भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५३० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

एवं संवर्धन करनेसे आनन्दका कारण है। इस प्रकार भाँति-भाँतिके आचारोंसे युक्त विराट् पुरुष सहस्रों बार प्रकट हो चुके हैं तथा सैकड़ों महाकल्प बीत चुके हैं, भविष्यमें होनेवाले हैं और इस समय भी विद्यमान हैं।

रघुनन्दन ! जो ब्रह्मसे अभिन्न है; अतएव जिसका महान् सम्बन्ध अनन्त कालतक बना रहता है, उस अनुभवस्वरूप अधिष्ठान-सत्ताके द्वारा परम विराट् पुरुष सब देश-कालमें स्थित रहता है। (सर्ग १९)


जगत्की संकल्परूपता, अन्यथादर्शनरूप जीवभाव तथा अहंभावनारूप महाग्रन्थिके भेदनसे ही मोक्षकी प्राप्तिका कथन और ज्ञानबन्धुके लक्षणोंका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह पञ्चभूतात्मा संकल्पपुरुष (विराट्) स्वयं जैसा-जैसा संकल्प करता है, वह ब्रह्मरूप आकाश भी वैसा ही प्रतीत होने लगता है। अतः विद्वान् पुरुष समस्त जगत्को विराट् पुरुषका एक संकल्प ही मानते हैं। वास्तवमें कहीं कोई वस्तु न तो स्थूल है और न सूक्ष्म ही है। भ्रमसे जहाँ जिस प्रकारकी कल्पनाका विस्तार होता है, वहाँ तत्काल वैसा ही अनुभव होने लगता है। मन चन्द्रमासे उत्पन्न हुआ है और चन्द्रमा मनसे। जैसे कुहरेसे आच्छादित हुई वस्तुका यथार्थ ज्ञान न होकर विपरीत ज्ञान होता है, उसी तरह अज्ञानसे आवृत्त आत्माका भी यथार्थ ज्ञान न होकर, जो अन्य प्रकारसे देखना या समझना है, वही जीवका स्वरूप है। इसीलिये विषयात्मक वस्तुओंमें उसकी प्रवृत्ति होती है। वह प्राण और इन्द्रिय आदि जड वस्तुओंसे तादात्म्यभावको प्राप्त होकर अपने यथार्थ-स्वरूपको उसी प्रकार नहीं देख पाता, जैसे जन्मान्ध मनुष्य मार्ग नहीं देख सकता। जगत्के रूपमें बढ़ी हुई अविद्या-शक्तिसे आवृत्त होकर जीव अपने अद्वैत स्वरूपमें ही द्रष्टा-दृश्य आदि द्वैतकी कल्पना करके उसमें अभिनिवेश (सुदृढ आग्रह) कर बैठता है। जैसे वायु स्पन्द-शक्तिसे आवृत्त होती है, उसी तरह उस अविद्या-शक्तिसे आच्छादित हुआ जीव अपने यथार्थ स्वरूपको नहीं देख पाता। अज्ञानकी सबसे बड़ी गाँठ है अहंभावना। वह मिथ्या विषयभूत और असत् है। उसका जो भेदन है, उसीको तत्त्वज्ञ पुरुषोंने मोक्ष कहा है।

श्रीराम ! मनुष्यको सदा ज्ञानी ही होना चाहिये, ज्ञानबन्धु नहीं। मैं अज्ञानीको अच्छा समझता हूँ, परंतु ज्ञानबन्धुको नहीं।

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! ज्ञानबन्धु किसे कहते हैं और ज्ञानी कौन बताया जाता है ? ज्ञानबन्धु होनेका क्या फल है और ज्ञानी होनेपर कौन-सा फल प्राप्त होता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे शिल्पी जीविकाके लिये ही शिल्पकलाको सीखता है, उसी प्रकार जो मनुष्य केवल भोगोपार्जनके लिये शास्त्रको पढ़ता और उसकी व्याख्या करता है किंतु स्वयं शास्त्रके कथनानुसार अनुष्ठानमें लगनेका प्रयत्न नहीं करता, वह ज्ञानबन्धु कहलाता है। शास्त्रोंके अभ्याससे जिसे शाब्दिक बोध तो प्राप्त हो गया है, परंतु विनाशशील भोग-व्यवहारोंमें उनसे वैराग्य आदिके रूपमें उस बोधका कोई फल नहीं दिखायी देता, उसका वह बोध केवल शिल्प है—तत्त्व-ज्ञानकी कथा कहकर दूसरोंको ठगनेके लिये चातुर्यपूर्ण कलामात्र है; उस कलासे केवल जीवननिर्वाह मात्र करने-वाला होनेके कारण वह पुरुष ज्ञानबन्धु कहलाता है। जो केवल भोजन और वस्त्रमात्रसे संतुष्ट हो भोजन आदिकी प्राप्तिको ही शास्त्राध्ययनका फल समझते हैं, वे शास्त्रोंके अर्थको शिल्पकलाके रूपमें धारण करनेवाले हैं। ऐसे पुरुषोंको ज्ञानबन्धु जानना चाहिये। तत्त्वज्ञ पुरुष परमात्म-ज्ञानको ही ज्ञान मानते हैं। उससे भिन्न जो दूसरे-दूसरे ज्ञान हैं, वे ज्ञानाभासमात्र हैं; क्योंकि उनके द्वारा सार-