संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * ज्ञानीके लक्षण, जीवके बन्धन और मोक्षका स्वरूप * ५३१
तत्त्व परब्रह्म परमात्माका बोध नहीं होता । जो परमात्म-ज्ञानको न पाकर अन्य प्रकारके ज्ञानलेशकी प्राप्तिसे ही संतुष्ट हो लौकिक सुखके लिये कष्ट-साध्य चेष्टाएँ किया करते हैं, वे ज्ञानबन्धु माने गये हैं । मनुष्यको चाहिये कि इस संसारमें आहारकी प्राप्तिके लिये शास्त्रानुकूल अनिन्द्य कर्म करे । आहार भी उतना ही करे, जितनेसे प्राणोंकी रक्षा हो सके । प्राणरक्षा भी तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये ही करे । तत्त्वज्ञानकी इच्छा सबके लिये अत्यन्त आवश्यक है, जिससे फिर कभी जन्म-मरण आदि दुःखोंकी प्राप्ति न हो ।* ( सर्ग २०-२१ )
ज्ञानीके लक्षण, जीवके बन्धन और मोक्षका स्वरूप, ज्ञानी और अज्ञानीकी स्थितिमें अन्तर, दृश्यकी असत्ता तथा परब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो तत्त्वज्ञानके द्वारा ज्ञातव्य परब्रह्म परमात्मामें दृढ़ निष्ठा हो जानेके कारण पूर्वकृत कर्मोंके फलस्वरूप सुख-दुःखादि प्रारब्धका, शब्द आदि जड विषयोंका तथा चित्तका भी सद्रूपसे अनुभव नहीं करता है, वह ज्ञानी कहलाता है । परमात्माके स्वरूपको यथार्थ रूपसे जान लेनेपर जिस तत्त्वज्ञके समस्त व्यवहार उस तत्त्वज्ञानके अनुरूप ही होते हैं एवं जिसके चित्तकी सम्पूर्ण वासनाओंका अभाव हो चुका है, वह ज्ञानी कहलाता है । जो परमात्म-लाभसे संतुष्ट हो स्वाभाविक-रूपसे परम शान्त है तथा जिसकी सभी चेष्टाओंमें बुद्धिमान् पुरुषोंको आन्तरिक शान्तिका अनुभव होता है, वह ज्ञानी कहलाता है । जो बोध मोक्षका कारण है, पुनर्जन्मका कभी नहीं, उसीका नाम ज्ञान है । उसके सिवा दूसरा जो शब्दज्ञानका चातुर्य है, वह शिल्प-जीविका—जीवननिर्वाहकी कलामात्र है । उसे भोजन, वस्त्रको जुटानेवाली व्यवस्था समझना चाहिये । प्रारब्धके अनुसार जो भी कार्य प्राप्त हो जाय, उसमें जो पुरुष कामना और संकल्पसे रहित होकर प्रवृत्त होता है तथा जिसका हृदय शरत्कालके आकाशकी भाँति आवरण-शून्य ज्ञानके आलोकसे प्रकाशित है, वह पण्डित (ज्ञानी) कहलाता है ।
ये जो जगत्के विविध पदार्थ हैं, वे किसी कारणके बिना ही उत्पन्न-से होते हैं । इसलिये ये वास्तवमें हैं ही नहीं, तो भी विद्यमानकी भाँति प्रतीत होते हैं । जो असत्य होते हुए भी भासित हो रहे हैं, उन पदार्थोंकी प्रतीतिमें एकमात्र यह अज्ञान ही कारण है । इस अज्ञानका ज्ञानकालमें तत्काल नाश हो जाता है । यह जीव अपनेसे भिन्न जड अहंकार और शरीर आदिका जब अनुभव करता है, तब तत्काल ही उनके साथ अपना तादात्म्य मानकर उनको अपना स्वरूप समझ बैठता है । यही इसका संसार-बन्धन है और जब यह अपनेको चिन्मय समझता है, तब सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप ही हो जाता है । यही इसका मोक्ष है । यह जीव जो अज्ञान-निद्रामें पड़कर अचेत हो रहा है, जब जाग उठता है, तब परमात्मरसके आवेशसे परमात्मरूपताको ही प्राप्त हो जाता है—ठीक उसी प्रकार जैसे हेमन्त ऋतुमें सोया हुआ-सा आम्रका वृक्ष वसन्त ऋतुमें रसावेशके कारण प्रबुद्ध-सा होकर जब पल्लवित एवं पुष्पित हो जाता है, तब 'सहकार' नाम धारण करता है । जो दृश्य शोभाके पारदर्शी ज्ञानी पुरुष परदृष्टि (तत्त्वज्ञान) को प्राप्त कर चुके हैं, उन्हें इस विस्तृत दृश्यप्रपञ्चके विद्यमान होनेपर भी इसका भान नहीं होता (वे सबको परब्रह्म ही समझते हैं) । जो परदृष्टिको प्राप्त हो चुके
* अन्नाहारार्थं कर्म कुर्यादनिन्द्यं कुर्यादाहारं प्राणसंधारणार्थम् ।
प्राणा संधार्यास्तत्त्वजिज्ञासनार्थे तत्त्वं जिज्ञास्यं येन भूयो न दुःखम् ॥
(नि० उ० २१ । १८)