भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण प्रकरण उ०] * भावना और वासनाके कारण संसार-दुःखकी प्राप्ति तथा विवेकसे उसकी शान्ति * ५३७


विवेकी है, उसका संसारभ्रम वसन्तके अन्तमें ग्रीष्म ऋतुके तापसे सूख जानेवाले पृथ्वीके रसकी भाँति वासना-सहित नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार वसन्त ऋतुका रसप्रवाह कदलीवनमें फैलनेवाली कदलीका विस्तार करती है, उसी प्रकार वासना मनारूपी काँटेदार झाड़ीका प्रसार करती है। यहाँ अद्वितीय विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माके सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है। जैसे अनन्त आकाशमें शून्यरूपताको छोड़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उसी प्रकार असीम परमात्मामें चैतन्य सत्ताके सिवा और कोई वस्तु नहीं है। जैसे बालकको वेतालके न होनेपर भी अज्ञानवश उसके होनेका भ्रम हो जाता है, उसी प्रकार असत् होकर भी सत्की भाँति भासित होनेवाला यह संसार परमात्मतत्त्वको न जाननेके कारण ही अनुभवमें आ रहा है। परमात्मतत्त्वके ज्ञानका प्रकाश होते ही यह क्षणभरमें नष्ट हो जाता है। जो वस्तु तत्त्वज्ञानसे ज्ञात होती है, वह ज्ञानस्वरूप ही कही जाती है; क्योंकि अज्ञान ज्ञानका विरोधी है, इसलिये वह ज्ञानरूपसे नहीं जाना जाता। इस तरह विचार करनेसे ज्ञेय और ज्ञान दोनों एकरूप सिद्ध होते हैं। उनमें कोई भेद नहीं है। द्रष्टा, दर्शन और दृश्य—इन तीनोंमेंसे प्रत्येककी बोधरूपता ही सार है। जैसे आकाशमें फूल नहीं होता, उसी तरह द्रष्टा आदिकी त्रिपुटीमें ज्ञानरूपतासे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं होती। 'यह मेरा है' इस तरहकी ममता ही बन्धनमें डालनेवाली है और 'मैं यह शरीर आदि नहीं हूँ' इस प्रकार जो अहंताका अभाव है, वह ममताके बन्धनको दूर करके मुक्ति प्रदान करनेवाला है—जब यह समझ पूर्णतया अपने अधीन हो जाय, तब अज्ञान कहाँ रहा ! अपनी वासना और अभिमानके अनुसार राग आदि रससे रञ्जित लोग हथेलीसे ताड़ित हुए गेंदके समान खूब इधर-उधर उछल-कूदकर अन्तमें नरकोंके गर्तमें गिर जाते हैं। वहाँ दीर्घकालतक तरह-तरहकी वासनाओंके क्लेशोंसे भलीभाँति जर्जर हो कालान्तरमें पुनः स्थावर, कृमि-कीट आदि दूसरे-दूसरे रूपोंमें प्रकट होते हैं। (मानव-जन्म तो उनके लिये दुर्लभ ही बना रहता है।) (सर्ग २५)


भावना और वासनाके कारण संसार-दुःखकी प्राप्ति तथा विवेकसे उसकी शान्ति, सर्वत्र ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन एवं मङ्किके मोहका निवारण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! संसारके ये सभी पदार्थ वनमें बिखरे हुए प्रस्तर-खण्डोंके समान एक-दूसरेसे कोई लगाव नहीं रखते। भावना ही इन्हें एक-दूसरेसे जोड़नेके लिये शृङ्खला है। अहो ! कितने आश्चर्यकी बात है कि वासनाके वशीभूत होकर विवश हुए ये समस्त प्राणी विभिन्न जन्मोंमें विचित्र प्रकारके सुख-दुःखोंको भोगते रहते हैं। अहो ! यह वासना बड़ी विषम है, जिसके वशमें होकर लोग असत् विषयोंसे ही अपने मनमें तृप्तिका अनुभव करते हैं, यद्यपि यह तृप्ति उनका भ्रम ही है। जैसे रूपका अवलोकन दृष्टिका प्रसारमात्र है, उसी प्रकार अहंकारयुक्त जगत् जीवात्माके अविवेक और प्रमादसे पूर्ण मानसिक मरुप्रपञ्चका विस्तारमात्र है। जैसे वायु अपनी चेष्टाका प्रसार करती है, उसी प्रकार विशुद्ध जीवात्मा वास्तवमें शुद्ध होनेपर भी किञ्चित् अविवेकजनित प्रसरणमात्रसे अहंकारयुक्त असत् जगत्‌का विस्तार करता है। जैसे जड आकाश शून्यमात्र है, वायु स्पन्दनमात्र है और लहर आदि जलमात्र ही हैं, उसी प्रकार यह जगत् भी जीवात्माकी भावना या सङ्कल्पमात्र ही है। 'ब्रह्म' शब्दसे जिस महत्ताका प्रतिपादन किया जाता है, वही सम्पूर्ण पदार्थोंका उनका वास्तविक रूप है। इसमें किसी तरहकी शङ्का नहीं