भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 582

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * परमार्थ-तत्त्वका उपदेश * ५३९

या सर्वरूप ही; फिर उसमें नानात्वकी कल्पना कैसे हो सकती है । आदि-अन्तसे रहित सारा आकाश चित्तत्त्व—सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मासे परिपूर्ण है । फिर शरीरकी उत्पत्ति और विनाश होनेपर भी उस चेतन तत्त्वका खण्डन कैसे हो सकता है । अमावास्याके बाद जब प्रतिपदाको चन्द्रमाकी एक कला उदित होती है, तब समुद्र आनन्दके मारे उछलने लगता है और जब प्रलयकालकी प्रचण्ड वायु चलती है, तब वह सूख जाता है । परंतु आत्मतत्त्व कभी किसी अवस्थामें न तो क्षुब्ध होता है और न क्षीण ही होता है । वह सदा समभावसे सौम्य बना रहता है । जैसे नावपर यात्रा करनेवाले पुरुषको स्थावर वृक्ष और पर्वत आदि चलते-से प्रतीत होते हैं तथा जैसे सीपीमें लोगोंको चाँदीका भ्रम होता है, उसी प्रकार चित्तको चिन्मय परमात्मामें देहादिरूप जगत्‌की प्रतीति होती है । यह शरीर आदि चित्तकी कल्पना है और शरीर आदिकी दृष्टिसे चित्तकी कल्पना हुई है । इसी प्रकार देह और चित्त दोनोंकी दृष्टिसे जीवभावकी कल्पना हुई है । वास्तवमें ये सब-के-सब परमपदस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें बिना हुए ही प्रतीत होते हैं अथवा ये सब-के-सब चिन्मय परम तत्त्वसे भिन्न नहीं हैं; ऐसी दशामें द्वैत कहाँ रहा ? परब्रह्म परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर यह सब कुछ एकमात्र शान्तस्वरूप ब्रह्म ही सिद्ध होता है । अतः ब्रह्मके सिवा जगत् आदि दूसरा कोई पदार्थ नहीं है और न दूसरी कोई भ्रान्ति ही है ।

रघुनन्दन ! वासनायुक्त जीवात्माकी भावनासे जगत्‌ सम्पत्तिका प्रादुर्भाव होता है और वासनाशून्य जीवात्माकी ब्रह्मभावनासे संसारकी निवृत्ति होती है । जीवात्माका जो वासनारहित विशुद्ध स्पन्दन (भावना) है, उसे स्पन्दन माना ही नहीं गया है, जैसे समुद्रमें भंवर आदिके द्वारा भीतर घूमती हुई तरङ्ग स्पन्दनशील होनेपर भी स्पन्दनशून्य ही मानी जाती है । किंतु जगत्‌की कारणभूता जो जीवात्माकी दृश्यभावना है, उसके भीतर जो वासनारस विद्यमान है, वही अङ्कुर प्रकट करता है; अतः उसीको असङ्गरूप अग्निसे जलाकर भस्म कर देना चाहिये । मनुष्य कर्म करता हो या न करता हो; परंतु शुभाशुभ कार्योंमें वह जो मनसे डूब नहीं जाता, उसकी इस अनासक्तिको ही विद्वान् पुरुष असङ्ग मानते हैं अथवा वासनाको उखाड़ फेंकना ही असङ्ग कहा गया है । अहम्भावका त्याग करना ही संसार-सागरसे पार होना है और उसीका नाम वासनाक्षय है । इसके लिये अपने पुरुषार्थके सिवा दूसरी कोई गति नहीं है । श्रीराम ! तुम तो आत्माराम और पूर्णकाम हो ही । सारी इच्छाओंसे रहित निश्शङ्क हो समस्त कार्य करते हुए भी केवल अपने चिन्मय स्वरूपमें ही स्थित रहो । भय तुमसे सदा दूर ही रहता है । अतः अपनी सहज शान्तिके द्वारा सबके मनोऽभिराम बने रहो ।

(सर्ग २७-२८)


परमार्थ-तत्त्वका उपदेश और स्वरूपभूत परमात्मपदमें प्रतिष्ठित रहते हुए व्यवहार करते रहनेका आदेश देते हुए वसिष्ठजीका श्रीरामके प्रश्नोंका उत्तर देना तथा संसारी मनुष्योंको आत्मज्ञान एवं मोक्षके लिये प्रेरित करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--श्रीराम ! तुम आकाशके समान विशद और तत्त्वके ज्ञाता हो । एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मपदमें तुम्हारी स्थिति है । तुम सर्वत्र सम सौम्य और सम्पूर्णानन्दमय हो, तुम्हारा अन्तःकरण ब्रह्मस्वरूप एवं विशाल है । निष्पाप रघुनन्दन ! जो पुरुष अपनी इन्द्रियोंको अन्तर्मुख करके सदा ब्रह्मानन्दमें निमग्न हो आत्माराम, शान्त एवं उदार-भावसे कार्य करता है, वह जन्मजनने दोषसे रहित