भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५३२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठं

हैं, उन्हें दृश्य-प्रपञ्चका भान न होनेके कारण उनकी चेष्टा भी वास्तवमें चेष्टा नहीं होती। ज्ञानी पुरुष दृश्य-दर्शनके अभिमानसे बँधते नहीं, इसलिये बन्धनमुक्त साँड़की भाँति सांसारिक कर्मबन्धनके सम्बन्धसे रहित रहते हैं। वे प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए कर्मोंके लिये उसी तरह काम और संकल्पसे रहित होकर चेष्टाएँ करते हैं, जैसे वृक्षके पत्तोंको कम्पित करनेमें वायु। जो संसारके पारदर्शी पुरुष सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मदृष्टिको प्राप्त कर चुके हैं, वे कर्मकी प्रशंसा नहीं करते हैं—ठीक उसी तरह, जैसे नदीके तटपर निवास करनेवाले पुरुष कूपकी प्रशंसा नहीं करते। किंतु अज्ञानी पुरुषोंकी इन्द्रियाँ अधःपतनके हेतुभूत विषयोंपर इस प्रकार गिरती हैं, जैसे गीध मांसके ऊपर टूट पड़ता है। इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मनके द्वारा वशमें करके समाहित-चित्त हो उस परब्रह्म परमात्माके चिन्तनमें लग जाय।

जैसे सुवर्ण कटक, कुण्डल आदि आभूषणोंसे भिन्न नहीं है, उसी तरह ब्रह्म भी सृष्टिसे भिन्न नहीं है; इसीसे 'सृष्टि' आदि शब्दोंका अर्थ तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें कल्याणमय ब्रह्म ही कहा गया है। जैसे कल्पके अन्तमें जब एकमात्र अन्धकार ही छा जाता है, तब यह सारा व्यवहार निर्विभाग और निराभास ही रहता है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें यह जगत् विभाग और आभाससे रहित ही रहता है। जैसे अवयवरहित आकाशमें दिशाओंके विभागरूप आकाशके अवयवोंकी अभिन्न सृष्टि भासित होती है, उसी प्रकार अवयवरहित शिवस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें यह द्वैताद्वैत सृष्टि भी अभिन्नरूपसे विद्यमान है। इस प्रकार जगत्‌के भीतर अहंकार और अहंकारके भीतर जगत् है। ये दोनों एक दूसरेमें उसी प्रकार स्थित हैं, जैसे केलेके तनेकी छालमें तना और तनेमें उसकी छाल होती है।

जिस ग्वालेका मन गोशालाके बर्तनों (दूध दुहनेके पात्रों) में लगा हुआ है, वह घरमें रहकर घरके काम करता हुआ भी उन्हें नहीं देख पाता, उसी प्रकार तत्त्वज्ञानी पुरुष जीवन-निर्वाहके लिये सब कार्य करता हुआ भी ब्रह्मचिन्तनमें रत होनेके कारण उन्हें नहीं देखता है। जिसके भीतर तुच्छ दृश्य-प्रपञ्चकी भावना नहीं है, वह जीते-जी आकाशके समान निर्मल और बन्धनसे छूटे हुएकी भाँति मुक्त है। जो पुरुष सांसारिक पदार्थोंमें अभावरूपताकी भावना नहीं करता, मोक्षके लिये यत्न न करनेवाले उस पुरुषका जन्म-मरणरूपी अनन्त दुःख कभी शान्त नहीं होता। तत्त्वज्ञानी पुरुष यहाँ सम्राट्‌के समान शोभा पाता है। उसे प्रारब्ध-वश जो कोई भी वस्त्र देकर उसके शरीरको ढक देता है, जो कोई भी भोजन करा देता है तथा वह जहाँ-कहीं भी सो जाता है। वह समग्र विशुद्ध वासनाओंसे युक्त होकर भी वासनारहित ही रहता है। भीतरसे शून्य होता हुआ भी परिपूर्णात्मा होता है अर्थात् उसका अन्तःकरण पूर्ण परब्रह्मकी भावनासे भरा होता है और जैसे आकाशमें वायु चलती है, उसी तरह उसकी भी साँस चलती रहती है (परंतु वह देह और उसकी वासनाओंसे रहित हुआ परब्रह्मरूपसे ही स्थित रहता है)। तत्त्वज्ञानी पुरुष निर्वाण-दशाको प्राप्त हो मनके द्वारा ब्रह्मभावका मनन करनेसे जब परमानन्दमें निमग्न हो जाता है, तब नींदमें पड़े हुए मनुष्यकी भाँति आसन, शय्या अथवा सवारीमें स्थित वह यत्नपूर्वक जगानेसे भी नहीं जागता। रघुनन्दन ! तत्त्वज्ञानी और अज्ञानी—दोनोंके सम्पूर्ण उत्पत्ति-विनाशशील कर्मोंमें वासना-शून्यताके सिवा दूसरा कोई अन्तर नहीं होता (अर्थात् ज्ञानी वासनारहित होकर कर्म करता है और अज्ञानी वासनायुक्त होकर)।

यह सारा दृश्य-प्रपञ्च नष्ट होता है और नष्ट होकर फिर उत्पन्न होता है, इसलिये असत् है। परंतु जो न तो कभी नष्ट हुआ और न उत्पन्न ही हुआ, वही सत्स्वरूप परमात्मा है और वह परमात्मा ही तुम हो। ज्ञानसे जगत्-रूपी भ्रमका मूल (अज्ञान) नष्ट हो जाता है। फिर