संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * समूल कर्मत्यागके स्वरूपका विवेचन * ५१७
प्रतीत होने लगती है। भले ही, उसका आकार सत्य हो या भ्रमसे भरा हुआ असत्य। यदि वह किसी वस्तु-की भावना नहीं करता तो इस संसार-भ्रमसे पूर्णतया मुक्त हो जाता है। वह भ्रम सत्य हो या असत्य, इस विचारसे क्या प्रयोजन है ? बोध होनेके पश्चात् इस दृश्यकी प्रतीतिके स्वयं ही लय हो जानेसे जो इसका अत्यन्ताभाव सिद्ध होता है, उसीको जगत्का त्याग, अनासक्ति एवं मोक्ष माना गया है। इसलिये जबतक यह शरीर विद्यमान है, तबतक कर्मोंका सर्वथा त्याग नहीं हो सकता। परंतु जो अज्ञानी कर्मका आदर करते हैं, वे उनके मूलको नहीं छोड़ते हैं। मनका जो वासनात्मक सङ्कल्प है, वही अपने कर्मका मूल है। जबतक यह शरीर है, तबतक ज्ञानके बिना उस मानसिक सङ्कल्पका उच्छेद नहीं हो सकता। परंतु जो तत्त्वज्ञानके द्वारा मनके संकल्पोंका निवारण कर देता है, वह संसाररूपी वृक्षका मूलोच्छेद कर डालता है। (सर्ग १-२)
समूल कर्मत्यागके स्वरूपका विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब यह सर्व-सम्मत सिद्धान्त है कि न तो असत् वस्तुकी सत्ता हो सकती है और न सत्-वस्तुका अभाव ही, तब दृश्य विषयोंके प्रति उत्सुकताका निवारण स्वयं सुगम होजाता है। (क्योंकि दृश्यकी असत्ताका प्रतिपादन किया जा चुका है। जो वस्तु है ही नहीं, उसका चिन्तन कोई समझदार मनुष्य कैसे करेगा ?) विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह अपने शुभाशुभ कर्मको नष्ट कर दे। आत्माके साथ कर्मका कोई सम्बन्ध नहीं है। आत्मा कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनोंसे रहित है। इस तत्त्वज्ञानके द्वारा कर्मोंका नाश स्वतः सिद्ध हो जाता है। समस्त कर्मोंके मूलभूत मानसिक संकल्पका विनाश करनेसे संसार पूर्णतः शान्त हो जाता है। जब कर्मके मूल कारणका भलीभाँति विचार किया जाता है, तब समस्त कर्मोंका अभाव अपने-आप ही सिद्ध हो जाता है। (क्योंकि जब चित्त और उसका सङ्कल्प ही मिथ्या है, तब उससे होनेवाला कर्म सत्य कैसे हो सकता है ?) अथवा चिन्मय आत्मा अपने भीतर जिस चित्त नामक कर्मबीजका—क्रिया, करण और कर्त्तारूप त्रिपुटीका निर्माण करता है, वह उस आत्मासे किञ्चिन्मात्र भी भिन्न नहीं है। इसलिये बाहर और भीतर (जाग्रत् तथा स्वप्न-सुषुप्तिमें) जो पदार्थोंकी प्रतीति होती है, वह आत्म-स्वरूप ही है, आत्मासे भिन्न नहीं है।
किंतु वास्तवमें रघुनन्दन ! सम्पूर्ण कर्मोंका विस्तार यह शरीर है। उसका मूल अहंकार है और शाखा-प्रशाखाएँ संसार। चिन्तन या भावनाका जहाँ बाध हो जाता है, उस अहंकारशून्य स्थितिसे इस संसारका मूलोच्छेद हो जानेके कारण वह उसी तरह शान्त हो जाता है, जैसे स्पन्दनशून्य वायु। जैसे नदीके प्रवाहमें पड़ा हुआ तृण-काष्ठ आदि सब कुछ स्वभावतः बहता रहता है, उसी प्रकार ज्ञानियोंकी कर्मेन्द्रियोंसे किसी प्रकारके मनोविकारके बिना ही अर्धसोये पुरुषकी भाँति स्वाभाविक चेष्टा होती रहती है। वासनाशून्य निरतिशय ब्रह्मानन्दके प्राप्त हो जानेपर विषय-सुख अत्यन्त नीरस हो जाते हैं। फिर न वे बाहर अपना प्रभाव डाल पाते हैं, न भीतर। विषयों और वासनाओंसे रहित, शान्त और ब्रह्मानन्द-अनुसंधानसे हीन जो सङ्कल्परहित स्थिति है, उसीको कर्मत्याग कहते हैं। दीर्घकालके भूले हुए कर्मकी भाँति विषयोंका पुनः स्मरण न होना कर्मत्याग कहलाता है। जो मिथ्या ज्ञान रखनेवाले पुरुष मूल-त्यागके बिना केवल कर्मेन्द्रिय-संयमरूप त्याग करते हैं, वे मूढ़ पशु तुल्य हैं। उनको वह कर्मत्यागरूपिणी पिशाची खा जाती