संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ०] * जीवके स्वरूप, स्वभाव तथा विराट् पुरुषका वर्णन * ५८९
परम चेतन—परब्रह्म परमात्मा सर्वस्वरूप सर्वशक्तिमान् है इसलिये उसमें गुण, वस्तु, क्रिया और जाति आदिसे अनन्तरूपताको प्राप्त तथा नाना प्रकारके कार्यों- का आरम्भ करनेवाले दिगन्तवर्ती जनसमुदायसे परिपूर्ण ये सब संसार चञ्चल जलाशयके भीतर प्रतिबिम्बित क्षणभङ्गुर नगरों एवं अपने अन्त:करणमें स्थित समस्त उपकरणोंसे भरे महानगरोंके समान असद्रूपसे ही स्थित हैं। (सर्ग १८)
जीवके स्वरूप, स्वभाव तथा विराट् पुरुषका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो वास्तवमें न परम अणुरूप कहा जा सकता है और न स्थूल, शून्य या अन्य कुछ ही, वरं जो चिन्मय, ज्ञानमात्ररूप और सर्वव्यापक है, वही जीव कहा जाता है। जिस- जिस पदार्थका जो भाव—असाधारण स्वरूप है, उसके रूपमें उन-उन पदार्थमें स्थित होकर जो तदाकार भासित होता है, उसे तुम जीव ही समझो; क्योंकि बारंबार देखनेपर उन-उन पदार्थोंके आकारमें उसीका अनुभव होता है। श्रीराम ! जीव जहाँ जिस प्रकार जो-जो संकल्प करता है, वहाँ वह तत्काल वैसा ही आकार धारण कर लेता है। जैसे चलना या हिलना-डुलना आदि चेष्टा वायुका स्वभाव है, उसी प्रकार विचित्र वस्तुओंका अनुभवरूप संसार जीवका स्वभाव ही है। इस बातका अपने अनुभवसे ही निर्णय कर लेना चाहिये। बालकको होनेवाले यक्षभ्रमके समान इसका हम उपदेशके द्वारा साधन नहीं करना चाहते। जीव चैतन्यघनलक्षण होनेके कारण ही अहम्भावनासे ही देश, काल, क्रिया और द्रव्यकी शक्तियोंका निर्माण करके स्थित होता है।
सर्वप्रथम परब्रह्म परमात्मासे मनोमयरूपसे उदित विराट् पुरुष (हिरण्यगर्भ) प्रकट हुआ। अतः वह आकाशके समान विशद, शान्त, नित्य, अनन्तरूप और प्रकाशमय है। वह अद्वितीय विराट् पुरुष सबसे उत्कृष्ट परमेश्वररूप है। वह पञ्चभूतात्मक न होनेपर भी पञ्चभूतात्मक-सा भासित होता है। वह अपने ही संकल्पसे कल्पित अनेक कल्पोंमें तथा क्षणभरमें स्वेच्छा- नुसार स्वयं प्रकट होता है और बारंबार प्रकट होकर फिर स्वयं ही अदृश्य हो जाता है। वह आकाशस्वरूप, सर्वव्यापी, अनन्त परमेश्वर स्थूल, सूक्ष्म, व्यक्त एवं अव्यक्तरूप हो सबके बाहर-भीतर स्थित है। यह वास्तवमें किंचिद्रूप न होनेपर भी व्यवहारकालमें किंचिद्रूप अवश्य है।
श्रीराम ! उस विराट् पुरुषके मूर्तामूर्त-स्वरूप आठ अङ्ग हैं—पाँच ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियसहित प्राण, छठी इन्द्रिय मन और अहंकार। उसी पुरुषने चार मुखोंसे युक्त होकर शब्द और अर्थकी कल्पनासे युक्त इस ऋक् आदि चारों वेदोंका गान किया है। उसीने शास्त्रीय सदाचारकी मर्यादा स्थापित की है, जो आज भी यथावत्रूपसे चली आ रही है। ऊपर अनन्त आकाश उस पुरुषका मस्तक है। नीचेका भूतल आदि उसके पैरोंका तलवा है। मध्यवर्ती आकाश उसका उदर है तथा यह ब्रह्माण्डमण्डप उसका शरीर है। अनन्त लोक-लोकान्तर उस पुरुषके पार्श्वभाग हैं। जल रक्त है। पर्वत मांसपेशियाँ हैं और सदा अविच्छिन्नभावसे बहनेवाले नदियाँ उसकी नाड़ियाँ हैं। समुद्र रक्तके आधार (रक्त- संचयकी पेशियों) हैं। द्वीप ही कोशोंको आवेष्टिन करने- वाली आँतें हैं। दिशाएँ फैली हुई भुजाएँ हैं। तारिकाएँ रोमावली हैं। उन्चास वातस्कन्ध प्राणवायु हैं। सूर्य- मण्डल प्रचण्ड नेत्र है और बड़वानल उसका पित्त है। चन्द्रमण्डल संकल्पात्मक मन है तथा पवन ही सारभूत आत्मा है। चन्द्रमारूपी मन ही शरीररूपी वृक्षका मूल कर्मरूपी विटपका बीज तथा सम्पूर्ण भावपदार्थोंका उत्पादन