संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
रघुनन्दन ! मेरु पर्वतके शिखरपर पक्षिराज मुक्तात्मा मुनि काकभुशुण्डजी मुझसे पूर्वोक्त विद्याधरकी कथा सुनाकर चुप हो गये। श्रीराम ! तत्पश्चात् मै उन मुनिसे और उस सिद्ध विद्याधरसे भी विदा लेकर मुनिमण्डलीसे मण्डित अपने आश्रमपर आ गया। इस प्रकार आज मैने तुमसे काकभुशुण्डजीद्वारा कही गयी कथासे प्रतिपादित विषयका वर्णन किया है, जिसके अनुसार यह ज्ञात हुआ कि भुशुण्डजीके थोड़े से उपदेशसे ही विद्याधरको तत्त्वज्ञान प्राप्त होकर परम शान्ति मिल गयी। रघुनन्दन ! पक्षिराज भुशुण्डके साथ जब मेरा समागम हुआ था, तबसे आजतक ग्यारह महायुग व्यतीत हो चुके हैं।
श्रीराम ! यह सबको ज्ञात है कि बीजके भीतर सैकड़ों शाखाओंसे युक्त तथा पत्र, पुष्प और फलसे सम्पन्न वृक्ष विद्यमान है; क्योंकि बीजारोपणके पश्चात् प्रकट हुए उस वृक्षको सब लोग अपनी आँखोंसे देखते हैं, इसी तरह अहंकाररूपी सूक्ष्म बीजके भीतर समस्त दृश्यज्ञानसे युक्त यह शरीर वर्तमान है, यह विवेकी पुरुषोंने विचार-दृष्टिसे देखा है। परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप हुए जीवन्मुक्त पुरुषका शरीर लोकदृष्टिसे विद्यमान होनेपर भी वह अहंतामूलक अभिमानको नहीं प्राप्त होता। अतएव उससे संसाररूपी वृक्षका प्राकट्य नहीं होता अथवा जो विदेहमुक्त होकर निरतिशय आनन्दस्वरूप परमात्मामें प्रतिष्ठित हो चुका है, उस पुरुषके बोधरूपी महाग्निसे दग्ध हुए असत्स्वरूप अहंतारूपी बीजके भीतरसे फिर इस संसाररूपी वृक्षका प्रादुर्भाव नहीं होता।
(सर्ग १६-१७)
मृत पुरुषके प्राणोंमें स्थित जगत्के आकाशमें भ्रमणका वर्णन तथा परब्रह्ममें जगत्की असत्ताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सम्पूर्णतः नाशरूप मृत्यु कभी नहीं होती है। अपने दूसरे संकल्पोंका कुछ कालतक स्थिर रहना ही मरण कहलाता है। प्राणके भीतर चित्त है और चित्तके भीतर विविध आकार-प्रकारसे युक्त जगत् वैसे ही विद्यमान है, जैसे बीजके भीतर वृक्ष। पुरुषकी मृत्यु हो जानेपर उसके शरीरसे निकले हुए प्राण बाह्याकाशमें भरे हुए वायुसमूहके साथ ऐसे मिल जाते हैं, जैसे समुद्रके जल नदियोंके जलके साथ मिलकर एक हो जाते हैं। आकाशमें विद्यमान वायुके भीतर मृत प्राणियोंके प्राण हैं। उन प्राणोंके भीतर उनका मन है और उस मनके भीतर जगत्को उसी प्रकार स्थित समझो, जैसे तिलमें तेल रहता है। रघुनन्दन ! जैसे वायुमें स्थित सुगन्ध इधर-उधर ले जायी जाती है, उसी तरह प्राण-वायुमें स्थित आकाशात्मक जगत् इधर-उधर यत्र-तत्र ले जाये जाते हैं। जैसे घड़ेको एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँचा देनेपर उसके भीतरके आकाशमें कोई भेद नहीं होता, उसी प्रकार स्पन्दन आदिसे युक्त चित्तमें तीनों जगत्का भ्रम रहनेपर भी चेतन आत्मामें वस्तुतः वह स्पन्दन और भ्रम नहीं होता है। जगत् और इसका भ्रम दोनों उदित नहीं हैं। यदि उदित हों तो भी वायुद्वारा किये गये इस पृथ्वीके परिक्रमण आदिको इसके ऊपर स्थित हुए प्राणी उसी तरह नहीं देख पाते हैं, जैसे नौकाके भीतर बैठे हुए मनुष्य उसकी गतिको नहीं देखते हैं। वे तीनों लोक देश, काल, क्रिया तथा द्रव्यरूप ही हैं और अहंकार भी इन देश, काल आदिके साथ सम्बन्ध रखनेके कारण देश-कालादि रूप ही है। अतः देश-कालादिरूप जगत् और अहंकारमें भेद नहीं है। अज्ञानीमें जिस प्रकार विकल्प-सम्पत्तिका उदय होता है, उस प्रकार ज्ञानीमें निश्चय ही उसका उदय नहीं होता है। चेतन आकाशरूप परमात्मा सर्वव्यापी और अनन्त हैं। इसलिये वह विकल्प-सम्पत्ति इसका स्वरूप न होनेके कारण सत्स्वरूपा नहीं है।