संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * शुद्ध चित्तमें थोड़े-से ही उपदेशसे महान् प्रभाव पड़ता है * ७८५
विद्यमान है। सभी जगह वह चिन्मय तत्त्वरूपसे स्थित है। वह सर्वत्र सभी पदार्थोंके रूपमें है और वास्तवमें सब ओरसे सबसे रहित है। इस प्रकार परम बुद्धिमान् और उदारचित्त उस इन्द्रने देरतक ध्यान लगाकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको एकमात्र परमात्मामें स्थित देखते हुए हमलोगोंके द्वारा अनुभवमें लाये जानेवाले इस जगत्का भी अवलोकन किया। तदनन्तर इस सृष्टिके ब्रह्माण्डमें विचरता हुआ वह इन्द्र वहाँके इन्द्रलोकमें पहुँचकर जब इन्द्रके समीप गया, तब उसका 'मैं इन्द्र हूँ', यह संस्कार जाग उठा और वह प्रारब्धवश वहाँका इन्द्र हो गया। तत्पश्चात् वह सैकड़ों वृत्तान्तोंसे सुशोभित इस त्रिभुवनके राज्यका शासन करने लगा। त्रसरेणुके उदरमें निवास करनेवाला जैसे यह परम कान्तिमान् तथा इन्द्रकुलमें उत्पन्न इन्द्र बनाया गया है, वैसे ही इधर-उधर ऐसे व्यवहारवाले लाखों इन्द्र इस चेतन आकाशमें हो चुके हैं और मौजूद हैं।
विद्याधर ! तुम यह अच्छी तरह समझ लो कि जगत् अहंकारका कार्य है। अहंकारके भीतर जगत् कल्पित है और जगत्के अंदर अहंकार व्याप्त है। जो पुरुष संकल्प-शून्यतारूप ज्ञानसे जगत्के बीजभूत अहंभावका मार्जन कर देता है, उसने मानो जगत्-रूपी मलको जलके द्वारा ही पूर्णरूपसे धो डाला है। अतः विद्याधर ! अहंता नामकी भी कोई वस्तु नहीं है। वह अवास्तविक होनेके कारण खरगोशके सींगकी भाँति असत् एवं बिना कारणके ही प्रकट हुई है। ( सर्ग १४-१५ )
शुद्ध चित्तमें थोड़े-से ही उपदेशसे महान् प्रभाव पड़ता है, यह बतानेके लिये कहे गये भुशुण्डवर्णित विद्याधरके प्रसंगका उपसंहार, जीवन्मुक्त या विदेहमुक्तके अहंकारका नाश हो जानेसे उसे संसारकी प्राप्ति न होनेका कथन
भुशुण्डजी कहते हैं—मुने ! मैं इस प्रकार उपदेश दे ही रहा था कि उस विद्याधर-राजका सारा दृश्य-विषयक संकल्प शान्त हो गया। उसकी समाधि लग गयी। मैंने बारम्बार उसे इधर-उधरसे हिला-डुलाकर जगाया; परंतु परम निर्वाण पदको प्राप्त वह विद्याधर फिर सामनेके दृश्य विषयोंकी ओर उन्मुख नहीं हुआ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! भुशुण्डजीका बताया हुआ विद्याधरका इतिहास मुझे स्मरण हो आया; इसीलिये मैंने तुमसे कहा था कि शुद्ध चित्तमें उपदेश उसी तरह प्रभाव डालता है, जैसे पानीमें तेलकी बूँद। अहम्भावना ही दुःखनामक सेमरके वृक्षका मुख्य बीज है। उस अहम्भावनाके समान ही 'यह मेरा है' ऐसी बुद्धि भी उस वृक्षका आदिकारण है; क्योंकि यही रागादिरूपिणी शाखाओंके विस्तारका कारण है। पहले बीजरूपिणी अहंभावना होती है। फिर वृक्षरूपिणी ममभावना होती है। तत्पश्चात् शाखारूपिणी इच्छा (राग) की प्रवृत्ति होती है। यह इच्छा ही इष्टपदार्थके रूपमें सैकड़ों अनर्थोंको उत्पन्न करनेवाली तथा संसार-भ्रमका धारण-पोषण करनेवाली है।