संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * उपदेशके अधिकारीका निरूपण करते हुए भुशुण्ड और विद्याधरका संवाद * ५२१
शीघ्र उद्धार कीजिये। पहले सहस्रों बार उपभोगमें लाये हुए शब्दादि विषयोंसे ही अत्यन्त तुच्छ सुखके लिये जो इन्द्रियोंद्वारा सम्पर्क स्थापित किया जाता है, वह अपने आपको धोखा देना है। ऐसी विडम्बनाओंसे बारंवार ठगे जाकर मनुष्य चिरकालसे अत्यन्त खिन्न रहते हैं। विषय-भोग आरम्भमें रमणीय प्रतीत होते हैं। किंतु वे क्षणमें ही नष्ट हो जानेवाले हैं। उनमें शीघ्र ही विकार पैदा हो जाता है। वे संसारबन्धनके हेतु हैं; अतएव बड़े भयकर हैं।
मेरा नेत्र सुन्दर रूप निहारनेके लिये अत्यन्त चञ्चल तथा सुन्दरी नारीका मुँह देखनेके लिये लालायित रहता था। बाह्य और आभ्यन्तर प्रकाशकी सहायतासे मनको दूषित करनेके लिये विषयोंके साथ सम्बन्ध स्थापित करके इसने मुझे भारी दुःखमें डाल दिया। नारीके शरीरमें जो ये वस्त्र और आभूषण आदि हैं, ये ही उसकी शोभा बढ़ा रहे हैं, वास्तवमें वह रक्त-मांस आदि- का पिण्ड है। इस तरहका विचार न करके केवल रूपमात्रका अनुसरण करनेके स्वभावसे युक्त होनेके कारण ये नेत्र अयोग्य विषयकी ओर भी दौड़ पड़ते हैं।
तात ! यह घ्राणेन्द्रिय इस संसारमें अनर्थकी प्राप्तिके लिये ही चारों ओर दौड़ लगा रही है। तेज दौड़नेवाले घोड़ेकी भाँति इसे मैं रोक नहीं पाता हूँ। मेरी यह रसना शास्त्रके अनुसार भक्ष्याभक्ष्यका विचार न करके चिरकालसे नाना प्रकारके रसोंका आस्वादन कर रही है। इसने मुझे गजराजों और गीदड़ोंसे भरे हुए दुःखके पहाड़ोंपर चढ़ाकर बड़ा तंग किया है। जैसे ग्रीष्म ऋतुमें प्रचण्ड किरणोंसे तपते हुए सूर्यके तापको रोकना असम्भव है, उसी प्रकार मेरी त्वगिन्द्रियमें जो दूसरोंके आलिङ्गनकी लम्पटता आ गयी है, उसे मैं रोक नहीं सकता। मुने ! जैसे नयी-नयी घास चरनेकी इच्छा हरिणको विषम सङ्कटमें (तिनकोंसे ढके हुए कूपमें) डाल देती है, उसी प्रकार मेरी ये श्रवणशक्तियाँ सुमधुर शब्दोंके रसास्वादनकी अभिलाषा लेकर मुझे विषम संकटमें डाल देती हैं। विनम्र सेवकोंके मुखसे निकली हुई, प्रियकारिणी (आनन्ददायिनी), विनयपूर्ण तथा वाद्यगीतकी मधुर ध्वनिसे मिली हुई सुन्दर शब्द- सम्पत्तियोंका मैंने श्रवण किया है।
खनखनाते हुए मणियोंके आभूषण जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, ऐसी सुन्दरी स्त्रियों तथा जो अपनी सौन्दर्य-सम्पदासे सबके मनको हर लेती हैं, ऐसी राज्यलक्ष्मीयों, दिशाओं तथा समुद्र और पर्वतोंकी तटभूमियोंका मैंने बारंबार अवलोकन किया है। मैंने विनयशालिनी प्रियतमाओंद्वारा लाये गये, स्वादिष्ठ मधुर आदि रसोंके चमत्कारोंसे मनको मोह लेनेवाले तथा उत्तम गुणोंसे सुशोभित छः प्रकारके रसोंका चिरकालतक आस्वादन किया है। मैंने सब ओर भोगभूमियोंमें रेशमी मुलायम वस्त्रों, सुन्दर कामिनीयों, मनोहर हारों, फूल-बिछी शय्याओं तथा शीतल, मन्द, सुगन्ध हवाओंका बिना किसी विघ्न- बाधाके भलीभाँति स्पर्श (आलिङ्गन) प्राप्त किया है। मुने ! चन्दन, अगुरु आदि ओषधियों, भाँति-भाँति के फूलों तथा ढेर-के-ढेर कपूर एवं कस्तूरी आदिके संचयसे प्रकट होनेवाली सुगन्धोंका, जो मन्द-मन्द वायुसे प्रेरित होकर मेरी नासिकातक पहुँचती थीं, मैंने दीर्घकालतक अनुभव किया है। मैंने शब्द आदि विषयोंका बारंबार श्रवण, स्पर्श, दर्शन, रसास्वादन तथा सुगन्ध-सेवन किया है। पर अब तो तीव्र वैराग्यके कारण ये विषय मेरे लिये रसहीन हो गये हैं। अतः शीघ्र बताइये, अब मैं पुनः किस वस्तुका सेवन करूँ? चिरकालतक अकण्टक राज्य किया, सुन्दरियोंका उपभोग किया और शत्रुओंकी बड़ी भारी सेनाओंको मिट्टीमें मिला दिया। यह सब करके अब कौन-सी अपूर्व वास्तविक वस्तु शेष है, जिसकी प्राप्ति की जाय?
विषयोंकी इन दुरन्त वनश्रेणियोंमें इन्द्रियरूपी लुटेरोंने मुझे चिरकालतक उसी तरह ठगा है, जैसे धूर्त