भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 581

५३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


है। इसलिये सब कुछ अविनाशी ब्रह्ममय ही है।

प्रिय विप्रवर ! आकाशके समान निर्मल आत्मामें मनको विलीन करके स्थित हुए ज्ञानयोगीको नाम और रूपकी प्रतीति ही नहीं होती। स्वरूपस्थितिके लिये उसके द्वारा किया गया अभ्यास जबतक दृढ़ नहीं हो जाता, तभीतक उसे अपने मनमें स्वप्न-विकारके समान नाम-रूपका भान होता है। मन जहाँ जो कुछ निर्माण या प्रसार करता है, वहाँ वह स्वयं ही उन-उन वस्तुओंका रूप धारण करके स्थित हो जाता है। अतः मनसे भिन्न किसी दृश्य वस्तुकी सत्ता न होनेके कारण यह दृश्य-प्रपञ्च वास्तवमें है ही नहीं। फिर कौन कहाँ किसकी सृष्टि करता है? जब जीवात्मामें अहंताकी रेखा खिंच जाती है, तभी वह संसार-भ्रमरूप भाव-विकारसे युक्त हो जाता है और जब अहंताकी वह रेखा मिट जाती है, तब वह अपने स्वरूपमात्रमें स्थित हो सहज शान्तिसे सुशोभित होता है। परमात्मा मोक्षरूप, मनसे रहित, मौनी, कर्ता, अकर्ता और शीतल है। वह ज्ञानस्वरूप एवं शान्त ही है। वह दृश्य-प्रपञ्चसे शून्य होता हुआ ही सर्वत्र परिपूर्ण है। जैसे किसी यन्त्रद्वारा बनाये गये पुतलेका शरीर वासना और चेष्टासे शून्य होता है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप आत्मा वास्तवमें वासनारहित एवं स्पन्दनशून्य है। वह व्यवहार-परायण प्रतीत होकर भी अपने यथार्थ स्वरूपमें ही स्थित रहता है।

जैसे झूलते हुए झूलेमें सोये हुए बालकके अङ्ग नहीं हिलते, झूलेके हिलनेसे ही उन अङ्गोंका हिलना प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुषमें स्वरूपानुसंधानके सिवा दूसरी कोई चेष्टा नहीं होती; वे परेच्छासे ही चेष्टाशील दिखायी देते हैं, स्वतः नहीं। आशा, चेष्टा, एषणा और कामना आदिसे रहित तथा बहिर्मुख वृत्तिसे शून्य जो अखण्ड आत्मबोध है, वह शान्त, अनन्त आत्मस्वरूप ही है। अतः उसे शरीर आदिका अनुसंधान होना कैसे सम्भव है। समस्त कामनाओंसे रहित जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुषको, जो द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीसे रहित निराकार ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार कर चुका है, शरीरका अनुसंधान कैसे हो सकता है। समस्त वस्तुओंकी अपेक्षा (इच्छा) ही सुदृढ बन्धन है और उनकी उपेक्षा ही मुक्ति है। जो उस मुक्तिमें विश्राम कर रहा है, उसे किस वस्तुकी इच्छा हो सकती है। तत्त्वज्ञानी विद्वान् केवल अपने यथार्थ स्वरूपमें ही स्थित रहता है। उसकी सारी इच्छाएँ और चेष्टाएँ शान्त हो जाती हैं तथा उसकी सब उत्कण्ठाएँ दूर हो जाती हैं। उसे अपने शरीरका भी भान नहीं होता।

श्रीराम ! मेरे इस उपदेशको सुनकर मङ्किने वहीं अपने महान् मोहको भी उसी तरह पूर्णरूपसे त्याग दिया, जैसे साँप अपनी केंचुलको छोड़ देता है। प्रारब्धवश प्राप्त हुए कार्यको वासनाशून्य होकर करते हुए मङ्किमुनि सौ वर्षोंके पश्चात् एक पर्वतपर समाधिमें स्थित हो गये। वे आजतक वहाँ प्रस्तरके समान निश्चल होकर बैठे हैं। उनकी नेत्र आदि समस्त इन्द्रियाँ शान्त हो गयी हैं। कभी-कभी दूसरोंद्वारा जगाये जानेपर ज्ञानयोगी मङ्कि समाधिसे जग भी जाते हैं।

(सर्ग २६)


आत्मा या ब्रह्मकी समता, सर्वरूपता तथा द्वैतशून्यताका प्रतिपादन; जीवात्माकी ब्रह्मभावनासे संसार-निवृत्तिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सर्वत्र व्यापक परमात्मा एक होता हुआ ही सभी रूपोंमें विराजमान

है। उसमें अज्ञानवश ही अनेकताकी कल्पना हुई है। ज्ञान हो जानेपर तो न वह एक है और न अनेक

संक्षिप्त योगवासिष्ठ · पृष्ठ 581, कुल 750 में से · BharatKosha