भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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निर्वाण-प्रकरण उ०] * मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महान् वनमें महर्षि वसिष्ठ और मङ्किका समागम * ५३३

तो ढूँढ़नेपर भी इस भ्रमका पता नहीं चलता। जैसे मृगतृष्णा जल नहीं दे सकती, उसी तरह निर्मूल हुआ भ्रम संसाररूपी अङ्कुर नहीं उत्पन्न कर सकता। जैसे जला हुआ बीज अङ्कुरित नहीं हो सकता, उसी प्रकार परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे छिन्न हुई अहम्भावना दिखायी देनेपर भी मनोभूमिमें संसाररूपी वृक्षका अंकुर नहीं उत्पन्न कर सकती। मानसिक विकारोंसे रहित वीतराग तत्त्वज्ञानी पुरुष कर्म करे या न करे, उसकी स्थितिमें कोई अन्तर नहीं आता। वह तो मनके संकल्पसे रहित एवं नित्य शान्त हुआ परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता है। जो लोग योगका आश्रय लेकर शान्त बने हुए हैं, वे योगी भी चित्तका उपशमन होनेपर ही भलीभाँति शान्त हो पाते हैं, अन्यथा नहीं; क्योंकि उनकी भोग-वासनाएँ मूलतः क्षीण नहीं होतीं। (कारण यह है कि इन वासनाओंकी खानरूप जो चित्त है, वह तो उनका बना ही रहता है।) अनन्त, अव्यक्त एवं सुन्दर चिदाकाशरूप कर्पूर अपने भीतर स्वयं जो चमत्कार प्रकट करता है, उसीको वह जगद्रूपसे जानता है। रघुनन्दन ! इस तरह यह जगत् तत्त्वज्ञानी पुरुषको उसका सांसारिक भ्रम दूर हो जानेके कारण प्रकाशमय तथा शान्त अक्षय ब्रह्मरूप ही भासित होता है, जब कि अज्ञानीको यह परमार्थतः परब्रह्म परमात्मामें स्थित होकर भी भोगजनित आनन्दके अनुगत ही प्रतीत होता है। (इस प्रकार दोनोंकी दृष्टियोंमें भेद है।) (सर्ग २२)


मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महान् वनमें महर्षि वसिष्ठ और मङ्किका समागम एवं संवाद

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! पहलेकी बात है। मङ्किनामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे, जो बड़े कठोर व्रतका पालन करते थे। उन्हें मेरे उपदेशसे किस प्रकार निर्वाणपदकी प्राप्ति हुई, यह बताता हूँ, सुनो। एक समय तुम्हारे पितामह राजा अजके किसी कार्यसे बुलाने-पर मैं आकाशमण्डलसे इस पृथ्वीपर आया। तुम्हारे पितामहकी नगरी अयोध्याको आते समय मैं भूतलपर विचरता हुआ किसी ऐसे विशाल वनमें आ पहुँचा, जहाँ बड़ी कड़ाकेकी धूप पड़ रही थी। श्रीराम ! अविच्छिन्नरूपसे धूल उड़नेके कारण वह सारा जंगल धूसर हो रहा था। वहाँ तपी हुई बालूके कण खूब चमक रहे थे। उस वन-का कहीं ओर-छोर नहीं दिखायी देता था। वहाँ कहीं-कहीं निकृष्ट श्रेणीके गाँवके चिह्न दृष्टिगोचर होते थे। मैं उस जंगलमें जाकर ज्यों ही इधर-उधर घूमने लगा, त्यों ही मुझे अपने सामने एक पथिक दिखायी दिया जो श्रमसे थककर इस प्रकार कह रहा था।

पथिक कह रहा था—अहो! जैसे दुष्ट पुरुषोंका पापपूर्ण सङ्ग संताप देनेवाला ही होता है, उसी प्रकार