संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * मङ्किके द्वारा संसारके दोषों तथा उनसे होनेवाले कष्टोंका वर्णन * ५३५
मङ्गुर भूतोंको देखकर मेरा मन संसारसे विरक्त हो रहा है। अतः अब मुझे घर लौटनेका उत्साह नहीं है। भगवन् ! मुझपर कृपा करके आप अपना यथार्थ परिचय दीजिये; क्योंकि साधु पुरुषोंके हृदयरूपी सरोवर स्वच्छ एवं गम्भीर होते हैं। दर्शनमात्रसे ही मित्रता करनेवाले आप-जैसे महात्माओंके सामने आ जानेपर ही समस्त प्राणी कमलोंके समान विकसित और आश्वस्त होते हैं। प्रभो ! मैं समझता हूँ कि मेरा यह मन मोहवश संसार-श्रमजनित दुःखको मिटानेमें समर्थ नहीं है। अतः आप मुझे तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेकी कृपाद्वारा अनुगृहीत कीजिये।
तब मैंने कहा—महाबुद्धे ! मैं आकाशवासी वसिष्ठ मुनि हूँ। राजर्षि अजके किसी आवश्यक कार्यसे मैं इस मार्गपर उपस्थित हुआ हूँ। ब्रह्मन् ! अब तुम विषाद न करो; क्योंकि मनीषी पुरुषोंके मार्गपर आ गये हो और प्रायः संसार-सागरके दूसरे तटपर आ पहुँचे हो। जो महात्मा नहीं है, उसकी बुद्धि और वाणी इस तरहके वैराग्य-वैभवसे उदार नहीं होती तथा उसकी आकृति भी इतनी शान्तिपूर्ण नहीं दिखायी देती। जैसे धीरे-धीरे सानपर घिसनेसे मणि साफ होकर चमक उठती है, उसी प्रकार राग आदि मलोंके पक जानेसे चित्तमें विवेकका उदय होता है। बताओ, तुम क्या जानना चाहते हो ? और इस संसारको क्यों छोड़नेकी इच्छा रखते हो ? मैं तो यह मानता हूँ कि साधक अपने ही प्रयत्नोंसे महात्माओंके दिये हुए उपदेशको सफल बनाता है। जिसकी वासना रागादि मलोंसे रहित हो गयी है, अतएव जिसका हृदय वैराग्य आदि उत्तम साधनोंसे सम्पन्न है तथा जिसकी बुद्धि नित्यानित्य एवं सारासारके विवेकसे सुशोभित है, ऐसा साधक ही महापुरुषोंके उपदेशरूपी तेजसे शोकरहित विशुद्ध परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करनेका अधिकारी होता है, दूसरा नहीं। इसलिये जन्म आदि सम्पूर्ण दुःखोंसे पार होनेकी इच्छा रखनेवाले तुमसे मैं यह कहता हूँ कि तुम उपदेश पानेके योग्य हो। अतः अपना पूर्व वृत्तान्त बताओ।
( सर्ग २३ )
मङ्किके द्वारा संसार, लौकिक सुख, मन, बुद्धि और तृष्णा आदिके दोषों तथा उनसे होनेवाले कष्टोंका वर्णन और वसिष्ठजीसे उपदेश देनेके लिये प्रार्थना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जब मैंने ऐसी बात कही, तब मङ्कि मेरे चरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम करके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भरकर मार्गमें चलते हुए ही इस प्रकार बोले।
मङ्किने कहा—भगवन् ! जैसे नेत्र बारंवार दसों दिशाओंकी ओर दृष्टिपात करते हैं, उसी प्रकार मैंने भी संत-महात्माकी खोजके लिये अनेक बार दसों दिशाओंमें भ्रमण किया; परंतु संशयका विनाश करनेवाला कोई श्रेष्ठ महापुरुष मुझे नहीं मिला। आज आपको पाकर मैंने समस्त शरीरोंके सारोंके भी सार इस ब्राह्मणशरीरका फल पा लिया। भगवन् ! संसाररूपी दोष प्रदान करनेवाली दशाओंको देखते-देखते मैं उद्विग्न हो उठा हूँ। मुने ! संसारके सभी सुख अन्ततोगत्वा अवश्य ही दुःखरूपमें परिणत हो जाते हैं, इसलिये वे अत्यन्त दुःखरूप ही हैं। इन सांसारिक सुखोंकी अपेक्षा तो दुःख ही श्रेष्ठ है। अन्तमें सुदृढ़ दुःखकी प्राप्ति करानेके कारण ये लौकिक सुख मुझे दुःखमें ही डाल रहे हैं, मानो मेरे लिये दुःख ही सुखके रूपमें प्राप्त हुआ हो।
१. मित्रका दूसरा अर्थ सूर्य है। सूर्यके सामने कमल खिलते हैं, अतः यहाँ 'मित्रता' शब्द मैत्री तथा सूर्यसम्बन्धी दोनों अर्थोंका वाचक है।