भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५२० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भुशुण्डजी बोले—महर्षे ! पूर्वकालमें लोकालोकान्तर पर्वतकी चोटीपर एक विद्याधर रहता था। उसकी इन्द्रियाँ उसके वशमें नहीं थीं। इसके कारण उसे बड़ा खेद था। अतएव वह सूख-सा गया था। यद्यपि उसे आत्मतत्त्वका ज्ञान नहीं था, तथापि वह श्रेष्ठ और विचारशील था। उसने अनेक प्रकारसे तप किये थे, यम और नियमोंका पालन किया था। इससे उसकी आयु कभी क्षीण नहीं होती थी। इसीलिये वह पहले चार कल्पोंतक जीवित रहा। तदनन्तर चौथे कल्पके अन्तमें उचित कारण-सामग्री जुट जाने अर्थात् चिरकालसे अभ्यस्त तप और नियम आदिका प्रभाव पड़नेसे उसके भीतर विवेकका उदय हुआ। उसने सोचा--'बारंबार जन्म, बारंबार मरण और बारंबार वृद्धावस्थाकी प्राप्ति न हो, इसका क्या उपाय है। अबतक संसारबन्धनसे मुक्त न होनेके कारण मुझे लज्जा होती है; अतः ऐसी कौन-सी एक वस्तु है, जो सदा निर्विकारभावसे स्थित रहती है।' यों सोचकर पाँच प्राण, दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा स्थूलशरीर--इन अठारह अवयवोंसे युक्त अपनी पुरीको चिरकालतक धारण करनेसे विरक्त-चित्त होकर वह विद्याधर कुछ पूछनेके लिये मेरे पास आया। अब उसे संसारमें कोई रस नहीं मिल रहा था। मेरे समीप आकर उसने बड़े आदरके साथ मुझे नमस्कार किया, तब मैंने भी उसका आतिथ्य-सत्कार किया। तत्पश्चात् अवसर पाकर उसने यह उत्तम बात कही।

विद्याधरने कहा—भुशुण्डजी ! जो परम उदार, दुःखहीन, क्षय और वृद्धिसे वर्जित तथा आदि और अन्तसे रहित है, उस पावन पदका आप मुझे शीघ्र उपदेश दीजिये। महर्षे ! इतने समयतक मैं जडस्वरूप बनकर मोहकी प्रगाढ निद्रामें सोया हुआ था। अब तीव्र वैराग्यके कारण अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे मैं जाग उठा हूँ। मनके महान् रोग कामसे मैं बहुत पीड़ित हूँ। अज्ञानकी वृत्तियों और दुर्वासनाओंमें पड़कर क्षुब्ध हूँ। मेरी चेष्टाओंका अन्त होना बहुत कठिन हो रहा है। अहम्भावके रूपमें स्थित जो मोह है, उससे आप मेरा