संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ०] * उपदेशके अधिकारीका निरूपण करते हुए भुशुण्ड और विद्याधरका संवाद * ५१९
जो अपने अंदरकी मनोवृत्तिको जीत रहा है या जीत चुका है, वही विवेकका पात्र है और उसे ही पुरुष कहते हैं; क्योंकि उसीने पुरुषार्थ करके अपना जीवन सफल किया है। जब मनुष्य अस्त्र-शस्त्रोंकी मार और रोगोंकी पीड़ाएँ भी सह लेता है, तब 'मैं यह शरीर आदि नहीं हूँ' इतनी-सी भावनामात्रको सह लेनेमें कौन-सा कष्ट है; क्योंकि संसारके जितने पदार्थ हैं, उन सबका अङ्कुर (कारण) अहंभाव ही है। इसलिये ज्ञानके द्वारा उस अहंभावका उन्मूलन हो जानेपर संसार-की जड़ अपने आप उखड़ जाती है। जैसे मुँहसे निकली हुई भाप निःसार होनेपर भी सारवान् स्वच्छ दर्पणको मलिन कर देती है और उसके मिट जानेपर वह दर्पण पुनः स्वच्छ हो जाता है, उसी प्रकार इस अहंमात्ररूपी निःसार बाष्पसे भी सारवान् परमात्मारूपी दर्पण मलसे आवृत-सा हो जाता है; किंतु उस अहंभावके शान्त होते ही शुद्ध स्वच्छरूपसे प्रकाशित होने लगता है। अहंभावशून्य परब्रह्म परमात्मामें विलीन हुई यह अहंता भी ब्रह्मरूप ही हो जाती है, अतः उसका पृथक् कोई नाम रूप नहीं रह जाता। अहंकार ही इस जगत्का बीज है। परंतु ज्ञानाग्निके द्वारा जब वह अहंकाररूपी बीज दग्ध हो जाता है, तब जगत् और बन्धन इत्यादिकी कल्पना ही नहीं रह जाती।
वह परब्रह्म परमात्मा सत्स्वरूप और कल्याणमय है। जैसे घट-बुद्धिसे घटमें एकदेशिता होनेपर मृत्तिकाके स्वरूपका विस्मरण हो जाता है, उसी प्रकार अहंतासे परमात्माके स्वरूपकी विस्मृति हो जाती है। अहंकाररूपी बीजसे ही यह दृश्य-प्रपञ्चकी सत्ता-रूपिणी लता उत्पन्न हुई है, जिसमें अनन्त जगतरूपी फल पैदा होते और नष्ट होते रहते हैं। नित्य परमात्म-तत्त्वके ज्ञानसे जब अहंकारको सर्वथा नष्ट कर दिया जाता है, तब यह संसाररूपिणी मृगतृष्णा सर्वथा शान्त हो जाती है। निष्पाप रघुनन्दन ! किसी दूसरे सहायक साधनोंके बिना ही अपने प्रयत्नमात्रसे सिद्ध होनेवाली अहंभावकी निवृत्तिके सिवा मुझे दूसरा कोई कल्याणकारी साधन नहीं दिखायी देता। (सर्ग ४)
उपदेशके अधिकारीका निरूपण करते हुए वसिष्ठजीके द्वारा भुशुण्ड और विद्याधरके संवादका उल्लेख—विद्याधरका इन्द्रियोंकी विषयपरायणताके कारण प्राप्त हुए दुःखोंका वर्णन करके उनसे अपने उद्धारके लिये प्रार्थना करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--रघुनन्दन ! जैसे स्वच्छ निर्मल वस्तुपर तेलकी एक बूँद भी पड़ जाय तो अपना प्रभाव डाल देती है, उसी प्रकार शुद्ध चित्तवाले पुरुषको दिया हुआ थोड़ा-सा भी उपदेश उसपर अपना प्रभाव डाल देता है। परंतु जिनका चित्त अहंभावके कारण बड़ा हुआ है, उन्हें दिया हुआ उपदेश उसी तरह लागू नहीं होता, जैसे दर्पणमें मोती नहीं घुस सकता। इस विषयमें विद्वान्लोग इस प्राचीन इतिहास-का उदाहरण दिया करते हैं, जिसे बहुत दिन पहले सुमेरु पर्वतके शिखरपर भुशुण्डजीने मुझसे कहा था।
प्राचीन कालकी बात है, सुमेरु पर्वतके शिखरकी एक एकान्त गुफामें किसी समय अध्यात्मचर्चाके प्रसङ्गमें मैंने भुशुण्डजीसे पूछा—'भुशुण्डजी ! यह तो बताइये, कौन ऐसा मूढ़बुद्धि, आत्मज्ञान-शून्य तथा चिरंजीवी पुरुष है, जिसका आपको स्मरण है ?' प्रिय श्रीराम ! मेरे इस प्रकार पूछनेपर भुशुण्डजीने यह उत्तर दिया।