संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण ( उत्तरार्ध )
कल्पना या संकल्पके त्यागका स्वरूप, कामना या संकल्पसे शून्य होकर कर्म करनेकी प्रेरणा, दृश्यकी असत्ता तथा तत्त्वज्ञानसे मोक्षका प्रतिपादन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जब पुरुष देह, प्राण आदिमें अहंता, ममता आदि कल्पनाओंको त्याग देगा, तब फिर उससे कोई भी कर्म नहीं बन सकता। ऐसी दशामें शरीरके भरण-पोषणकी चेष्टासे भी विरत हो जानेके कारण उस देहधारी जीवका शरीर शीघ्र ही गिर सकता है। अतः जीवित पुरुषके लिये यह कल्पना-त्यागपूर्वक व्यवहार कैसे सम्भव है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जीवित पुरुषके लिये ही कल्पनाओंका त्याग सम्भव है। जो जीवित नहीं है, उसके लिये नहीं। इस कल्पना-त्यागका यथार्थ स्वरूप क्या है, यह बतलाता हूँ, सुनो। कल्पना-के स्वरूपको जाननेवाले विद्वान् अहम्भावना ( आत्माको देहमात्र मान लेने ) को ही कल्पना कहते हैं तथा आत्माको आकाशके समान अपरिमित, अनन्त और व्यापक जानकर परमात्माके वास्तविक स्वरूपका निरन्तर चिन्तन करना ही तत्त्वज्ञ पुरुषोंके मतमें कल्पनाका या संकल्पका त्याग कहलाता है। संकल्पशून्य होकर चुपचाप स्थित रहनेसे ही उस परमपदकी प्राप्ति होती है, जहाँ उच्च कोटिका साम्राज्य भी तिनकेके समान तुच्छ प्रतीत होता है। समस्त कर्म और उनके विस्तृत फलोंको सोये हुए पुरुषकी भाँति सर्वथा भूलकर प्रारब्धा-नुसार प्राप्त हुए कार्यके लिये संकल्पशून्य होकर मनुष्यको चेष्टा करते रहना चाहिये। अपने कर्मोंमें यदि वासना-रहित प्रवृत्तिका अभ्यास हो जाय तो यही उच्चकोटिका धैर्य है, जो भावी जन्मरूपी ज्वरका निवारण कर देता है। वासना और संकल्पसे शून्य होकर प्रारब्धवश प्राप्त हुए कार्यका अनुसरण करते हुए चाकके ऊपर घूमनेवाले घट आदिकी भाँति धीरे-धीरे उपरत होते हुए कर्मोंमें लगे रहना चाहिये।
सम, शान्त, कल्याणमय, सूक्ष्म, द्वित्व और एकत्वसे रहित, सर्वत्र व्यापक, अनन्त तथा शुद्धस्वरूप परब्रह्म परमात्माके प्राप्त होनेपर किसलिये कौन खिन्न हो सकता है ? जो पुरुष संकल्पशून्य और शान्त हो गया है अर्थात् जिसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति हो गयी है, उसे अपने शरीरके रहने या न रहनेसे कोई प्रयोजन नहीं है तथा इस लोकमें किसी कर्मके किये जाने अथवा न किये जानेसे भी उसका कोई, किञ्चित् मात्र भी प्रयोजन नहीं है। रघुनन्दन ! जैसे सुवर्ण ही कड़े और बाजूबन्दके रूपमें प्रतीत होता है; किंतु वास्तवमें सुवर्णसे पृथक् इन आभूषणोंके नामरूप-की सत्ता नहीं है, उसी प्रकार यह जो कुछ जगत्रूपमें दिखायी देता है, प्रतीतिमात्र ही है। परमात्मासे पृथक् इसकी सत्ता नहीं है। परमात्मासे भिन्न इसकी सत्ताका अनुभव न होनेको ही ज्ञानी पुरुषोंने इस जगत्का नाश माना है। जगद्-भ्रमका निवारण हो जानेपर इसके अधिष्ठानरूपसे अवशिष्ट जो परमात्मा है, वही परमार्थ सत्य है।
श्रीरामजीने पूछा—प्रभो ! 'मैं' और 'मेरा' इत्यादि जो दृश्य है, उसको असत् मानकर उसका चिन्तन न करनेवाले ज्ञानी पुरुषको कर्मोंके त्यागसे कौन-सा अशुभ और कर्मोंके सम्पादनसे कौन-सा शुभ फल प्राप्त होता है।
श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! जबतक देहरूपी उपाधि विद्यमान है, तबतक इस भावनामय सूक्ष्म कर्मका क्या त्याग हो सकता है और क्या अनुष्ठान । देहके रहते हुए यह जीव-चेतन बाह्य और आभ्यन्तर जिस-जिस वस्तुकी भावना करता है, वह-वह तत्काल उसको