा ही आपकी दयासे हमलोगोंके मनमें पहलेसे ही स्थित है और अब तो वह सब आपके इस संवादसे और भी विशेष दृढ़ हो गया है। महाराज श्रीरामचन्द्रजी! आप सुखी होइये, आपको नमस्कार है। अब हमलोग वसिष्ठजीसे भी अनुमति लेकर जहाँसे आये थे, वहीं जा रहे हैं।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! यों कहकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुति करते हुए वे सब-के-सब चल दिये। श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर पुष्पोंकी वृष्टि होने लगी। श्रीरामचन्द्रजीकी यह सब कथा मैंने तुमसे कह सुनायी। इसी क्रमयोगसे तुम भी साधन करते हुए सुखी रहो। मुनिवर वसिष्ठजीकी वचन-पंक्तिरूपी रत्नमालासे विभूषित यह जो श्रीरामचन्द्रजीकी कथा मैंने तुमसे कही है, वह सम्पूर्ण कवियों और योगियोंके लिये सेवनयोग्य है तथा परम गुरुकी दयादृष्टिसे वह मुक्तिमार्गको देती है। जो कोई मनुष्य वसिष्ठजी और श्रीरामचन्द्रजीके इस संवादको प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक सुनेगा, वह किसी अवस्था में रहते हुए भी एकमात्र श्रवणसे ही मुक्त हो जायगा और परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेगा।

(सर्ग १२८)

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