भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * उपदेशके अधिकारीका निरूपण करते हुए भुशुण्ड और विद्याधरका संवाद * ५२१

शीघ्र उद्धार कीजिये। पहले सहस्रों बार उपभोगमें लाये हुए शब्दादि विषयोंसे ही अत्यन्त तुच्छ सुखके लिये जो इन्द्रियोंद्वारा सम्पर्क स्थापित किया जाता है, वह अपने आपको धोखा देना है। ऐसी विडम्बनाओंसे बारंवार ठगे जाकर मनुष्य चिरकालसे अत्यन्त खिन्न रहते हैं। विषय-भोग आरम्भमें रमणीय प्रतीत होते हैं। किंतु वे क्षणमें ही नष्ट हो जानेवाले हैं। उनमें शीघ्र ही विकार पैदा हो जाता है। वे संसारबन्धनके हेतु हैं; अतएव बड़े भयकर हैं।

मेरा नेत्र सुन्दर रूप निहारनेके लिये अत्यन्त चञ्चल तथा सुन्दरी नारीका मुँह देखनेके लिये लालायित रहता था। बाह्य और आभ्यन्तर प्रकाशकी सहायतासे मनको दूषित करनेके लिये विषयोंके साथ सम्बन्ध स्थापित करके इसने मुझे भारी दुःखमें डाल दिया। नारीके शरीरमें जो ये वस्त्र और आभूषण आदि हैं, ये ही उसकी शोभा बढ़ा रहे हैं, वास्तवमें वह रक्त-मांस आदि- का पिण्ड है। इस तरहका विचार न करके केवल रूपमात्रका अनुसरण करनेके स्वभावसे युक्त होनेके कारण ये नेत्र अयोग्य विषयकी ओर भी दौड़ पड़ते हैं।

तात ! यह घ्राणेन्द्रिय इस संसारमें अनर्थकी प्राप्तिके लिये ही चारों ओर दौड़ लगा रही है। तेज दौड़नेवाले घोड़ेकी भाँति इसे मैं रोक नहीं पाता हूँ। मेरी यह रसना शास्त्रके अनुसार भक्ष्याभक्ष्यका विचार न करके चिरकालसे नाना प्रकारके रसोंका आस्वादन कर रही है। इसने मुझे गजराजों और गीदड़ोंसे भरे हुए दुःखके पहाड़ोंपर चढ़ाकर बड़ा तंग किया है। जैसे ग्रीष्म ऋतुमें प्रचण्ड किरणोंसे तपते हुए सूर्यके तापको रोकना असम्भव है, उसी प्रकार मेरी त्वगिन्द्रियमें जो दूसरोंके आलिङ्गनकी लम्पटता आ गयी है, उसे मैं रोक नहीं सकता। मुने ! जैसे नयी-नयी घास चरनेकी इच्छा हरिणको विषम सङ्कटमें (तिनकोंसे ढके हुए कूपमें) डाल देती है, उसी प्रकार मेरी ये श्रवणशक्तियाँ सुमधुर शब्दोंके रसास्वादनकी अभिलाषा लेकर मुझे विषम संकटमें डाल देती हैं। विनम्र सेवकोंके मुखसे निकली हुई, प्रियकारिणी (आनन्ददायिनी), विनयपूर्ण तथा वाद्यगीतकी मधुर ध्वनिसे मिली हुई सुन्दर शब्द- सम्पत्तियोंका मैंने श्रवण किया है।

खनखनाते हुए मणियोंके आभूषण जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, ऐसी सुन्दरी स्त्रियों तथा जो अपनी सौन्दर्य-सम्पदासे सबके मनको हर लेती हैं, ऐसी राज्यलक्ष्मीयों, दिशाओं तथा समुद्र और पर्वतोंकी तटभूमियोंका मैंने बारंबार अवलोकन किया है। मैंने विनयशालिनी प्रियतमाओंद्वारा लाये गये, स्वादिष्ठ मधुर आदि रसोंके चमत्कारोंसे मनको मोह लेनेवाले तथा उत्तम गुणोंसे सुशोभित छः प्रकारके रसोंका चिरकालतक आस्वादन किया है। मैंने सब ओर भोगभूमियोंमें रेशमी मुलायम वस्त्रों, सुन्दर कामिनीयों, मनोहर हारों, फूल-बिछी शय्याओं तथा शीतल, मन्द, सुगन्ध हवाओंका बिना किसी विघ्न- बाधाके भलीभाँति स्पर्श (आलिङ्गन) प्राप्त किया है। मुने ! चन्दन, अगुरु आदि ओषधियों, भाँति-भाँति के फूलों तथा ढेर-के-ढेर कपूर एवं कस्तूरी आदिके संचयसे प्रकट होनेवाली सुगन्धोंका, जो मन्द-मन्द वायुसे प्रेरित होकर मेरी नासिकातक पहुँचती थीं, मैंने दीर्घकालतक अनुभव किया है। मैंने शब्द आदि विषयोंका बारंबार श्रवण, स्पर्श, दर्शन, रसास्वादन तथा सुगन्ध-सेवन किया है। पर अब तो तीव्र वैराग्यके कारण ये विषय मेरे लिये रसहीन हो गये हैं। अतः शीघ्र बताइये, अब मैं पुनः किस वस्तुका सेवन करूँ? चिरकालतक अकण्टक राज्य किया, सुन्दरियोंका उपभोग किया और शत्रुओंकी बड़ी भारी सेनाओंको मिट्टीमें मिला दिया। यह सब करके अब कौन-सी अपूर्व वास्तविक वस्तु शेष है, जिसकी प्राप्ति की जाय?

विषयोंकी इन दुरन्त वनश्रेणियोंमें इन्द्रियरूपी लुटेरोंने मुझे चिरकालतक उसी तरह ठगा है, जैसे धूर्त

५२२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

किसी भोले-भाले बच्चेको ठग लेते हैं। मतवाले हाथी ऐरावतके कुम्भस्थलको विदीर्ण कर देना सरल है; परंतु कुमार्गमें प्रवृत्त हुई अपनी इन इन्द्रियोंको रोकना सरल नहीं है। जो लोग जितेन्द्रिय तथा महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं, वे ही इस भूतलपर मनुष्य कहे जाने योग्य हैं, इनके अतिरिक्त शेष मानवोंको तो मैं मांसकी बनी हुई चलती-फिरती मशीनें समझता हूँ। भोगोंकी आशाका परित्याग कर देनेके सिवा दूसरे कोई ऐसे साधन नहीं हैं, जो इन्द्रियरूपी महान् रोगोंकी शान्ति कर सकें। इनकी शान्तिके लिये न तो ओषधियों, न तीर्थ और न मन्त्र ही लाभकारी सिद्ध होते हैं। जैसे विशाल वनमें बहुत-से-लुटेरे यात्रा करनेवाले अकेले पथिकको महान् कष्टमें डाल देते हैं, उसी प्रकार विषयोंकी ओर दौड़नेवाली इन इन्द्रियोंने मुझे अत्यन्त खेदजनक अवस्थामें पहुँचा दिया है। गहरे गड्ढे और इन्द्रियाँ एक-सी ही हैं, दोनों ही प्राणियोंको नीचे गिरानेमें अत्यन्त कुशल हैं। उनमें दोषरूपी विषधर सर्प वास करते हैं तथा इनमें विषयरूपी लाखों सूखे काँटे होते हैं। राक्षस और अपनी इन्द्रियाँ दोनों एक-से स्वभाववाले हैं। दोनों अपने ही पालन-पोषणमें तत्पर, अनार्य, दुःसाहसी तथा अन्धकारमें विहार करनेवाले होते हैं। जीर्ण बाँस आदिकी लकड़ियाँ और इन्द्रियाँ भीतरसे खोखली, निस्सार, टेढ़ी, गाँठवाली तथा एकमात्र जलानेके ही योग्य होती हैं। दुखियोंका उद्धार करनेवाले महामन् ! इस प्रकार इन इन्द्रियोंके कारण मैं विपत्तिके समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। मेरे पास आत्मरक्षाका कोई साधन नहीं है। आप स्वयं ही कृपा करके मेरा उद्धार कीजिये; क्योंकि संसारमें जो कोई भी श्रेष्ठ संत-महात्मा हैं, उनका समागम बड़े-से-बड़े शोकको हर लेनेवाला है, ऐसा सभी सत्पुरुष कहते हैं। (सर्ग ५-६)


भुशुण्डजीद्वारा विद्याधरको उपदेश—दृश्य-प्रपञ्चकी असत्ता बताते हुए संसार-वृक्षका निरूपण

भुशुण्डजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! विद्याधरके उस पवित्र वचनको सुनकर मैंने उसके प्रश्नके अनुसार सुस्पष्ट पदोंसे युक्त वाणीद्वारा उसे इस प्रकार उत्तर दिया—'विद्याधर ! यह बड़ी अच्छी बात है कि तुम अपने कल्याणके लिये जाग उठे हो। सौभाग्यका विषय है कि तुम्हें चिरकालके बाद संसाररूपी अन्धकारपूर्ण कूपसे ऊपर उठनेकी इच्छा हुई है। आज विवेकसे युक्त हुई तुम्हारी पवित्र बुद्धि अग्निसे व्याप्त सुवर्णकी भाँति अद्भुत शोभा पा रही है। मुझे विश्वास है कि विवेकसे निर्मल हुई तुम्हारी बुद्धि मेरी उपदेशवाणीके तात्पर्यको सुन्दर ढंगसे अनायास ही ग्रहण कर सकती है; क्योंकि स्वच्छ दर्पणमें पदार्थोंका प्रतिबिम्ब अनायास ही प्रकट हो जाता है। इस समय मैं जो कुछ कहूँ, वह सब तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिये; क्योंकि मैंने चिरकालतक अनुसन्धान करके इस विचारको निश्चित किया है। अतएव तुम्हें इस विषयमें कोई दूसरा विचार नहीं करना चाहिये। जो कुछ अहंकार आदि तुम्हारे अन्तःकरणमें प्रतीत हो रहा है, वह सब तुम नहीं हो। इन दृश्योंमें ही कोई आत्मा है, जिसे ढूँढ़कर प्राप्त करना है, ऐसा विचारकर यदि चिरकालतक अपने भीतर ढूँढ़ते रहोगे तो भी तुम्हें अपने स्वरूपभूत आत्माकी उपलब्धि नहीं होगी। इसलिये दृश्यमात्र ही जिसका लक्षण है, उस अज्ञानको छोड़कर तुम उसके साक्षीको आत्मा समझो।

जैसे मृगतृष्णामें जलकी प्रतीति होनेपर भी वास्तवमें वहाँ जल नहीं होता है, उसी प्रकार सारा विश्व अवस्तु-रूप होनेके कारण सद्रूपसे प्रतीत होनेपर भी असत् ही है। अथवा ऐसा समझो कि यह जो कुछ भासित होता है, वह सब ब्रह्म ही है या यों समझो कि वह कुछ

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * संसार-वृक्षके उच्छेदके उपाय तथा ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन * ५२३


भी नहीं है अथवा कोई अनिर्वचनीय वस्तु ही है। तुम अहन्ताको ही इस विश्वका बीज—मूलकारण समझो; क्योंकि उसीसे पर्वत, समुद्र, पृथ्वी और नदी आदिके सहित यह जगत्-रूपी वृक्ष प्रकट हुआ है और इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्तिरूपी रससे परिपूर्ण जो ऊपरके भुवन हैं, वे ही इस वृक्षके मूल भाग हैं। चारों युग इसमें लगे हुए घुन हैं। अज्ञान ही इसकी उत्पत्तिकी भूमि है। जीवमात्र इसपर बसेरे लेनेवाले करोड़ों पक्षी हैं। भ्रान्ति-ज्ञान इस वृक्षका विशाल तना है और तत्त्वज्ञानसे उपलब्ध होनेवाला मोक्ष ही इस वृक्षको दग्ध करनेवाली अग्नि है। इन्द्रियोंद्वारा विषयोंकी उपलब्धि और मनसे होनेवाले संकल्प-विकल्प आदि इस वृक्षके विविध भाँति-भाँतिके सौरभ (सुगन्ध) हैं। विशाल आकाश महान् वन है। ऋतुएँ इसकी विचित्र शाखाएँ हैं, दसों दिशाएँ उपशाखाएँ हैं। इस तरह संसाररूपी वृक्ष अपने मूलभागसे पातालको, मध्यभागसे सम्पूर्ण दिशाओंको और शिखाभागसे अन्तरिक्षको परिपूर्ण करके वास्तवमें असद्रूप होता हुआ भी सद्के समान प्रतीत होता है।

(सर्ग ७)


संसार-वृक्षके उच्छेदके उपाय, प्रतीयमान जगत्‌की असत्ता, ब्रह्ममें ही जगत्‌की प्रतीति तथा सर्वत्र ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन

भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! पातालसहित यह पृथ्वी जिसका आवार (मूलभाग) है, लोकालोकपर्यन्त फैले हुए पर्वतोंकी कन्दराएँ जिसकी वेदी हैं, ऐसा यह संसार-रूपी वृक्ष अहंकाररूप बीजसे उत्पन्न होता है। ज्ञानरूपी अग्निसे जब इसका बीज दग्ध हो जाता है, तब कुछ भी उत्पन्न नहीं होता। यहाँ जो कुछ प्रतीत हो रहा है, सब असत्य ही है। मायाके हाथी-घोड़ोंकी तरह कहींसे यों ही पैदा हो गया है। संकल्प-विकल्पको त्याग देनेमात्रसे इस संसार-भ्रमका नाश हो जाता है। शुद्धात्मन् ! तुम पहले पतनके हेतुभूत अविवेक-पदमें स्थित थे। किंतु अब उससे भिन्न उस पुण्यमयी दूसरी विवेक-पदवीको प्राप्त हो गये हो, जो तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली है। अतः मेरा अनुमान है कि इस मनके द्वारा अब फिर तुम नीचे नहीं गिरोगे। इसलिये तुम मन और वाणीकी चेष्टासे रहित, निर्मल, सच्चिदानन्द परमात्मपदका आश्रय लेकर सम्पूर्ण दृश्यसमूहको त्याग दो।

निष्पाप विद्याधर ! दृश्यको याद न रखते हुए सब प्रकारके तापसे शून्य एवं शान्त सच्चिदानन्दघन-स्वरूपसे स्थित रहो। अहंकारकी सत्ता नहीं है, इस भावनासे अहंकाररहित होकर यदि तुम्हारा चेतन-स्वरूप चिन्मय परमात्मामें पूर्णरूपसे मिलकर एक हो जाय तो दूसरी कोई प्रकाशित वस्तु है ही नहीं, फिर तुम्हारे स्वरूपभूत ब्रह्मकी किससे उपमा दी जाय।

चिन्मय परमात्मासे भिन्न माने गये इस जगत्‌के स्फुरणको तुम चिन्मय परमात्मासे ही उत्पन्न हुआ जानो; क्योंकि काष्ठ, जल और दीवार सबमें ही परब्रह्म परमात्मा विराजमान है। सभी स्थानोंमें सृष्टिका समूह परस्पर गुँथा हुआ स्थित है। ब्रह्म और जगत्‌में जो भेद कहा गया है, वह असत् है। जैसे सुवर्ण और कटकमें भेद नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्म और जगत्‌में भी भेद नहीं है।

(सर्ग ८-१०)

५२४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चिन्मय परब्रह्मके सिवा अन्य वस्तुकी सत्ताका निराकरण, जगत्की निःसारता तथा सत्सङ्ग, सत्-शास्त्र-विचार और आत्मप्रयत्नके द्वारा अविद्याके नाशका प्रतिपादन

भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! जैसे 'महाकाशमें घटाकाश उत्पन्न हुआ है' अपने मनसे इस तरहकी कल्पना करना भ्रममात्र ही है; उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें प्रपञ्चात्मक, असद्रूप अहंभावकी भावना केवल भ्रम ही है । सम्पूर्ण कल्पनाओंका अधिष्ठान वह ब्रह्म परम सूक्ष्म है । उसीकी कल्पना यह आकाश आदि जगत् है । देश, काल आदि जगत् तथा इसके सहस्रों अवान्तर कार्यरूपी विस्तारोंमें भी एकमात्र घन, सूक्ष्म, चिन्मय ब्रह्मके विस्तारके सिवा दूसरा कोई वास्तविक रूप हो, यह सम्भव नहीं है । चिन्मय परमात्माका विस्तार होनेसे ही काल, आकाश, नौका, जल, स्थल, निद्रा, जाग्रत् और स्वप्नमें भी जगत् उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता है। विद्याधर ! यह जगत् किसी पटपर अङ्कित हुए विशाल राज्यके चित्रके समान सुन्दर जान पड़ता है । इसमें सहस्रों खुर (पैर), मस्तक, नेत्र, हाथ और मुख, मुखोंकी चेष्टाएँ तथा तर्क-वितर्क दृष्टिगोचर होते हैं । इसमें परिमित जगहमें ही नाना प्रकारके पर्वत, शरीर, दिशा, देश और नदी आदि दृश्य वस्तुओंका चित्रण हुआ है । यह भीतरसे शून्य और निःसार है । अनेक प्रकारके रंगोंसे रँगा हुआ है । वैराग्य-मात्रके प्रकट होते ही इसका विनाश हो जाता है। इस चित्रमय जगत्‌में देवता, असुर, गन्धर्व, विद्याधर, बड़े-बड़े नाग और मनुष्य आदि प्राणी अङ्कित हैं । जैसे नूतन चित्र अंगुलियोंद्वारा किया गया मर्दन नहीं सह सकता, उसी तरह यह जगत् विचारको नहीं सहन कर पाता अर्थात् जैसे हाथसे रगड़नेपर चित्र मिट जाता है, उसी तरह विवेकपूर्वक विचार करनेपर यह जगत् भी नहीं टिक पाता है । मानसिक संकल्प-विकल्पसे ही यह प्रकाशमें आता है । हृदयको क्षुब्ध कर देनेवाली काम-वासनारूप जालके समूहोंसे निबद्ध, सम्पूर्ण आवर्त-रूपी विकारोंसे युक्त, स्त्री-पुत्र आदिमें फैलते हुए स्नेहसे मिश्रित तथा मिथ्या होनेके कारण अज्ञात विषयोंके बारंबार आस्वादनके द्वारा प्रसारको प्राप्त हुआ जो जीवात्माका संकल्प है, वह चित्रलिखित विशाल राज्यके रूपमें वर्णित यह संसार है । विद्याधर ! मन, अहंकार, बुद्धि आदि जो कुछ भी विकल्पक ज्ञान है, उस सबको तुम एकमात्र अविद्या ही समझो, जो पुरुष-प्रयत्नसे शीघ्र नष्ट हो जाती है ।

इतना प्रसंग सुनानेके बाद श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! संसार-सागरको पार करनेकी इच्छावाले विरक्त श्रेष्ठ पुरुषके साथ तथा परमात्मज्ञानीके साथ भी बैठकर इस संसारके विषयमें विवेकी मनुष्यको विचार करना चाहिये (कि यह क्या है ? इसका परिणाम, मूल और सार क्या है ? तथा इससे मुक्त होनेका क्या उपाय है ?)। विवेकी पुरुषको उचित है कि वह जहाँ-कहींसे भी विरक्त, ईर्ष्यारहित एवं परमात्मज्ञानी श्रेष्ठ पुरुषको ढूँढ़ निकाले और यत्नपूर्वक उसका संग और सेवा करे । ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान रखनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! तुम यह अच्छी तरह जान लो कि श्रेष्ठ पुरुषका संग सिद्ध हो जानेपर साधकको महान् श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त होती है, जिससे अविद्याका आधा भाग तत्काल नष्ट हो जाता है । इस प्रकार अविद्याका आधा भाग तो सत्संग-से नष्ट होता है और एक चौथाई भाग शास्त्रोंके तात्पर्यकी आलोचनासे दूर हो जाता है; फिर जो चतुर्थ भाग शेष रह जाता है, उसे मनुष्यको अपने प्रयत्नसे परमात्म-साक्षात्कारके द्वारा नष्ट कर देना चाहिये । यदि संसार-बन्धनसे मुक्त होनेकी एकमात्र उत्कट इच्छा उत्पन्न हो जाय तो वह इच्छा वैराग्यके द्वारा उस पुरुषको भोगों और उसके साधनोंसे दूर हटा देती है । भोग-इच्छाका नाश हो जानेपर अविद्याका चतुर्थ अंश अपने यत्नसे नष्ट

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास * ५२५


हो जाना है। सत्संग, शास्त्रोंके अर्थका विवेकपूर्वक विचार और अपना प्रयत्न—इन सब साधनोंकी एक साथ प्राप्ति होनेपर एक ही समयमें अथवा एक-एक साधनके प्राप्त होनेपर क्रमशः अविद्यारूपी मलका नाश होता है। अविद्याका नाश हो जाना ही जिसका एकमात्र स्वरूप है, ऐसा जो अविद्याकी निवृत्तिके पश्चात् तत्त्व शेष रहता है, उस नाम और अर्थसे रहित परम वस्तुको वास्तवमें नित्य सत्य होनेके कारण सत् और प्रतीत न होनेके कारण असत् भी कहा गया है। यह परमार्थ वस्तु आनन्दघन, जरा आदि विकारोंसे रहित, अनन्त और एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही है। संकल्पमात्रसे स्फुरित होनेवाला नाम-रूपात्मक जगत् तो वास्तवमें है ही नहीं। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयकी जो त्रिपुटी है, उसके मोहसे तुम सर्वथा रहित हो। अतः निर्वाण ब्रह्मरूपसे सर्वत्र व्याप्त हुए सदा शोकशून्य अवस्था में स्थित हो।

(सर्ग ११-१२)


त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास और उनके गृह, नगर, देश, लोक एवं त्रिलोकके साम्राज्यकी कल्पनाका विस्तार

भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! किसी समयकी बात है, कहीं किसी कल्पवृक्षमें उसकी युगल शाखामें ब्रह्माण्डरूपी गूलरका फल प्रकट हुआ। उसके भीतर तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंके राजा इन्द्र उसी तरह निवास करते थे, जैसे शहदके छत्तेमें मधु-मक्खियोंका स्वामी। वे गुरुके उपदेश और अपने अभ्याससे अविद्याके आवरणका नाश करके महात्मा हो गये थे। अपने अन्तःकरणमें सदा परमात्माके स्वरूपका चिन्तन करते रहते थे। पूर्वापरका ज्ञान रखनेवाले विद्वानोंमें उनका सबसे ऊँचा स्थान था। तदनन्तर एक समय प्रभावशाली भगवान् नारायण और शिव आदि, जब कहीं अपने लोकातीत परमधाममें विराजमान थे, उस समय उन देवराज इन्द्रने अकेले ही अस्त्र-शस्त्ररूपी अग्निज्वालाको धारण करनेवाले महापराक्रमी असुरोंके-साथ युद्ध किया, उसमें उनकी पराजय हुई और उन्हें तुरंत ही युद्धभूमिसे भागना पड़ा। शत्रु उनके पीछे पड़ गये थे; अतः वे बड़े वेगसे दसों दिशाओंमें भागते फिरे। उन्हें कहीं भी ऐसा आश्रय नहीं मिला, जहाँ वे विश्राम ले सकें। इतनेमें ही उनके शत्रुओंकी दृष्टि कहीं इधर-उधर चली गयी। उस समय इन्द्रको छिपनेके लिये थोड़ा-सा अवसर मिल गया। उन्होंने अपने संकल्पजनित स्थूल साकार रूपको शान्त करके अपने अन्तःकरणके भीतर ही सूक्ष्मभूतमें विलीन कर दिया और अत्यन्त अणुरूप होकर बाहर सूर्यकी किरणोंमें स्थित किसी त्रसरेणुके भीतर संकल्पमात्रसे प्रवेश किया, वहाँ उन्हें शीघ्र ही विश्राम प्राप्त हुआ। फिर तो उन्हें युद्धकी बात भूल गयी और इसीलिये वहाँसे बाहर निकलनेका संकल्प भी निवृत्त हो गया। वहाँ उन्होंने अपने रहनेके लिये एक घरकी कल्पना की और क्षणभरमें उन्हें अनुभव हुआ कि घरका निर्माण हो गया और मैं उसमें रह रहा हूँ। उस संकल्पकल्पित भवनके भीतर एक कमलके आसनपर बैठकर वे उसी तरह आनन्दका अनुभव करने लगे, जैसे अपने स्वर्गीय सदनमें सिंहासनपर बैठकर किया करते थे।

उस घरमें रहते हुए इन्द्रने एक ऐसा कल्पित नगर देखा, जिसके परकोटे और महल मणि, मोती तथा मूँगे आदिसे बने हुए थे। उस नगरके भीतर जाकर देवराजने जब इधर-उधर दृष्टिपात किया, तब उन्हें एक देश दिखायी दिया, जो अनेकानेक पर्वत, ग्राम, गोशाला, नगर और काननोंसे सुशोभित था। तत्पश्चात् वैसे ही संकल्पसे युक्त हुए इन्द्रने एक विराट् लोकका

५२६ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अनुभव किया, जिसमें बहुत-से पर्वत, समुद्र, पृथ्वी, नदियों, नरेश और उनके राज्यकी सीमाएँ दृष्टिगोचर होती थीं। वह लोक क्रिया तथा काल आदिकी कल्पनाओसे युक्त था। इसके बाद उसी तरहके मकरूपका आनन्द लेनेवाले देवेन्द्रने वहाँ तीनों लोकोंको देखा, जो पाताल, पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, सूर्य और पर्वत आदि अनेक पदार्थोंसे भरे-पूरे थे। फिर उसी त्रिलोकीमें भोगराशिसे विभूषित हुए इन्द्र देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए। कुछ कालके बाद उन्हें एक पराक्रमी पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम था कुन्द। तत्पश्चात् वे प्रशंसाके योग्य देवराज इन्द्र जीवनके अन्तमें शरीरका परित्याग करके मोक्षको प्राप्त हो गये। इसके बाद उनके पुत्र कुन्द त्रिलोकीके राजा हुए। फिर वे भी अपने एक पुत्रको जन्म देकर जीवनके अन्तमें कालके अधीन हो परमपदको प्राप्त हुए। तदनन्तर कुन्दका पुत्र भी पिताकी ही भाँति दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् अपने पुत्रको राजसिंहासनपर बिठाकर जीवनके अन्तमें परमपदको प्राप्त हो गया। सुन्दर ! इस प्रकार उस देवराज इन्द्रके सहस्रों पौत्र राज्यपर प्रतिष्ठित हुए और कालके गालमें चले गये। आज भी वहाँ उन्हींके पौत्रोंका राज्य है, जिनमेंसे अंशक इस समय राजसिंहासनपर प्रतिष्ठित है।

( सर्ग १३ )


इन्द्र-कुलमें उत्पन्न हुए एक इन्द्रका विचार-दृष्टिसे परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करके इस त्रिलोकीके इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित होना तथा अहंभावनाके निवृत्त होनेसे संसार-भ्रमके मूलोच्छेदका कथन

भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! पहले जिनकी चर्चा की गयी है, उन्हीं इन्द्रके कुलमें कोई उत्तम गुणों-से सम्पन्न कान्तिमान् बालक उत्पन्न हुआ, जो देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुआ। कुछ कालके पश्चात् बृहस्पतिके उपदेशसे उन इन्द्रके उस वंशजको आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाला ज्ञान प्राप्त हुआ। फिर तो उसे जानने योग्य आत्मतत्त्वका ज्ञान हो गया। वह प्रारब्धके अनुसार जो कुछ प्राप्त होता, उसीमें संतोष करता था। इस प्रकार रहते हुए उस इन्द्रवंशी देवराजने तीनों लोकोंका राज्य किया।

ज्ञान-बलसे सुशोभित होनेवाले उन देवेन्द्रके मनमें किसी समय ऐसी इच्छा उत्पन्न हुई कि 'मैं भलीभाँति ध्यान लगाकर ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार करूँ।' ऐसा विचार कर वे एकान्तमें बैठ गये और बाहर-भीतरके सम्पूर्ण विक्षेपोंसे रहित शान्त-चित्त हो ध्यान-समाधि लगाकर परब्रह्मके स्वरूपको विचार-दृष्टिसे देखने लगे। उन्होंने अनुभव किया कि परब्रह्म परमात्मा सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न है। सर्व-वस्तुस्वरूप, सर्वत्र व्यापक, सब प्रकारसे सर्वदा सर्वमय है। सबके साथ सर्वत्र विद्यमान है और सबमें व्यापक है। उसके सब ओर हाथ-पैर हैं, सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं तथा सब ओर कान हैं; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है। वह सम्पूर्ण इन्द्रियोंके गुणोंसे रहित होता हुआ भी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके गुणोंसे युक्त है। आसक्तिरहित होनेपर भी सबका धारण-पोषण करनेवाला है तथा निर्गुण होकर भी गुणोंको भोगनेवाला है। वह चराचर सभी प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है। अचर और चररूप भी वही है। सूक्ष्म होनेके कारण वह जाननेमें नहीं आता है। वह अति समीपमें है और दूरमें भी है। चन्द्रमा और सूर्यके रूपमें वही है। उसीने पृथ्वीका रूप धारण कर रखा है और वही पर्वत तथा समुद्रके रूपमें है, वह सर्वत्र सारभूत एवं गुरु है। वही आकाशरूपसे विद्यमान है। सर्वत्र संसृति और जगत्‌के रूपमें भी वही है। वह सभी स्थानोंमें मोक्षरूपसे

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * शुद्ध चित्तमें थोड़े-से ही उपदेशसे महान् प्रभाव पड़ता है * ७८५

विद्यमान है। सभी जगह वह चिन्मय तत्त्वरूपसे स्थित है। वह सर्वत्र सभी पदार्थोंके रूपमें है और वास्तवमें सब ओरसे सबसे रहित है। इस प्रकार परम बुद्धिमान् और उदारचित्त उस इन्द्रने देरतक ध्यान लगाकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको एकमात्र परमात्मामें स्थित देखते हुए हमलोगोंके द्वारा अनुभवमें लाये जानेवाले इस जगत्‌का भी अवलोकन किया। तदनन्तर इस सृष्टिके ब्रह्माण्डमें विचरता हुआ वह इन्द्र वहाँके इन्द्रलोकमें पहुँचकर जब इन्द्रके समीप गया, तब उसका 'मैं इन्द्र हूँ', यह संस्कार जाग उठा और वह प्रारब्धवश वहाँका इन्द्र हो गया। तत्पश्चात् वह सैकड़ों वृत्तान्तोंसे सुशोभित इस त्रिभुवनके राज्यका शासन करने लगा। त्रसरेणुके उदरमें निवास करनेवाला जैसे यह परम कान्तिमान् तथा इन्द्रकुलमें उत्पन्न इन्द्र बनाया गया है, वैसे ही इधर-उधर ऐसे व्यवहारवाले लाखों इन्द्र इस चेतन आकाशमें हो चुके हैं और मौजूद हैं।

विद्याधर ! तुम यह अच्छी तरह समझ लो कि जगत् अहंकारका कार्य है। अहंकारके भीतर जगत् कल्पित है और जगत्‌के अंदर अहंकार व्याप्त है। जो पुरुष संकल्प-शून्यतारूप ज्ञानसे जगत्‌के बीजभूत अहंभावका मार्जन कर देता है, उसने मानो जगत्-रूपी मलको जलके द्वारा ही पूर्णरूपसे धो डाला है। अतः विद्याधर ! अहंता नामकी भी कोई वस्तु नहीं है। वह अवास्तविक होनेके कारण खरगोशके सींगकी भाँति असत् एवं बिना कारणके ही प्रकट हुई है। ( सर्ग १४-१५ )


शुद्ध चित्तमें थोड़े-से ही उपदेशसे महान् प्रभाव पड़ता है, यह बतानेके लिये कहे गये भुशुण्डवर्णित विद्याधरके प्रसंगका उपसंहार, जीवन्मुक्त या विदेहमुक्तके अहंकारका नाश हो जानेसे उसे संसारकी प्राप्ति न होनेका कथन

भुशुण्डजी कहते हैं—मुने ! मैं इस प्रकार उपदेश दे ही रहा था कि उस विद्याधर-राजका सारा दृश्य-विषयक संकल्प शान्त हो गया। उसकी समाधि लग गयी। मैंने बारम्बार उसे इधर-उधरसे हिला-डुलाकर जगाया; परंतु परम निर्वाण पदको प्राप्त वह विद्याधर फिर सामनेके दृश्य विषयोंकी ओर उन्मुख नहीं हुआ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! भुशुण्डजीका बताया हुआ विद्याधरका इतिहास मुझे स्मरण हो आया; इसीलिये मैंने तुमसे कहा था कि शुद्ध चित्तमें उपदेश उसी तरह प्रभाव डालता है, जैसे पानीमें तेलकी बूँद। अहम्भावना ही दुःखनामक सेमरके वृक्षका मुख्य बीज है। उस अहम्भावनाके समान ही 'यह मेरा है' ऐसी बुद्धि भी उस वृक्षका आदिकारण है; क्योंकि यही रागादिरूपिणी शाखाओंके विस्तारका कारण है। पहले बीजरूपिणी अहंभावना होती है। फिर वृक्षरूपिणी ममभावना होती है। तत्पश्चात् शाखारूपिणी इच्छा (राग) की प्रवृत्ति होती है। यह इच्छा ही इष्टपदार्थके रूपमें सैकड़ों अनर्थोंको उत्पन्न करनेवाली तथा संसार-भ्रमका धारण-पोषण करनेवाली है।

५२८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रघुनन्दन ! मेरु पर्वतके शिखरपर पक्षिराज मुक्तात्मा मुनि काकभुशुण्डजी मुझसे पूर्वोक्त विद्याधरकी कथा सुनाकर चुप हो गये। श्रीराम ! तत्पश्चात् मै उन मुनिसे और उस सिद्ध विद्याधरसे भी विदा लेकर मुनिमण्डलीसे मण्डित अपने आश्रमपर आ गया। इस प्रकार आज मैने तुमसे काकभुशुण्डजीद्वारा कही गयी कथासे प्रतिपादित विषयका वर्णन किया है, जिसके अनुसार यह ज्ञात हुआ कि भुशुण्डजीके थोड़े से उपदेशसे ही विद्याधरको तत्त्वज्ञान प्राप्त होकर परम शान्ति मिल गयी। रघुनन्दन ! पक्षिराज भुशुण्डके साथ जब मेरा समागम हुआ था, तबसे आजतक ग्यारह महायुग व्यतीत हो चुके हैं।

श्रीराम ! यह सबको ज्ञात है कि बीजके भीतर सैकड़ों शाखाओंसे युक्त तथा पत्र, पुष्प और फलसे सम्पन्न वृक्ष विद्यमान है; क्योंकि बीजारोपणके पश्चात् प्रकट हुए उस वृक्षको सब लोग अपनी आँखोंसे देखते हैं, इसी तरह अहंकाररूपी सूक्ष्म बीजके भीतर समस्त दृश्यज्ञानसे युक्त यह शरीर वर्तमान है, यह विवेकी पुरुषोंने विचार-दृष्टिसे देखा है। परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप हुए जीवन्मुक्त पुरुषका शरीर लोकदृष्टिसे विद्यमान होनेपर भी वह अहंतामूलक अभिमानको नहीं प्राप्त होता। अतएव उससे संसाररूपी वृक्षका प्राकट्य नहीं होता अथवा जो विदेहमुक्त होकर निरतिशय आनन्दस्वरूप परमात्मामें प्रतिष्ठित हो चुका है, उस पुरुषके बोधरूपी महाग्निसे दग्ध हुए असत्स्वरूप अहंतारूपी बीजके भीतरसे फिर इस संसाररूपी वृक्षका प्रादुर्भाव नहीं होता।
(सर्ग १६-१७)


मृत पुरुषके प्राणोंमें स्थित जगत्‌के आकाशमें भ्रमणका वर्णन तथा परब्रह्ममें जगत्‌की असत्ताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सम्पूर्णतः नाशरूप मृत्यु कभी नहीं होती है। अपने दूसरे संकल्पोंका कुछ कालतक स्थिर रहना ही मरण कहलाता है। प्राणके भीतर चित्त है और चित्तके भीतर विविध आकार-प्रकारसे युक्त जगत् वैसे ही विद्यमान है, जैसे बीजके भीतर वृक्ष। पुरुषकी मृत्यु हो जानेपर उसके शरीरसे निकले हुए प्राण बाह्याकाशमें भरे हुए वायुसमूहके साथ ऐसे मिल जाते हैं, जैसे समुद्रके जल नदियोंके जलके साथ मिलकर एक हो जाते हैं। आकाशमें विद्यमान वायुके भीतर मृत प्राणियोंके प्राण हैं। उन प्राणोंके भीतर उनका मन है और उस मनके भीतर जगत्‌को उसी प्रकार स्थित समझो, जैसे तिलमें तेल रहता है। रघुनन्दन ! जैसे वायुमें स्थित सुगन्ध इधर-उधर ले जायी जाती है, उसी तरह प्राण-वायुमें स्थित आकाशात्मक जगत् इधर-उधर यत्र-तत्र ले जाये जाते हैं। जैसे घड़ेको एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँचा देनेपर उसके भीतरके आकाशमें कोई भेद नहीं होता, उसी प्रकार स्पन्दन आदिसे युक्त चित्तमें तीनों जगत्‌का भ्रम रहनेपर भी चेतन आत्मामें वस्तुतः वह स्पन्दन और भ्रम नहीं होता है। जगत् और इसका भ्रम दोनों उदित नहीं हैं। यदि उदित हों तो भी वायुद्वारा किये गये इस पृथ्वीके परिक्रमण आदिको इसके ऊपर स्थित हुए प्राणी उसी तरह नहीं देख पाते हैं, जैसे नौकाके भीतर बैठे हुए मनुष्य उसकी गतिको नहीं देखते हैं। वे तीनों लोक देश, काल, क्रिया तथा द्रव्यरूप ही हैं और अहंकार भी इन देश, काल आदिके साथ सम्बन्ध रखनेके कारण देश-कालादि रूप ही है। अतः देश-कालादिरूप जगत् और अहंकारमें भेद नहीं है। अज्ञानीमें जिस प्रकार विकल्प-सम्पत्तिका उदय होता है, उस प्रकार ज्ञानीमें निश्चय ही उसका उदय नहीं होता है। चेतन आकाशरूप परमात्मा सर्वव्यापी और अनन्त हैं। इसलिये वह विकल्प-सम्पत्ति इसका स्वरूप न होनेके कारण सत्स्वरूपा नहीं है।

निर्वाण-प्रकरण उ०] * जीवके स्वरूप, स्वभाव तथा विराट् पुरुषका वर्णन * ५८९

परम चेतन—परब्रह्म परमात्मा सर्वस्वरूप सर्वशक्तिमान् है इसलिये उसमें गुण, वस्तु, क्रिया और जाति आदिसे अनन्तरूपताको प्राप्त तथा नाना प्रकारके कार्यों- का आरम्भ करनेवाले दिगन्तवर्ती जनसमुदायसे परिपूर्ण ये सब संसार चञ्चल जलाशयके भीतर प्रतिबिम्बित क्षणभङ्गुर नगरों एवं अपने अन्त:करणमें स्थित समस्त उपकरणोंसे भरे महानगरोंके समान असद्रूपसे ही स्थित हैं। (सर्ग १८)

जीवके स्वरूप, स्वभाव तथा विराट् पुरुषका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो वास्तवमें न परम अणुरूप कहा जा सकता है और न स्थूल, शून्य या अन्य कुछ ही, वरं जो चिन्मय, ज्ञानमात्ररूप और सर्वव्यापक है, वही जीव कहा जाता है। जिस- जिस पदार्थका जो भाव—असाधारण स्वरूप है, उसके रूपमें उन-उन पदार्थमें स्थित होकर जो तदाकार भासित होता है, उसे तुम जीव ही समझो; क्योंकि बारंबार देखनेपर उन-उन पदार्थोंके आकारमें उसीका अनुभव होता है। श्रीराम ! जीव जहाँ जिस प्रकार जो-जो संकल्प करता है, वहाँ वह तत्काल वैसा ही आकार धारण कर लेता है। जैसे चलना या हिलना-डुलना आदि चेष्टा वायुका स्वभाव है, उसी प्रकार विचित्र वस्तुओंका अनुभवरूप संसार जीवका स्वभाव ही है। इस बातका अपने अनुभवसे ही निर्णय कर लेना चाहिये। बालकको होनेवाले यक्षभ्रमके समान इसका हम उपदेशके द्वारा साधन नहीं करना चाहते। जीव चैतन्यघनलक्षण होनेके कारण ही अहम्भावनासे ही देश, काल, क्रिया और द्रव्यकी शक्तियोंका निर्माण करके स्थित होता है।

सर्वप्रथम परब्रह्म परमात्मासे मनोमयरूपसे उदित विराट् पुरुष (हिरण्यगर्भ) प्रकट हुआ। अतः वह आकाशके समान विशद, शान्त, नित्य, अनन्तरूप और प्रकाशमय है। वह अद्वितीय विराट् पुरुष सबसे उत्कृष्ट परमेश्वररूप है। वह पञ्चभूतात्मक न होनेपर भी पञ्चभूतात्मक-सा भासित होता है। वह अपने ही संकल्पसे कल्पित अनेक कल्पोंमें तथा क्षणभरमें स्वेच्छा- नुसार स्वयं प्रकट होता है और बारंबार प्रकट होकर फिर स्वयं ही अदृश्य हो जाता है। वह आकाशस्वरूप, सर्वव्यापी, अनन्त परमेश्वर स्थूल, सूक्ष्म, व्यक्त एवं अव्यक्तरूप हो सबके बाहर-भीतर स्थित है। यह वास्तवमें किंचिद्रूप न होनेपर भी व्यवहारकालमें किंचिद्रूप अवश्य है।

श्रीराम ! उस विराट् पुरुषके मूर्तामूर्त-स्वरूप आठ अङ्ग हैं—पाँच ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियसहित प्राण, छठी इन्द्रिय मन और अहंकार। उसी पुरुषने चार मुखोंसे युक्त होकर शब्द और अर्थकी कल्पनासे युक्त इस ऋक् आदि चारों वेदोंका गान किया है। उसीने शास्त्रीय सदाचारकी मर्यादा स्थापित की है, जो आज भी यथावत्रूपसे चली आ रही है। ऊपर अनन्त आकाश उस पुरुषका मस्तक है। नीचेका भूतल आदि उसके पैरोंका तलवा है। मध्यवर्ती आकाश उसका उदर है तथा यह ब्रह्माण्डमण्डप उसका शरीर है। अनन्त लोक-लोकान्तर उस पुरुषके पार्श्वभाग हैं। जल रक्त है। पर्वत मांसपेशियाँ हैं और सदा अविच्छिन्नभावसे बहनेवाले नदियाँ उसकी नाड़ियाँ हैं। समुद्र रक्तके आधार (रक्त- संचयकी पेशियों) हैं। द्वीप ही कोशोंको आवेष्टिन करने- वाली आँतें हैं। दिशाएँ फैली हुई भुजाएँ हैं। तारिकाएँ रोमावली हैं। उन्चास वातस्कन्ध प्राणवायु हैं। सूर्य- मण्डल प्रचण्ड नेत्र है और बड़वानल उसका पित्त है। चन्द्रमण्डल संकल्पात्मक मन है तथा पवन ही सारभूत आत्मा है। चन्द्रमारूपी मन ही शरीररूपी वृक्षका मूल कर्मरूपी विटपका बीज तथा सम्पूर्ण भावपदार्थोंका उत्पादन

५३० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

एवं संवर्धन करनेसे आनन्दका कारण है। इस प्रकार भाँति-भाँतिके आचारोंसे युक्त विराट् पुरुष सहस्रों बार प्रकट हो चुके हैं तथा सैकड़ों महाकल्प बीत चुके हैं, भविष्यमें होनेवाले हैं और इस समय भी विद्यमान हैं।

रघुनन्दन ! जो ब्रह्मसे अभिन्न है; अतएव जिसका महान् सम्बन्ध अनन्त कालतक बना रहता है, उस अनुभवस्वरूप अधिष्ठान-सत्ताके द्वारा परम विराट् पुरुष सब देश-कालमें स्थित रहता है। (सर्ग १९)


जगत्की संकल्परूपता, अन्यथादर्शनरूप जीवभाव तथा अहंभावनारूप महाग्रन्थिके भेदनसे ही मोक्षकी प्राप्तिका कथन और ज्ञानबन्धुके लक्षणोंका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह पञ्चभूतात्मा संकल्पपुरुष (विराट्) स्वयं जैसा-जैसा संकल्प करता है, वह ब्रह्मरूप आकाश भी वैसा ही प्रतीत होने लगता है। अतः विद्वान् पुरुष समस्त जगत्को विराट् पुरुषका एक संकल्प ही मानते हैं। वास्तवमें कहीं कोई वस्तु न तो स्थूल है और न सूक्ष्म ही है। भ्रमसे जहाँ जिस प्रकारकी कल्पनाका विस्तार होता है, वहाँ तत्काल वैसा ही अनुभव होने लगता है। मन चन्द्रमासे उत्पन्न हुआ है और चन्द्रमा मनसे। जैसे कुहरेसे आच्छादित हुई वस्तुका यथार्थ ज्ञान न होकर विपरीत ज्ञान होता है, उसी तरह अज्ञानसे आवृत्त आत्माका भी यथार्थ ज्ञान न होकर, जो अन्य प्रकारसे देखना या समझना है, वही जीवका स्वरूप है। इसीलिये विषयात्मक वस्तुओंमें उसकी प्रवृत्ति होती है। वह प्राण और इन्द्रिय आदि जड वस्तुओंसे तादात्म्यभावको प्राप्त होकर अपने यथार्थ-स्वरूपको उसी प्रकार नहीं देख पाता, जैसे जन्मान्ध मनुष्य मार्ग नहीं देख सकता। जगत्के रूपमें बढ़ी हुई अविद्या-शक्तिसे आवृत्त होकर जीव अपने अद्वैत स्वरूपमें ही द्रष्टा-दृश्य आदि द्वैतकी कल्पना करके उसमें अभिनिवेश (सुदृढ आग्रह) कर बैठता है। जैसे वायु स्पन्द-शक्तिसे आवृत्त होती है, उसी तरह उस अविद्या-शक्तिसे आच्छादित हुआ जीव अपने यथार्थ स्वरूपको नहीं देख पाता। अज्ञानकी सबसे बड़ी गाँठ है अहंभावना। वह मिथ्या विषयभूत और असत् है। उसका जो भेदन है, उसीको तत्त्वज्ञ पुरुषोंने मोक्ष कहा है।

श्रीराम ! मनुष्यको सदा ज्ञानी ही होना चाहिये, ज्ञानबन्धु नहीं। मैं अज्ञानीको अच्छा समझता हूँ, परंतु ज्ञानबन्धुको नहीं।

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! ज्ञानबन्धु किसे कहते हैं और ज्ञानी कौन बताया जाता है ? ज्ञानबन्धु होनेका क्या फल है और ज्ञानी होनेपर कौन-सा फल प्राप्त होता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे शिल्पी जीविकाके लिये ही शिल्पकलाको सीखता है, उसी प्रकार जो मनुष्य केवल भोगोपार्जनके लिये शास्त्रको पढ़ता और उसकी व्याख्या करता है किंतु स्वयं शास्त्रके कथनानुसार अनुष्ठानमें लगनेका प्रयत्न नहीं करता, वह ज्ञानबन्धु कहलाता है। शास्त्रोंके अभ्याससे जिसे शाब्दिक बोध तो प्राप्त हो गया है, परंतु विनाशशील भोग-व्यवहारोंमें उनसे वैराग्य आदिके रूपमें उस बोधका कोई फल नहीं दिखायी देता, उसका वह बोध केवल शिल्प है—तत्त्व-ज्ञानकी कथा कहकर दूसरोंको ठगनेके लिये चातुर्यपूर्ण कलामात्र है; उस कलासे केवल जीवननिर्वाह मात्र करने-वाला होनेके कारण वह पुरुष ज्ञानबन्धु कहलाता है। जो केवल भोजन और वस्त्रमात्रसे संतुष्ट हो भोजन आदिकी प्राप्तिको ही शास्त्राध्ययनका फल समझते हैं, वे शास्त्रोंके अर्थको शिल्पकलाके रूपमें धारण करनेवाले हैं। ऐसे पुरुषोंको ज्ञानबन्धु जानना चाहिये। तत्त्वज्ञ पुरुष परमात्म-ज्ञानको ही ज्ञान मानते हैं। उससे भिन्न जो दूसरे-दूसरे ज्ञान हैं, वे ज्ञानाभासमात्र हैं; क्योंकि उनके द्वारा सार-

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * ज्ञानीके लक्षण, जीवके बन्धन और मोक्षका स्वरूप * ५३१


तत्त्व परब्रह्म परमात्माका बोध नहीं होता । जो परमात्म-ज्ञानको न पाकर अन्य प्रकारके ज्ञानलेशकी प्राप्तिसे ही संतुष्ट हो लौकिक सुखके लिये कष्ट-साध्य चेष्टाएँ किया करते हैं, वे ज्ञानबन्धु माने गये हैं । मनुष्यको चाहिये कि इस संसारमें आहारकी प्राप्तिके लिये शास्त्रानुकूल अनिन्द्य कर्म करे । आहार भी उतना ही करे, जितनेसे प्राणोंकी रक्षा हो सके । प्राणरक्षा भी तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये ही करे । तत्त्वज्ञानकी इच्छा सबके लिये अत्यन्त आवश्यक है, जिससे फिर कभी जन्म-मरण आदि दुःखोंकी प्राप्ति न हो ।* ( सर्ग २०-२१ )


ज्ञानीके लक्षण, जीवके बन्धन और मोक्षका स्वरूप, ज्ञानी और अज्ञानीकी स्थितिमें अन्तर, दृश्यकी असत्ता तथा परब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो तत्त्वज्ञानके द्वारा ज्ञातव्य परब्रह्म परमात्मामें दृढ़ निष्ठा हो जानेके कारण पूर्वकृत कर्मोंके फलस्वरूप सुख-दुःखादि प्रारब्धका, शब्द आदि जड विषयोंका तथा चित्तका भी सद्‌रूपसे अनुभव नहीं करता है, वह ज्ञानी कहलाता है । परमात्माके स्वरूपको यथार्थ रूपसे जान लेनेपर जिस तत्त्वज्ञके समस्त व्यवहार उस तत्त्वज्ञानके अनुरूप ही होते हैं एवं जिसके चित्तकी सम्पूर्ण वासनाओंका अभाव हो चुका है, वह ज्ञानी कहलाता है । जो परमात्म-लाभसे संतुष्ट हो स्वाभाविक-रूपसे परम शान्त है तथा जिसकी सभी चेष्टाओंमें बुद्धिमान् पुरुषोंको आन्तरिक शान्तिका अनुभव होता है, वह ज्ञानी कहलाता है । जो बोध मोक्षका कारण है, पुनर्जन्मका कभी नहीं, उसीका नाम ज्ञान है । उसके सिवा दूसरा जो शब्दज्ञानका चातुर्य है, वह शिल्प-जीविका—जीवननिर्वाहकी कलामात्र है । उसे भोजन, वस्त्रको जुटानेवाली व्यवस्था समझना चाहिये । प्रारब्धके अनुसार जो भी कार्य प्राप्त हो जाय, उसमें जो पुरुष कामना और संकल्पसे रहित होकर प्रवृत्त होता है तथा जिसका हृदय शरत्कालके आकाशकी भाँति आवरण-शून्य ज्ञानके आलोकसे प्रकाशित है, वह पण्डित (ज्ञानी) कहलाता है ।

ये जो जगत्‌के विविध पदार्थ हैं, वे किसी कारणके बिना ही उत्पन्न-से होते हैं । इसलिये ये वास्तवमें हैं ही नहीं, तो भी विद्यमानकी भाँति प्रतीत होते हैं । जो असत्य होते हुए भी भासित हो रहे हैं, उन पदार्थोंकी प्रतीतिमें एकमात्र यह अज्ञान ही कारण है । इस अज्ञानका ज्ञानकालमें तत्काल नाश हो जाता है । यह जीव अपनेसे भिन्न जड अहंकार और शरीर आदिका जब अनुभव करता है, तब तत्काल ही उनके साथ अपना तादात्म्य मानकर उनको अपना स्वरूप समझ बैठता है । यही इसका संसार-बन्धन है और जब यह अपनेको चिन्मय समझता है, तब सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप ही हो जाता है । यही इसका मोक्ष है । यह जीव जो अज्ञान-निद्रामें पड़कर अचेत हो रहा है, जब जाग उठता है, तब परमात्मरसके आवेशसे परमात्मरूपताको ही प्राप्त हो जाता है—ठीक उसी प्रकार जैसे हेमन्त ऋतुमें सोया हुआ-सा आम्रका वृक्ष वसन्त ऋतुमें रसावेशके कारण प्रबुद्ध-सा होकर जब पल्लवित एवं पुष्पित हो जाता है, तब 'सहकार' नाम धारण करता है । जो दृश्य शोभाके पारदर्शी ज्ञानी पुरुष परदृष्टि (तत्त्वज्ञान) को प्राप्त कर चुके हैं, उन्हें इस विस्तृत दृश्यप्रपञ्चके विद्यमान होनेपर भी इसका भान नहीं होता (वे सबको परब्रह्म ही समझते हैं) । जो परदृष्टिको प्राप्त हो चुके


* अन्नाहारार्थं कर्म कुर्यादनिन्द्यं कुर्यादाहारं प्राणसंधारणार्थम् ।
प्राणा संधार्यास्तत्त्वजिज्ञासनार्थे तत्त्वं जिज्ञास्यं येन भूयो न दुःखम् ॥
(नि० उ० २१ । १८)

५३२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठं

हैं, उन्हें दृश्य-प्रपञ्चका भान न होनेके कारण उनकी चेष्टा भी वास्तवमें चेष्टा नहीं होती। ज्ञानी पुरुष दृश्य-दर्शनके अभिमानसे बँधते नहीं, इसलिये बन्धनमुक्त साँड़की भाँति सांसारिक कर्मबन्धनके सम्बन्धसे रहित रहते हैं। वे प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए कर्मोंके लिये उसी तरह काम और संकल्पसे रहित होकर चेष्टाएँ करते हैं, जैसे वृक्षके पत्तोंको कम्पित करनेमें वायु। जो संसारके पारदर्शी पुरुष सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मदृष्टिको प्राप्त कर चुके हैं, वे कर्मकी प्रशंसा नहीं करते हैं—ठीक उसी तरह, जैसे नदीके तटपर निवास करनेवाले पुरुष कूपकी प्रशंसा नहीं करते। किंतु अज्ञानी पुरुषोंकी इन्द्रियाँ अधःपतनके हेतुभूत विषयोंपर इस प्रकार गिरती हैं, जैसे गीध मांसके ऊपर टूट पड़ता है। इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मनके द्वारा वशमें करके समाहित-चित्त हो उस परब्रह्म परमात्माके चिन्तनमें लग जाय।

जैसे सुवर्ण कटक, कुण्डल आदि आभूषणोंसे भिन्न नहीं है, उसी तरह ब्रह्म भी सृष्टिसे भिन्न नहीं है; इसीसे 'सृष्टि' आदि शब्दोंका अर्थ तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें कल्याणमय ब्रह्म ही कहा गया है। जैसे कल्पके अन्तमें जब एकमात्र अन्धकार ही छा जाता है, तब यह सारा व्यवहार निर्विभाग और निराभास ही रहता है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें यह जगत् विभाग और आभाससे रहित ही रहता है। जैसे अवयवरहित आकाशमें दिशाओंके विभागरूप आकाशके अवयवोंकी अभिन्न सृष्टि भासित होती है, उसी प्रकार अवयवरहित शिवस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें यह द्वैताद्वैत सृष्टि भी अभिन्नरूपसे विद्यमान है। इस प्रकार जगत्‌के भीतर अहंकार और अहंकारके भीतर जगत् है। ये दोनों एक दूसरेमें उसी प्रकार स्थित हैं, जैसे केलेके तनेकी छालमें तना और तनेमें उसकी छाल होती है।

जिस ग्वालेका मन गोशालाके बर्तनों (दूध दुहनेके पात्रों) में लगा हुआ है, वह घरमें रहकर घरके काम करता हुआ भी उन्हें नहीं देख पाता, उसी प्रकार तत्त्वज्ञानी पुरुष जीवन-निर्वाहके लिये सब कार्य करता हुआ भी ब्रह्मचिन्तनमें रत होनेके कारण उन्हें नहीं देखता है। जिसके भीतर तुच्छ दृश्य-प्रपञ्चकी भावना नहीं है, वह जीते-जी आकाशके समान निर्मल और बन्धनसे छूटे हुएकी भाँति मुक्त है। जो पुरुष सांसारिक पदार्थोंमें अभावरूपताकी भावना नहीं करता, मोक्षके लिये यत्न न करनेवाले उस पुरुषका जन्म-मरणरूपी अनन्त दुःख कभी शान्त नहीं होता। तत्त्वज्ञानी पुरुष यहाँ सम्राट्‌के समान शोभा पाता है। उसे प्रारब्ध-वश जो कोई भी वस्त्र देकर उसके शरीरको ढक देता है, जो कोई भी भोजन करा देता है तथा वह जहाँ-कहीं भी सो जाता है। वह समग्र विशुद्ध वासनाओंसे युक्त होकर भी वासनारहित ही रहता है। भीतरसे शून्य होता हुआ भी परिपूर्णात्मा होता है अर्थात् उसका अन्तःकरण पूर्ण परब्रह्मकी भावनासे भरा होता है और जैसे आकाशमें वायु चलती है, उसी तरह उसकी भी साँस चलती रहती है (परंतु वह देह और उसकी वासनाओंसे रहित हुआ परब्रह्मरूपसे ही स्थित रहता है)। तत्त्वज्ञानी पुरुष निर्वाण-दशाको प्राप्त हो मनके द्वारा ब्रह्मभावका मनन करनेसे जब परमानन्दमें निमग्न हो जाता है, तब नींदमें पड़े हुए मनुष्यकी भाँति आसन, शय्या अथवा सवारीमें स्थित वह यत्नपूर्वक जगानेसे भी नहीं जागता। रघुनन्दन ! तत्त्वज्ञानी और अज्ञानी—दोनोंके सम्पूर्ण उत्पत्ति-विनाशशील कर्मोंमें वासना-शून्यताके सिवा दूसरा कोई अन्तर नहीं होता (अर्थात् ज्ञानी वासनारहित होकर कर्म करता है और अज्ञानी वासनायुक्त होकर)।

यह सारा दृश्य-प्रपञ्च नष्ट होता है और नष्ट होकर फिर उत्पन्न होता है, इसलिये असत् है। परंतु जो न तो कभी नष्ट हुआ और न उत्पन्न ही हुआ, वही सत्स्वरूप परमात्मा है और वह परमात्मा ही तुम हो। ज्ञानसे जगत्-रूपी भ्रमका मूल (अज्ञान) नष्ट हो जाता है। फिर

निर्वाण-प्रकरण उ०] * मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महान् वनमें महर्षि वसिष्ठ और मङ्किका समागम * ५३३

तो ढूँढ़नेपर भी इस भ्रमका पता नहीं चलता। जैसे मृगतृष्णा जल नहीं दे सकती, उसी तरह निर्मूल हुआ भ्रम संसाररूपी अङ्कुर नहीं उत्पन्न कर सकता। जैसे जला हुआ बीज अङ्कुरित नहीं हो सकता, उसी प्रकार परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे छिन्न हुई अहम्भावना दिखायी देनेपर भी मनोभूमिमें संसाररूपी वृक्षका अंकुर नहीं उत्पन्न कर सकती। मानसिक विकारोंसे रहित वीतराग तत्त्वज्ञानी पुरुष कर्म करे या न करे, उसकी स्थितिमें कोई अन्तर नहीं आता। वह तो मनके संकल्पसे रहित एवं नित्य शान्त हुआ परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता है। जो लोग योगका आश्रय लेकर शान्त बने हुए हैं, वे योगी भी चित्तका उपशमन होनेपर ही भलीभाँति शान्त हो पाते हैं, अन्यथा नहीं; क्योंकि उनकी भोग-वासनाएँ मूलतः क्षीण नहीं होतीं। (कारण यह है कि इन वासनाओंकी खानरूप जो चित्त है, वह तो उनका बना ही रहता है।) अनन्त, अव्यक्त एवं सुन्दर चिदाकाशरूप कर्पूर अपने भीतर स्वयं जो चमत्कार प्रकट करता है, उसीको वह जगद्रूपसे जानता है। रघुनन्दन ! इस तरह यह जगत् तत्त्वज्ञानी पुरुषको उसका सांसारिक भ्रम दूर हो जानेके कारण प्रकाशमय तथा शान्त अक्षय ब्रह्मरूप ही भासित होता है, जब कि अज्ञानीको यह परमार्थतः परब्रह्म परमात्मामें स्थित होकर भी भोगजनित आनन्दके अनुगत ही प्रतीत होता है। (इस प्रकार दोनोंकी दृष्टियोंमें भेद है।) (सर्ग २२)


मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महान् वनमें महर्षि वसिष्ठ और मङ्किका समागम एवं संवाद

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! पहलेकी बात है। मङ्किनामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे, जो बड़े कठोर व्रतका पालन करते थे। उन्हें मेरे उपदेशसे किस प्रकार निर्वाणपदकी प्राप्ति हुई, यह बताता हूँ, सुनो। एक समय तुम्हारे पितामह राजा अजके किसी कार्यसे बुलाने-पर मैं आकाशमण्डलसे इस पृथ्वीपर आया। तुम्हारे पितामहकी नगरी अयोध्याको आते समय मैं भूतलपर विचरता हुआ किसी ऐसे विशाल वनमें आ पहुँचा, जहाँ बड़ी कड़ाकेकी धूप पड़ रही थी। श्रीराम ! अविच्छिन्नरूपसे धूल उड़नेके कारण वह सारा जंगल धूसर हो रहा था। वहाँ तपी हुई बालूके कण खूब चमक रहे थे। उस वन-का कहीं ओर-छोर नहीं दिखायी देता था। वहाँ कहीं-कहीं निकृष्ट श्रेणीके गाँवके चिह्न दृष्टिगोचर होते थे। मैं उस जंगलमें जाकर ज्यों ही इधर-उधर घूमने लगा, त्यों ही मुझे अपने सामने एक पथिक दिखायी दिया जो श्रमसे थककर इस प्रकार कह रहा था।

पथिक कह रहा था—अहो! जैसे दुष्ट पुरुषोंका पापपूर्ण सङ्ग संताप देनेवाला ही होता है, उसी प्रकार

५३४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्रचण्ड आतपसे तपते हुए ये सूर्यदेव इस समय सब ओरसे खेद ही प्रदान कर रहे हैं। मेरे सारे मर्मस्थल मानो जलते जा रहे हैं। इस धूपमें आग-सी जल रही है। सारी वन-श्रेणियाँ तप्त हो उठी हैं। इनके पत्ते और फूल सिकुड़ गये हैं। इसलिये यह सामने जो छोटा-सा गाँव दिखायी दे रहा है, मैं पहले इसीमें प्रवेश करता हूँ। वहाँ शीघ्रतापूर्वक थकावट दूर करके तीव्र गतिसे अपना रास्ता लूँगा। (यों कहकर वह सामनेके छोटे-से गाँवमें, जहाँ किरातोंकी बस्ती थी, ज्यों ही घुसने लगा त्यों ही मैंने उससे यह बात कही—'सुन्दर शरीरवाले साथी ! जान पड़ता है, तुम्हें वीतराग अकिंचन पुरुषों-के संचरण योग्य मार्गका ज्ञान नहीं है। मरुभूमिके मार्ग-में मिले हुए इस महान् जंगलके राही ! तुम्हारा स्वागत है। नीचेके मार्गसे चलनेवाले राहगीर मनुष्य देशके इस मार्गपर, जहाँ जनसमुदायसे भरे हुए गाँवका अभाव है, थोडा-सा विश्राम कर लेनेपर भी चिरस्थायी विश्राम प्राप्त नहीं कर सकोगे। (तात्पर्य यह कि तुम सकाम कर्मके पथपर चल रहे हो। इस सकाम-कर्मोपासनाद्वारा दक्षिणमार्गसे स्वर्गादि लोकोंमें जाकर कुछ कालतक मनोऽनुकूल सुख भोगनेपर भी वहाँ देहाभिमानसे बँधे रहनेके कारण चिरस्थायी परमानन्दस्वरूप मोक्ष नहीं पा सकोगे।) पामरोंके आवासस्थान इस गाँवमें (देहाभिमानियों-के निवासस्थान इस शरीरमें) विश्राम नहीं मिल सकता। जैसे नमकीन पानी पीनेसे प्यास बढ़ती ही है, घटती नहीं, उसी प्रकार यहाँ सुखभोगकी इच्छा बढ़ती है, परंतु पूरी नहीं होती। यहाँ रहनेवाले प्राणी काम, धनकी आसक्ति और द्वेष आदिमें ही पुरुषार्थकी पराकाष्ठा समझते हैं। इनके विचार जले हुए हैं। इसलिये ये आपातरमणीय सकाम कर्मोमें ही रमते रहते हैं, जिससे उनमें कुलीनता-के कारण विस्तारको प्राप्त होनेवाली, उदार, शीतलतथा-ब्रह्मानन्दसे सुशोभित होनेवाली विवेकयुक्त बुद्धि नहीं होती। जैसे मधुमिश्रित विषके कण पलभरके लिये स्वादमें मीठे होते हैं, किंतु दूसरे ही क्षण अपनी ओरसे विराग उत्पन्न कर देते हैं और अनिवार्यरूपसे मृत्युदायक होते हैं, उसी प्रकार ग्राम्य सुखभोग क्षणभरके लिये मधुर प्रतीत होते हैं किंतु दूसरे ही क्षण विराग पैदा कर देने तथा प्रायः मार डालनेवाले होते हैं (अतः इनके उपभोगसे तुम्हें चिर विश्रामकी उपलब्धि नहीं हो सकती) !' निष्पाप श्रीराम ! जब मैंने ऐसी बात कही, तब मेरे वचनसे उसे इतनी शान्ति मिली, मानो उसने अमृतमय जलसे स्नान कर लिया हो। तत्पश्चात् वह मुझसे इस प्रकार बोला।

पथिकने कहा—भगवन् ! आप कौन हैं ? आप भीतरसे पूर्णकाम आत्मज्ञानी महात्मा जान पड़ते हैं। आप इस जगत्को शान्तभावसे देख रहे हैं। क्या आपने अमृतका पान किया है ? क्या आप सम्राट् या विराट् पुरुष हैं ? सम्पूर्ण अर्थोंसे रिक्त होते हुए भी आप परिपूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे हैं। मुने ! आपका शान्त, कान्तिमान्, अप्रतिहत, सब ओरसे निवृत्त तथा शक्तिशाली तेजस्वी रूप जो दिखायी देता है, यह कैसे ? आप पृथिवीपर स्थित होकर भी ऐसे जान पड़ते हैं, मानो समस्त लोकोंके ऊपर आकाशमें खड़े हों। आपकी संसारमें कहीं भी आस्था नहीं है, तथापि मुझ-जैसे लोगों-के उद्धारके लिये आप अत्यन्त दृढ़ आस्थासे युक्त दिखायी देते हैं। आप पूर्ण चन्द्रमाके समान सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त होते हुए भी निष्कलङ्क हैं। आपका अन्तःकरण शीतल है। आप प्रकाशमान, समत्वबुद्धिसे युक्त तथा रसायनकी राशिसे सम्पन्न होकर अपनी सहज शोभासे प्रकाशित हो रहे हैं। महाभाग महर्षे ! मैं शाण्डिल्य गोत्रमें उत्पन्न ब्राह्मण हूँ। मेरा नाम मङ्कि है। मैं तीर्थयात्राके लिये निकला था। मैंने दूरतकका रास्ता तय करके बहुत-से तीर्थोंका दर्शन किया है और अब दीर्घ-कालके पश्चात् अपने घरको जानेके लिये उद्यत हुआ हूँ। इस ब्रह्माण्डके भीतर बिजलीकी चमकके समान क्षण-

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मङ्किके द्वारा संसारके दोषों तथा उनसे होनेवाले कष्टोंका वर्णन * ५३५


मङ्गुर भूतोंको देखकर मेरा मन संसारसे विरक्त हो रहा है। अतः अब मुझे घर लौटनेका उत्साह नहीं है। भगवन् ! मुझपर कृपा करके आप अपना यथार्थ परिचय दीजिये; क्योंकि साधु पुरुषोंके हृदयरूपी सरोवर स्वच्छ एवं गम्भीर होते हैं। दर्शनमात्रसे ही मित्रता करनेवाले आप-जैसे महात्माओंके सामने आ जानेपर ही समस्त प्राणी कमलोंके समान विकसित और आश्वस्त होते हैं। प्रभो ! मैं समझता हूँ कि मेरा यह मन मोहवश संसार-श्रमजनित दुःखको मिटानेमें समर्थ नहीं है। अतः आप मुझे तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेकी कृपाद्वारा अनुगृहीत कीजिये।

तब मैंने कहा—महाबुद्धे ! मैं आकाशवासी वसिष्ठ मुनि हूँ। राजर्षि अजके किसी आवश्यक कार्यसे मैं इस मार्गपर उपस्थित हुआ हूँ। ब्रह्मन् ! अब तुम विषाद न करो; क्योंकि मनीषी पुरुषोंके मार्गपर आ गये हो और प्रायः संसार-सागरके दूसरे तटपर आ पहुँचे हो। जो महात्मा नहीं है, उसकी बुद्धि और वाणी इस तरहके वैराग्य-वैभवसे उदार नहीं होती तथा उसकी आकृति भी इतनी शान्तिपूर्ण नहीं दिखायी देती। जैसे धीरे-धीरे सानपर घिसनेसे मणि साफ होकर चमक उठती है, उसी प्रकार राग आदि मलोंके पक जानेसे चित्तमें विवेकका उदय होता है। बताओ, तुम क्या जानना चाहते हो ? और इस संसारको क्यों छोड़नेकी इच्छा रखते हो ? मैं तो यह मानता हूँ कि साधक अपने ही प्रयत्नोंसे महात्माओंके दिये हुए उपदेशको सफल बनाता है। जिसकी वासना रागादि मलोंसे रहित हो गयी है, अतएव जिसका हृदय वैराग्य आदि उत्तम साधनोंसे सम्पन्न है तथा जिसकी बुद्धि नित्यानित्य एवं सारासारके विवेकसे सुशोभित है, ऐसा साधक ही महापुरुषोंके उपदेशरूपी तेजसे शोकरहित विशुद्ध परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करनेका अधिकारी होता है, दूसरा नहीं। इसलिये जन्म आदि सम्पूर्ण दुःखोंसे पार होनेकी इच्छा रखनेवाले तुमसे मैं यह कहता हूँ कि तुम उपदेश पानेके योग्य हो। अतः अपना पूर्व वृत्तान्त बताओ।

( सर्ग २३ )


मङ्किके द्वारा संसार, लौकिक सुख, मन, बुद्धि और तृष्णा आदिके दोषों तथा उनसे होनेवाले कष्टोंका वर्णन और वसिष्ठजीसे उपदेश देनेके लिये प्रार्थना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जब मैंने ऐसी बात कही, तब मङ्कि मेरे चरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम करके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भरकर मार्गमें चलते हुए ही इस प्रकार बोले।

मङ्किने कहा—भगवन् ! जैसे नेत्र बारंवार दसों दिशाओंकी ओर दृष्टिपात करते हैं, उसी प्रकार मैंने भी संत-महात्माकी खोजके लिये अनेक बार दसों दिशाओंमें भ्रमण किया; परंतु संशयका विनाश करनेवाला कोई श्रेष्ठ महापुरुष मुझे नहीं मिला। आज आपको पाकर मैंने समस्त शरीरोंके सारोंके भी सार इस ब्राह्मणशरीरका फल पा लिया। भगवन् ! संसाररूपी दोष प्रदान करनेवाली दशाओंको देखते-देखते मैं उद्विग्न हो उठा हूँ। मुने ! संसारके सभी सुख अन्ततोगत्वा अवश्य ही दुःखरूपमें परिणत हो जाते हैं, इसलिये वे अत्यन्त दुःखरूप ही हैं। इन सांसारिक सुखोंकी अपेक्षा तो दुःख ही श्रेष्ठ है। अन्तमें सुदृढ़ दुःखकी प्राप्ति करानेके कारण ये लौकिक सुख मुझे दुःखमें ही डाल रहे हैं, मानो मेरे लिये दुःख ही सुखके रूपमें प्राप्त हुआ हो।


१. मित्रका दूसरा अर्थ सूर्य है। सूर्यके सामने कमल खिलते हैं, अतः यहाँ 'मित्रता' शब्द मैत्री तथा सूर्यसम्बन्धी दोनों अर्थोंका वाचक है।

५३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

दाँत, केश और आँतोंके साथ ही मेरी अवस्था भी अब जरासे जर्जर हो गयी है। मेरा मन पीपलके उड़ते हुए सूखे पत्ते आदिके संचयसे गंदे गाँवोंके मध्यभागकी भाँति मलिन हो गया है तथा मेरी जीविका भी नाना प्रकारकी भोग-वासनारूपी दुर्गन्धोंको अपने अङ्गमें धारण करनेवाली गृध्रतुल्य इन्द्रियोंके कारण निकृष्ट गाँवोंकी स्थितिके समान अत्यन्त पापपूर्ण एवं दुःखदायिनी हो गयी है। मेरी बुद्धि काँटेदार वृक्षपर फुननेवाली चोंचके समान विकराल एवं कुटिल है। आयाससे युक्त और अज्ञानान्धकारसे आच्छादित जो विषयोंकी निरन्तर चिन्ता है, उसमें रत रहकर मैंने अपनी सारी आयु व्यर्थ गवाँ दी है। ब्रह्म-साक्षात्कार-रूपी प्रकाश मुझे इस जीवनमें अभीतक नहीं मिला। स्वजनोंमें आसक्त हुआ यह जीवन जीर्ण हो चला, परंतु अबतक मैं संसारको पार न कर सका। जन्म-मरणका भय देनेवाली भोगोंकी अभिलाषा दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। कण्टकयुक्त और अपवित्र स्थानमें स्थित भिलावेके वृक्षकी भाँति मेरा मन भी क्रूरतासे युक्त और अपवित्र विषयोंमें रत है। यह सारे शरीरमें फैलने या रेंगने-वाले अर्जुनवात नामक रोगके समान चञ्चल है तथा असत् होनेपर भी सङ्कल्पद्वारा बड़े-बड़े कर्मोंका आरम्भ करनेवाला है। इसकी इच्छाएँ कभी पूरी नहीं हुईं तथा शरीरोंके मरनेपर भी इसकी मृत्यु नहीं हुई। यह केवल दुःख देनेके लिये ही उछल-कूद मचाता है। मैंने अवस्तुको ही वस्तु समझा है। मेरा मनरूपी हाथी मतवाला हो गया है और इन्द्रियाँ मुझे काटे डालती हैं। न जाने मेरी क्या दशा होगी। मैंने ज्ञानी पुरुषोंकी सेवा करके वह शास्त्रीय दृष्टि नहीं प्राप्त की, जो संसार-सागरसे पार करनेके लिये नौकाके समान है। तात ! इसलिये इस प्रकार सब ओरसे अनर्थोंकी ही प्राप्ति होनेके कारण मैं अत्यन्त भयंकर मोहमें डूब गया हूँ। इस मोह सागरसे उद्धार पानेके लिये भविष्यमें जो कल्याणकारी उपाय हो, उसीको मैं पूछ रहा हूँ। अतः कृपा करके आप उसे बताइये। श्रेष्ठ महात्मा पुरुषका सङ्ग प्राप्त होनेपर मोहका नाश हो जाता है और समस्त आशाएँ निर्मल हो जाती हैं—ठीक उसी तरह जैसे शरत्काल आनेपर कुहरे मिट जाते हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ हो जाती हैं। संतोंकी महिमाके विषयमें जो ऐसी बात कही गयी है, वह आपके द्वारा मुझे भवरोगको शान्त करनेवाले बोधकी प्राप्ति करनेके साथ ही सत्य एवं सफल हो।
(सर्ग २४)


संसारके चार बीजोंका वर्णन और परमात्माके तत्त्वज्ञानसे ही इन बीजोंके विनाशपूर्वक मोक्षका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजीने (मैंने) कहा—ब्रह्मन् ! संवेदन¹, भावन², वासना³ और कलना⁴—ये चार ही शब्द ऐसे हैं, जिनके अर्थ इस संसारमें अनर्थ पैदा करनेवाले हैं। ये सभी मिथ्या होनेके कारण निष्प्रयोजन हैं, तथापि अविद्यासे विस्तारको प्राप्त हो रहे हैं। वेदन और भावन—इन दोको समस्त दोषोंका आश्रय समझो। इनमें भी जो भावन है, उसीमें सारी आपत्तियाँ निवास करती हैं—ठीक वैसे ही, जैसे वसन्तऋतुके द्वारा प्रवर्तित रसमें ही पुष्प, पल्लव आदिसे समृद्ध लताएँ विद्यमान रहती हैं (क्योंकि लताका सारा वैभव उस रसका ही परिणाम होता है)। यह संसारमार्ग बड़ा गहन है। इसपर वासनाका आवेश लेकर चलते हुए प्राणीके ऊपर विचित्र परिणामवाले अनेक प्रकारके घटना-चक्र आते रहते हैं। जो


१. पहले-पहल इन्द्रियोंसे जो विषयोंका उपभोग होता है उसीको संवेदन कहते हैं। २. विषयोंके नष्ट हो जानेपर उनका बारम्बार चिन्तन ही भावन कहा गया है। ३. बारंबार विषय-चिन्तनसे जो चित्तमें विषयोंका दृढ़ संस्कार जम जाता है, उसका नाम वासना है। ४. उस वासनाके कारण मृत्युकालमें भावी शरीरके लिये जो स्मृति होती है, उसको कलना कहते हैं।

निर्वाण प्रकरण उ०] * भावना और वासनाके कारण संसार-दुःखकी प्राप्ति तथा विवेकसे उसकी शान्ति * ५३७


विवेकी है, उसका संसारभ्रम वसन्तके अन्तमें ग्रीष्म ऋतुके तापसे सूख जानेवाले पृथ्वीके रसकी भाँति वासना-सहित नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार वसन्त ऋतुका रसप्रवाह कदलीवनमें फैलनेवाली कदलीका विस्तार करती है, उसी प्रकार वासना मनारूपी काँटेदार झाड़ीका प्रसार करती है। यहाँ अद्वितीय विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माके सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है। जैसे अनन्त आकाशमें शून्यरूपताको छोड़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उसी प्रकार असीम परमात्मामें चैतन्य सत्ताके सिवा और कोई वस्तु नहीं है। जैसे बालकको वेतालके न होनेपर भी अज्ञानवश उसके होनेका भ्रम हो जाता है, उसी प्रकार असत् होकर भी सत्की भाँति भासित होनेवाला यह संसार परमात्मतत्त्वको न जाननेके कारण ही अनुभवमें आ रहा है। परमात्मतत्त्वके ज्ञानका प्रकाश होते ही यह क्षणभरमें नष्ट हो जाता है। जो वस्तु तत्त्वज्ञानसे ज्ञात होती है, वह ज्ञानस्वरूप ही कही जाती है; क्योंकि अज्ञान ज्ञानका विरोधी है, इसलिये वह ज्ञानरूपसे नहीं जाना जाता। इस तरह विचार करनेसे ज्ञेय और ज्ञान दोनों एकरूप सिद्ध होते हैं। उनमें कोई भेद नहीं है। द्रष्टा, दर्शन और दृश्य—इन तीनोंमेंसे प्रत्येककी बोधरूपता ही सार है। जैसे आकाशमें फूल नहीं होता, उसी तरह द्रष्टा आदिकी त्रिपुटीमें ज्ञानरूपतासे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं होती। 'यह मेरा है' इस तरहकी ममता ही बन्धनमें डालनेवाली है और 'मैं यह शरीर आदि नहीं हूँ' इस प्रकार जो अहंताका अभाव है, वह ममताके बन्धनको दूर करके मुक्ति प्रदान करनेवाला है—जब यह समझ पूर्णतया अपने अधीन हो जाय, तब अज्ञान कहाँ रहा ! अपनी वासना और अभिमानके अनुसार राग आदि रससे रञ्जित लोग हथेलीसे ताड़ित हुए गेंदके समान खूब इधर-उधर उछल-कूदकर अन्तमें नरकोंके गर्तमें गिर जाते हैं। वहाँ दीर्घकालतक तरह-तरहकी वासनाओंके क्लेशोंसे भलीभाँति जर्जर हो कालान्तरमें पुनः स्थावर, कृमि-कीट आदि दूसरे-दूसरे रूपोंमें प्रकट होते हैं। (मानव-जन्म तो उनके लिये दुर्लभ ही बना रहता है।) (सर्ग २५)


भावना और वासनाके कारण संसार-दुःखकी प्राप्ति तथा विवेकसे उसकी शान्ति, सर्वत्र ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन एवं मङ्किके मोहका निवारण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! संसारके ये सभी पदार्थ वनमें बिखरे हुए प्रस्तर-खण्डोंके समान एक-दूसरेसे कोई लगाव नहीं रखते। भावना ही इन्हें एक-दूसरेसे जोड़नेके लिये शृङ्खला है। अहो ! कितने आश्चर्यकी बात है कि वासनाके वशीभूत होकर विवश हुए ये समस्त प्राणी विभिन्न जन्मोंमें विचित्र प्रकारके सुख-दुःखोंको भोगते रहते हैं। अहो ! यह वासना बड़ी विषम है, जिसके वशमें होकर लोग असत् विषयोंसे ही अपने मनमें तृप्तिका अनुभव करते हैं, यद्यपि यह तृप्ति उनका भ्रम ही है। जैसे रूपका अवलोकन दृष्टिका प्रसारमात्र है, उसी प्रकार अहंकारयुक्त जगत् जीवात्माके अविवेक और प्रमादसे पूर्ण मानसिक मरुप्रपञ्चका विस्तारमात्र है। जैसे वायु अपनी चेष्टाका प्रसार करती है, उसी प्रकार विशुद्ध जीवात्मा वास्तवमें शुद्ध होनेपर भी किञ्चित् अविवेकजनित प्रसरणमात्रसे अहंकारयुक्त असत् जगत्‌का विस्तार करता है। जैसे जड आकाश शून्यमात्र है, वायु स्पन्दनमात्र है और लहर आदि जलमात्र ही हैं, उसी प्रकार यह जगत् भी जीवात्माकी भावना या सङ्कल्पमात्र ही है। 'ब्रह्म' शब्दसे जिस महत्ताका प्रतिपादन किया जाता है, वही सम्पूर्ण पदार्थोंका उनका वास्तविक रूप है। इसमें किसी तरहकी शङ्का नहीं

५३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


है। इसलिये सब कुछ अविनाशी ब्रह्ममय ही है।

प्रिय विप्रवर ! आकाशके समान निर्मल आत्मामें मनको विलीन करके स्थित हुए ज्ञानयोगीको नाम और रूपकी प्रतीति ही नहीं होती। स्वरूपस्थितिके लिये उसके द्वारा किया गया अभ्यास जबतक दृढ़ नहीं हो जाता, तभीतक उसे अपने मनमें स्वप्न-विकारके समान नाम-रूपका भान होता है। मन जहाँ जो कुछ निर्माण या प्रसार करता है, वहाँ वह स्वयं ही उन-उन वस्तुओंका रूप धारण करके स्थित हो जाता है। अतः मनसे भिन्न किसी दृश्य वस्तुकी सत्ता न होनेके कारण यह दृश्य-प्रपञ्च वास्तवमें है ही नहीं। फिर कौन कहाँ किसकी सृष्टि करता है? जब जीवात्मामें अहंताकी रेखा खिंच जाती है, तभी वह संसार-भ्रमरूप भाव-विकारसे युक्त हो जाता है और जब अहंताकी वह रेखा मिट जाती है, तब वह अपने स्वरूपमात्रमें स्थित हो सहज शान्तिसे सुशोभित होता है। परमात्मा मोक्षरूप, मनसे रहित, मौनी, कर्ता, अकर्ता और शीतल है। वह ज्ञानस्वरूप एवं शान्त ही है। वह दृश्य-प्रपञ्चसे शून्य होता हुआ ही सर्वत्र परिपूर्ण है। जैसे किसी यन्त्रद्वारा बनाये गये पुतलेका शरीर वासना और चेष्टासे शून्य होता है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप आत्मा वास्तवमें वासनारहित एवं स्पन्दनशून्य है। वह व्यवहार-परायण प्रतीत होकर भी अपने यथार्थ स्वरूपमें ही स्थित रहता है।

जैसे झूलते हुए झूलेमें सोये हुए बालकके अङ्ग नहीं हिलते, झूलेके हिलनेसे ही उन अङ्गोंका हिलना प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुषमें स्वरूपानुसंधानके सिवा दूसरी कोई चेष्टा नहीं होती; वे परेच्छासे ही चेष्टाशील दिखायी देते हैं, स्वतः नहीं। आशा, चेष्टा, एषणा और कामना आदिसे रहित तथा बहिर्मुख वृत्तिसे शून्य जो अखण्ड आत्मबोध है, वह शान्त, अनन्त आत्मस्वरूप ही है। अतः उसे शरीर आदिका अनुसंधान होना कैसे सम्भव है। समस्त कामनाओंसे रहित जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुषको, जो द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीसे रहित निराकार ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार कर चुका है, शरीरका अनुसंधान कैसे हो सकता है। समस्त वस्तुओंकी अपेक्षा (इच्छा) ही सुदृढ बन्धन है और उनकी उपेक्षा ही मुक्ति है। जो उस मुक्तिमें विश्राम कर रहा है, उसे किस वस्तुकी इच्छा हो सकती है। तत्त्वज्ञानी विद्वान् केवल अपने यथार्थ स्वरूपमें ही स्थित रहता है। उसकी सारी इच्छाएँ और चेष्टाएँ शान्त हो जाती हैं तथा उसकी सब उत्कण्ठाएँ दूर हो जाती हैं। उसे अपने शरीरका भी भान नहीं होता।

श्रीराम ! मेरे इस उपदेशको सुनकर मङ्किने वहीं अपने महान् मोहको भी उसी तरह पूर्णरूपसे त्याग दिया, जैसे साँप अपनी केंचुलको छोड़ देता है। प्रारब्धवश प्राप्त हुए कार्यको वासनाशून्य होकर करते हुए मङ्किमुनि सौ वर्षोंके पश्चात् एक पर्वतपर समाधिमें स्थित हो गये। वे आजतक वहाँ प्रस्तरके समान निश्चल होकर बैठे हैं। उनकी नेत्र आदि समस्त इन्द्रियाँ शान्त हो गयी हैं। कभी-कभी दूसरोंद्वारा जगाये जानेपर ज्ञानयोगी मङ्कि समाधिसे जग भी जाते हैं।

(सर्ग २६)


आत्मा या ब्रह्मकी समता, सर्वरूपता तथा द्वैतशून्यताका प्रतिपादन; जीवात्माकी ब्रह्मभावनासे संसार-निवृत्तिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सर्वत्र व्यापक परमात्मा एक होता हुआ ही सभी रूपोंमें विराजमान

है। उसमें अज्ञानवश ही अनेकताकी कल्पना हुई है। ज्ञान हो जानेपर तो न वह एक है और न अनेक

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * परमार्थ-तत्त्वका उपदेश * ५३९

या सर्वरूप ही; फिर उसमें नानात्वकी कल्पना कैसे हो सकती है । आदि-अन्तसे रहित सारा आकाश चित्तत्त्व—सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मासे परिपूर्ण है । फिर शरीरकी उत्पत्ति और विनाश होनेपर भी उस चेतन तत्त्वका खण्डन कैसे हो सकता है । अमावास्याके बाद जब प्रतिपदाको चन्द्रमाकी एक कला उदित होती है, तब समुद्र आनन्दके मारे उछलने लगता है और जब प्रलयकालकी प्रचण्ड वायु चलती है, तब वह सूख जाता है । परंतु आत्मतत्त्व कभी किसी अवस्थामें न तो क्षुब्ध होता है और न क्षीण ही होता है । वह सदा समभावसे सौम्य बना रहता है । जैसे नावपर यात्रा करनेवाले पुरुषको स्थावर वृक्ष और पर्वत आदि चलते-से प्रतीत होते हैं तथा जैसे सीपीमें लोगोंको चाँदीका भ्रम होता है, उसी प्रकार चित्तको चिन्मय परमात्मामें देहादिरूप जगत्‌की प्रतीति होती है । यह शरीर आदि चित्तकी कल्पना है और शरीर आदिकी दृष्टिसे चित्तकी कल्पना हुई है । इसी प्रकार देह और चित्त दोनोंकी दृष्टिसे जीवभावकी कल्पना हुई है । वास्तवमें ये सब-के-सब परमपदस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें बिना हुए ही प्रतीत होते हैं अथवा ये सब-के-सब चिन्मय परम तत्त्वसे भिन्न नहीं हैं; ऐसी दशामें द्वैत कहाँ रहा ? परब्रह्म परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर यह सब कुछ एकमात्र शान्तस्वरूप ब्रह्म ही सिद्ध होता है । अतः ब्रह्मके सिवा जगत् आदि दूसरा कोई पदार्थ नहीं है और न दूसरी कोई भ्रान्ति ही है ।

रघुनन्दन ! वासनायुक्त जीवात्माकी भावनासे जगत्‌ सम्पत्तिका प्रादुर्भाव होता है और वासनाशून्य जीवात्माकी ब्रह्मभावनासे संसारकी निवृत्ति होती है । जीवात्माका जो वासनारहित विशुद्ध स्पन्दन (भावना) है, उसे स्पन्दन माना ही नहीं गया है, जैसे समुद्रमें भंवर आदिके द्वारा भीतर घूमती हुई तरङ्ग स्पन्दनशील होनेपर भी स्पन्दनशून्य ही मानी जाती है । किंतु जगत्‌की कारणभूता जो जीवात्माकी दृश्यभावना है, उसके भीतर जो वासनारस विद्यमान है, वही अङ्कुर प्रकट करता है; अतः उसीको असङ्गरूप अग्निसे जलाकर भस्म कर देना चाहिये । मनुष्य कर्म करता हो या न करता हो; परंतु शुभाशुभ कार्योंमें वह जो मनसे डूब नहीं जाता, उसकी इस अनासक्तिको ही विद्वान् पुरुष असङ्ग मानते हैं अथवा वासनाको उखाड़ फेंकना ही असङ्ग कहा गया है । अहम्भावका त्याग करना ही संसार-सागरसे पार होना है और उसीका नाम वासनाक्षय है । इसके लिये अपने पुरुषार्थके सिवा दूसरी कोई गति नहीं है । श्रीराम ! तुम तो आत्माराम और पूर्णकाम हो ही । सारी इच्छाओंसे रहित निश्शङ्क हो समस्त कार्य करते हुए भी केवल अपने चिन्मय स्वरूपमें ही स्थित रहो । भय तुमसे सदा दूर ही रहता है । अतः अपनी सहज शान्तिके द्वारा सबके मनोऽभिराम बने रहो ।

(सर्ग २७-२८)


परमार्थ-तत्त्वका उपदेश और स्वरूपभूत परमात्मपदमें प्रतिष्ठित रहते हुए व्यवहार करते रहनेका आदेश देते हुए वसिष्ठजीका श्रीरामके प्रश्नोंका उत्तर देना तथा संसारी मनुष्योंको आत्मज्ञान एवं मोक्षके लिये प्रेरित करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--श्रीराम ! तुम आकाशके समान विशद और तत्त्वके ज्ञाता हो । एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मपदमें तुम्हारी स्थिति है । तुम सर्वत्र सम सौम्य और सम्पूर्णानन्दमय हो, तुम्हारा अन्तःकरण ब्रह्मस्वरूप एवं विशाल है । निष्पाप रघुनन्दन ! जो पुरुष अपनी इन्द्रियोंको अन्तर्मुख करके सदा ब्रह्मानन्दमें निमग्न हो आत्माराम, शान्त एवं उदार-भावसे कार्य करता है, वह जन्मजनने दोषसे रहित

५४० * अविच्छिन्नञ्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

होता है। जो समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित अपनी बुद्धिगुहा—हृदयाकाशमें विराजमान परमात्मपदमें स्वेच्छानुसार स्थित रहता है, वह अपने आत्मामें ही रमण करनेवाला परमेश्वररूप ही है। जो लोग सदा अन्तर्मुख रहकर बाहरके कार्योंका सम्पादन करते रहते हैं, उनके जीवित रहते हुए भी उनके मनमें उसी तरह वासना नहीं उत्पन्न होती, जैसे जड पत्थरोंमें वह नहीं उत्पन्न होती। जगत् न तो द्वैतरूपमें है और न अद्वैतरूपमें ही।

श्रीरामजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! यदि ऐसी बात है तो अहम्भावकी प्रतीतिरूप वसिष्ठ-नामक आप यहाँ कैसे स्थित हैं? यह बताइये।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजी आधे मुहूर्ततक चुपचाप ही बैठे रह गये। उनकी यह चेष्टा सुस्पष्ट ज्ञात हो रही थी। उनके चुप हो जाने-पर सभामें जो बड़े-बड़े लोग बैठे हुए थे, वे संशयके समुद्रमें गोते लगाने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजीने फिर पूछा—'भगवन् ! आप मेरी ही तरह चुपचाप क्यों बैठे हैं? संसारमें कोई ऐसा प्रश्न नहीं है, जिसका उत्तर आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुष न दे सकें।'

श्रीवसिष्ठजीने कहा—निष्पाप रघुनन्दन ! मुझमें कुछ कहनेकी शक्ति न होनेके कारण मेरे पास युक्तियोंका अभाव हो गया हो ऐसी बात नहीं है। परंतु यह प्रश्न जिस कोटिका है, उसमें चुप हो जाना ही इसका उत्तर है। प्रश्नकर्ता दो प्रकारके होते हैं—एक तत्त्वज्ञ और दूसरे अज्ञानी। अज्ञानी प्रश्नकर्ताको अज्ञानी बनकर ही उत्तर देना चाहिये और ज्ञानीको ज्ञानी बनकर। परम सुन्दर श्रीराम ! तत्त्वज्ञ पुरुषको उसके प्रश्नका कलङ्कयुक्त उत्तर नहीं देना चाहिये। परंतु कोई भी ऐसी वाणी नहीं है, जो निष्कलङ्क हो और तुम केवल ज्ञानी ही नहीं, परम ज्ञानी हो। अतः तुम्हारे प्रश्नका मौन ही उत्तर है। जो परमपद है, वह तत्त्वज्ञानके पूर्व इस रूपमें उपस्थित किया जाता है जिससे उसके विषयमें उपदेश वाणीकी प्रवृत्ति हो सके। अतः अज्ञानसे, ही उसको ससंकल्प वाणीका विषय बताया गया है एवं उसका कल्पित स्वरूप ही उपदेशका विषय होता है। किंतु तत्त्वज्ञानके पश्चात् जो उसका यथार्थ स्वरूप प्रकट होता है, उसे मौन अर्थात् वाणीका अविषय ही कहा गया है। इसीलिये तुम-जैसे तत्त्वज्ञशिरोमणिको मौनके रूपमें ही सुन्दर उत्तर दिया गया है। प्रिय रघुनन्दन ! वक्ता पुरुष स्वयं जैसा होता है, उसके अनुरूप ही वह उपदेश करता है। मैं ज्ञेय ब्रह्मरूप ही हूँ। अतः उस परमपदमें प्रतिष्ठित हूँ, जहाँ वाणीकी पहुँच नहीं है। जो वाणीसे अतीत पदमें प्रतिष्ठित है, वह वाणीरूप मलको कैसे ग्रहण कर सकता है। मैं मौन रहकर उस तत्त्वका प्रतिपादन कर रहा हूँ, जो अनिर्वचनीय है—जिसका वाणीद्वारा ठीक-ठीक वर्णन हो नहीं सकता, क्योंकि वाणी संकल्परूप कलङ्कसे युक्त होती है।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! वाणीमें जो-जो दोष आते हैं, उनका आदर न करके विधिरूपसे और निषेधरूपसे यह बताइये कि वास्तवमें आप कौन हैं?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! यदि तुम मुझसे मेरे स्वरूपका परिचय सुनना चाहते हो तो इस विषयको यथावत् सुनो। 'तुम कौन हो,' 'मैं कौन हूँ' और 'यह जगत् क्या है' इसका विवेचन किया जा रहा है। तात ! यह जो निर्विकार अनन्त चिन्मय परमात्मा है, वही मैं हूँ। इसमे बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंका सर्वथा अभाव है तथा यह समस्त कल्पनाओंसे परे है। मैं निर्मल अनन्त चेतन हूँ, तुम अनन्त चेतन हो, सारा जगत् अनन्त चेतन है और सब कुछ अनन्त चेतनमात्र ही है। विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्मामें मैं विशुद्ध