संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
दाँत, केश और आँतोंके साथ ही मेरी अवस्था भी अब जरासे जर्जर हो गयी है। मेरा मन पीपलके उड़ते हुए सूखे पत्ते आदिके संचयसे गंदे गाँवोंके मध्यभागकी भाँति मलिन हो गया है तथा मेरी जीविका भी नाना प्रकारकी भोग-वासनारूपी दुर्गन्धोंको अपने अङ्गमें धारण करनेवाली गृध्रतुल्य इन्द्रियोंके कारण निकृष्ट गाँवोंकी स्थितिके समान अत्यन्त पापपूर्ण एवं दुःखदायिनी हो गयी है। मेरी बुद्धि काँटेदार वृक्षपर फुननेवाली चोंचके समान विकराल एवं कुटिल है। आयाससे युक्त और अज्ञानान्धकारसे आच्छादित जो विषयोंकी निरन्तर चिन्ता है, उसमें रत रहकर मैंने अपनी सारी आयु व्यर्थ गवाँ दी है। ब्रह्म-साक्षात्कार-रूपी प्रकाश मुझे इस जीवनमें अभीतक नहीं मिला। स्वजनोंमें आसक्त हुआ यह जीवन जीर्ण हो चला, परंतु अबतक मैं संसारको पार न कर सका। जन्म-मरणका भय देनेवाली भोगोंकी अभिलाषा दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। कण्टकयुक्त और अपवित्र स्थानमें स्थित भिलावेके वृक्षकी भाँति मेरा मन भी क्रूरतासे युक्त और अपवित्र विषयोंमें रत है। यह सारे शरीरमें फैलने या रेंगने-वाले अर्जुनवात नामक रोगके समान चञ्चल है तथा असत् होनेपर भी सङ्कल्पद्वारा बड़े-बड़े कर्मोंका आरम्भ करनेवाला है। इसकी इच्छाएँ कभी पूरी नहीं हुईं तथा शरीरोंके मरनेपर भी इसकी मृत्यु नहीं हुई। यह केवल दुःख देनेके लिये ही उछल-कूद मचाता है। मैंने अवस्तुको ही वस्तु समझा है। मेरा मनरूपी हाथी मतवाला हो गया है और इन्द्रियाँ मुझे काटे डालती हैं। न जाने मेरी क्या दशा होगी। मैंने ज्ञानी पुरुषोंकी सेवा करके वह शास्त्रीय दृष्टि नहीं प्राप्त की, जो संसार-सागरसे पार करनेके लिये नौकाके समान है। तात ! इसलिये इस प्रकार सब ओरसे अनर्थोंकी ही प्राप्ति होनेके कारण मैं अत्यन्त भयंकर मोहमें डूब गया हूँ। इस मोह सागरसे उद्धार पानेके लिये भविष्यमें जो कल्याणकारी उपाय हो, उसीको मैं पूछ रहा हूँ। अतः कृपा करके आप उसे बताइये। श्रेष्ठ महात्मा पुरुषका सङ्ग प्राप्त होनेपर मोहका नाश हो जाता है और समस्त आशाएँ निर्मल हो जाती हैं—ठीक उसी तरह जैसे शरत्काल आनेपर कुहरे मिट जाते हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ हो जाती हैं। संतोंकी महिमाके विषयमें जो ऐसी बात कही गयी है, वह आपके द्वारा मुझे भवरोगको शान्त करनेवाले बोधकी प्राप्ति करनेके साथ ही सत्य एवं सफल हो।
(सर्ग २४)
संसारके चार बीजोंका वर्णन और परमात्माके तत्त्वज्ञानसे ही इन बीजोंके विनाशपूर्वक मोक्षका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजीने (मैंने) कहा—ब्रह्मन् ! संवेदन¹, भावन², वासना³ और कलना⁴—ये चार ही शब्द ऐसे हैं, जिनके अर्थ इस संसारमें अनर्थ पैदा करनेवाले हैं। ये सभी मिथ्या होनेके कारण निष्प्रयोजन हैं, तथापि अविद्यासे विस्तारको प्राप्त हो रहे हैं। वेदन और भावन—इन दोको समस्त दोषोंका आश्रय समझो। इनमें भी जो भावन है, उसीमें सारी आपत्तियाँ निवास करती हैं—ठीक वैसे ही, जैसे वसन्तऋतुके द्वारा प्रवर्तित रसमें ही पुष्प, पल्लव आदिसे समृद्ध लताएँ विद्यमान रहती हैं (क्योंकि लताका सारा वैभव उस रसका ही परिणाम होता है)। यह संसारमार्ग बड़ा गहन है। इसपर वासनाका आवेश लेकर चलते हुए प्राणीके ऊपर विचित्र परिणामवाले अनेक प्रकारके घटना-चक्र आते रहते हैं। जो
१. पहले-पहल इन्द्रियोंसे जो विषयोंका उपभोग होता है उसीको संवेदन कहते हैं। २. विषयोंके नष्ट हो जानेपर उनका बारम्बार चिन्तन ही भावन कहा गया है। ३. बारंबार विषय-चिन्तनसे जो चित्तमें विषयोंका दृढ़ संस्कार जम जाता है, उसका नाम वासना है। ४. उस वासनाके कारण मृत्युकालमें भावी शरीरके लिये जो स्मृति होती है, उसको कलना कहते हैं।