भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५३४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्रचण्ड आतपसे तपते हुए ये सूर्यदेव इस समय सब ओरसे खेद ही प्रदान कर रहे हैं। मेरे सारे मर्मस्थल मानो जलते जा रहे हैं। इस धूपमें आग-सी जल रही है। सारी वन-श्रेणियाँ तप्त हो उठी हैं। इनके पत्ते और फूल सिकुड़ गये हैं। इसलिये यह सामने जो छोटा-सा गाँव दिखायी दे रहा है, मैं पहले इसीमें प्रवेश करता हूँ। वहाँ शीघ्रतापूर्वक थकावट दूर करके तीव्र गतिसे अपना रास्ता लूँगा। (यों कहकर वह सामनेके छोटे-से गाँवमें, जहाँ किरातोंकी बस्ती थी, ज्यों ही घुसने लगा त्यों ही मैंने उससे यह बात कही—'सुन्दर शरीरवाले साथी ! जान पड़ता है, तुम्हें वीतराग अकिंचन पुरुषों-के संचरण योग्य मार्गका ज्ञान नहीं है। मरुभूमिके मार्ग-में मिले हुए इस महान् जंगलके राही ! तुम्हारा स्वागत है। नीचेके मार्गसे चलनेवाले राहगीर मनुष्य देशके इस मार्गपर, जहाँ जनसमुदायसे भरे हुए गाँवका अभाव है, थोडा-सा विश्राम कर लेनेपर भी चिरस्थायी विश्राम प्राप्त नहीं कर सकोगे। (तात्पर्य यह कि तुम सकाम कर्मके पथपर चल रहे हो। इस सकाम-कर्मोपासनाद्वारा दक्षिणमार्गसे स्वर्गादि लोकोंमें जाकर कुछ कालतक मनोऽनुकूल सुख भोगनेपर भी वहाँ देहाभिमानसे बँधे रहनेके कारण चिरस्थायी परमानन्दस्वरूप मोक्ष नहीं पा सकोगे।) पामरोंके आवासस्थान इस गाँवमें (देहाभिमानियों-के निवासस्थान इस शरीरमें) विश्राम नहीं मिल सकता। जैसे नमकीन पानी पीनेसे प्यास बढ़ती ही है, घटती नहीं, उसी प्रकार यहाँ सुखभोगकी इच्छा बढ़ती है, परंतु पूरी नहीं होती। यहाँ रहनेवाले प्राणी काम, धनकी आसक्ति और द्वेष आदिमें ही पुरुषार्थकी पराकाष्ठा समझते हैं। इनके विचार जले हुए हैं। इसलिये ये आपातरमणीय सकाम कर्मोमें ही रमते रहते हैं, जिससे उनमें कुलीनता-के कारण विस्तारको प्राप्त होनेवाली, उदार, शीतलतथा-ब्रह्मानन्दसे सुशोभित होनेवाली विवेकयुक्त बुद्धि नहीं होती। जैसे मधुमिश्रित विषके कण पलभरके लिये स्वादमें मीठे होते हैं, किंतु दूसरे ही क्षण अपनी ओरसे विराग उत्पन्न कर देते हैं और अनिवार्यरूपसे मृत्युदायक होते हैं, उसी प्रकार ग्राम्य सुखभोग क्षणभरके लिये मधुर प्रतीत होते हैं किंतु दूसरे ही क्षण विराग पैदा कर देने तथा प्रायः मार डालनेवाले होते हैं (अतः इनके उपभोगसे तुम्हें चिर विश्रामकी उपलब्धि नहीं हो सकती) !' निष्पाप श्रीराम ! जब मैंने ऐसी बात कही, तब मेरे वचनसे उसे इतनी शान्ति मिली, मानो उसने अमृतमय जलसे स्नान कर लिया हो। तत्पश्चात् वह मुझसे इस प्रकार बोला।

पथिकने कहा—भगवन् ! आप कौन हैं ? आप भीतरसे पूर्णकाम आत्मज्ञानी महात्मा जान पड़ते हैं। आप इस जगत्को शान्तभावसे देख रहे हैं। क्या आपने अमृतका पान किया है ? क्या आप सम्राट् या विराट् पुरुष हैं ? सम्पूर्ण अर्थोंसे रिक्त होते हुए भी आप परिपूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे हैं। मुने ! आपका शान्त, कान्तिमान्, अप्रतिहत, सब ओरसे निवृत्त तथा शक्तिशाली तेजस्वी रूप जो दिखायी देता है, यह कैसे ? आप पृथिवीपर स्थित होकर भी ऐसे जान पड़ते हैं, मानो समस्त लोकोंके ऊपर आकाशमें खड़े हों। आपकी संसारमें कहीं भी आस्था नहीं है, तथापि मुझ-जैसे लोगों-के उद्धारके लिये आप अत्यन्त दृढ़ आस्थासे युक्त दिखायी देते हैं। आप पूर्ण चन्द्रमाके समान सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त होते हुए भी निष्कलङ्क हैं। आपका अन्तःकरण शीतल है। आप प्रकाशमान, समत्वबुद्धिसे युक्त तथा रसायनकी राशिसे सम्पन्न होकर अपनी सहज शोभासे प्रकाशित हो रहे हैं। महाभाग महर्षे ! मैं शाण्डिल्य गोत्रमें उत्पन्न ब्राह्मण हूँ। मेरा नाम मङ्कि है। मैं तीर्थयात्राके लिये निकला था। मैंने दूरतकका रास्ता तय करके बहुत-से तीर्थोंका दर्शन किया है और अब दीर्घ-कालके पश्चात् अपने घरको जानेके लिये उद्यत हुआ हूँ। इस ब्रह्माण्डके भीतर बिजलीकी चमकके समान क्षण-