संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * - [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
है। किंतु जो मूलसहित कर्मत्यागके द्वारा शान्ति पा चुके हैं, उनके लिये इस जगत्में किसी कर्मके करने या न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है। जिसका समूल त्याग कर दिया जाता है, वही वास्तवमें त्याग है। मूलका उच्छेद किये बिना जो ऊपरसे कर्मका त्याग किया जाता है, वह वृक्षकी जड़ न काटकर उसकी शाखा काटनेके समान व्यर्थ है। जिस कर्मरूपी वृक्षकी जड़ न काटकर केवल शाखामात्रका उच्छेद किया जाता है, वह पुनः सहस्रों शाखाओंसे विस्तारको प्राप्त हो केवल दुःख देनेके लिये बढ़ता रहता है। प्रिय रामभद्र ! संकल्पशून्यता-रूप त्यागसे ही वास्तवमें कर्मत्याग सिद्ध होता है, दूसरे किसी क्रमसे नहीं। ज्ञानके द्वारा कर्मत्यागके सिद्ध हो जानेपर वासनारहित जीवन्मुक्त पुरुष घरमें रहे या वनमें, दीन-हीन अवस्थाको पहुँच जाय या लौकिक उन्नतिको प्राप्त हो, उसके लिये सभी अवस्थाएँ एक-सी हैं। जिसका चित्त शान्त है, उस पुरुषके लिये घर ही दूरवर्ती निर्जन वन है। परंतु जिसका चित्त शान्त नहीं है, उस पुरुषके लिये निर्जन वन भी जनसमुदायसे भरा हुआ नगर है। (सर्ग ३)
संसारके मूलभूत अहंभावका आत्मबोधके द्वारा उच्छेद करके परमात्मस्वरूपसे स्थित होनेका उपदेश
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— रघुनन्दन ! चेतन आत्माके स्वरूपका तत्त्वतः बोध प्राप्त होनेपर जब अहंता आदिके साथ ही सम्पूर्ण जगत् शान्त हो जाता है, तब तेल समाप्त होनेपर बुझे हुए दीपककी भाँति सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चका त्याग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं। 'कर्मोंका त्याग त्याग नहीं है। 'जहाँ जगत्का भान ही नहीं है, वह एकमात्र शुद्ध आत्मा ही अहंता आदि विकारोंसे रहित एवं अविनाशी है।'—इस प्रकारका बोध ही वास्तविक त्याग कहा गया है। 'यह स्त्री, पुत्र, धन आदि सब मेरे हैं, यह शरीर, इन्द्रिय आदि ही मैं हूँ,' इस प्रकारकी अहंता-ममताका सर्वथा अभाव होनेपर जो शेष रहता है वही कल्याणमय, शान्त, बोधस्वरूप परमात्मा है। उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है। परमात्माके यथार्थ ज्ञानके द्वारा अहंताका क्षय हो जानेपर ममताका आधारभूत सारा संसार ही विनष्ट हो जाता है। फिर सर्वत्र परिपूर्ण एकमात्र शान्तस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही स्थित रहता है।
अहंकारकी भावना करनेवाला जीवात्मा एकमात्र अहं-भावनाका त्याग कर देनेमात्रसे बिना किसी विघ्न-बाधाके शान्तस्वरूप हो जाता है। यह मुक्ति इतने ही मात्र साधनसे सिद्ध हो जाती है। तब फिर संसारमें भटक-कर व्यर्थ कष्ट क्यों उठाया जाय ? 'मैं देह आदि नहीं हूँ। विशुद्ध चेतनमात्र हूँ।' इस बुद्धिको भी यदि कोई द्वैतभ्रम ही कहे तो उसके लिये यह उत्तर है कि यह बुद्धि परमार्थ-स्वभावको छोड़कर और कुछ भी नहीं है। चिन्मय परमात्मा तो आकाशके समान विशद है। उसमें भ्रम कहाँ ठहर सकता है ? न भ्रम है, न भ्रमका साधन है, न भ्रमका फल है और न भ्रमका कोई आश्रय ही है। यह जो कुछ दिखायी देता है, सब अज्ञानजनित ही है। ज्ञानका प्रकाश होते ही यह अज्ञानजन्य अन्धकार नष्ट हो जायगा। यह जो सब ओर फैला हुआ प्रपञ्च दृष्टिगोचर होता है, वास्तवमें यह है ही नहीं, केवल एक शान्तस्वरूप परमात्मा ही है।