संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
निर्वाण-प्रकरण उ०] * मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महान् वनमें महर्षि वसिष्ठ और मङ्किका समागम * ५३३
तो ढूँढ़नेपर भी इस भ्रमका पता नहीं चलता। जैसे मृगतृष्णा जल नहीं दे सकती, उसी तरह निर्मूल हुआ भ्रम संसाररूपी अङ्कुर नहीं उत्पन्न कर सकता। जैसे जला हुआ बीज अङ्कुरित नहीं हो सकता, उसी प्रकार परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे छिन्न हुई अहम्भावना दिखायी देनेपर भी मनोभूमिमें संसाररूपी वृक्षका अंकुर नहीं उत्पन्न कर सकती। मानसिक विकारोंसे रहित वीतराग तत्त्वज्ञानी पुरुष कर्म करे या न करे, उसकी स्थितिमें कोई अन्तर नहीं आता। वह तो मनके संकल्पसे रहित एवं नित्य शान्त हुआ परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता है। जो लोग योगका आश्रय लेकर शान्त बने हुए हैं, वे योगी भी चित्तका उपशमन होनेपर ही भलीभाँति शान्त हो पाते हैं, अन्यथा नहीं; क्योंकि उनकी भोग-वासनाएँ मूलतः क्षीण नहीं होतीं। (कारण यह है कि इन वासनाओंकी खानरूप जो चित्त है, वह तो उनका बना ही रहता है।) अनन्त, अव्यक्त एवं सुन्दर चिदाकाशरूप कर्पूर अपने भीतर स्वयं जो चमत्कार प्रकट करता है, उसीको वह जगद्रूपसे जानता है। रघुनन्दन ! इस तरह यह जगत् तत्त्वज्ञानी पुरुषको उसका सांसारिक भ्रम दूर हो जानेके कारण प्रकाशमय तथा शान्त अक्षय ब्रह्मरूप ही भासित होता है, जब कि अज्ञानीको यह परमार्थतः परब्रह्म परमात्मामें स्थित होकर भी भोगजनित आनन्दके अनुगत ही प्रतीत होता है। (इस प्रकार दोनोंकी दृष्टियोंमें भेद है।) (सर्ग २२)
मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महान् वनमें महर्षि वसिष्ठ और मङ्किका समागम एवं संवाद
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! पहलेकी बात है। मङ्किनामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे, जो बड़े कठोर व्रतका पालन करते थे। उन्हें मेरे उपदेशसे किस प्रकार निर्वाणपदकी प्राप्ति हुई, यह बताता हूँ, सुनो। एक समय तुम्हारे पितामह राजा अजके किसी कार्यसे बुलाने-पर मैं आकाशमण्डलसे इस पृथ्वीपर आया। तुम्हारे पितामहकी नगरी अयोध्याको आते समय मैं भूतलपर विचरता हुआ किसी ऐसे विशाल वनमें आ पहुँचा, जहाँ बड़ी कड़ाकेकी धूप पड़ रही थी। श्रीराम ! अविच्छिन्नरूपसे धूल उड़नेके कारण वह सारा जंगल धूसर हो रहा था। वहाँ तपी हुई बालूके कण खूब चमक रहे थे। उस वन-का कहीं ओर-छोर नहीं दिखायी देता था। वहाँ कहीं-कहीं निकृष्ट श्रेणीके गाँवके चिह्न दृष्टिगोचर होते थे। मैं उस जंगलमें जाकर ज्यों ही इधर-उधर घूमने लगा, त्यों ही मुझे अपने सामने एक पथिक दिखायी दिया जो श्रमसे थककर इस प्रकार कह रहा था।
पथिक कह रहा था—अहो! जैसे दुष्ट पुरुषोंका पापपूर्ण सङ्ग संताप देनेवाला ही होता है, उसी प्रकार
५३४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्रचण्ड आतपसे तपते हुए ये सूर्यदेव इस समय सब ओरसे खेद ही प्रदान कर रहे हैं। मेरे सारे मर्मस्थल मानो जलते जा रहे हैं। इस धूपमें आग-सी जल रही है। सारी वन-श्रेणियाँ तप्त हो उठी हैं। इनके पत्ते और फूल सिकुड़ गये हैं। इसलिये यह सामने जो छोटा-सा गाँव दिखायी दे रहा है, मैं पहले इसीमें प्रवेश करता हूँ। वहाँ शीघ्रतापूर्वक थकावट दूर करके तीव्र गतिसे अपना रास्ता लूँगा। (यों कहकर वह सामनेके छोटे-से गाँवमें, जहाँ किरातोंकी बस्ती थी, ज्यों ही घुसने लगा त्यों ही मैंने उससे यह बात कही—'सुन्दर शरीरवाले साथी ! जान पड़ता है, तुम्हें वीतराग अकिंचन पुरुषों-के संचरण योग्य मार्गका ज्ञान नहीं है। मरुभूमिके मार्ग-में मिले हुए इस महान् जंगलके राही ! तुम्हारा स्वागत है। नीचेके मार्गसे चलनेवाले राहगीर मनुष्य देशके इस मार्गपर, जहाँ जनसमुदायसे भरे हुए गाँवका अभाव है, थोडा-सा विश्राम कर लेनेपर भी चिरस्थायी विश्राम प्राप्त नहीं कर सकोगे। (तात्पर्य यह कि तुम सकाम कर्मके पथपर चल रहे हो। इस सकाम-कर्मोपासनाद्वारा दक्षिणमार्गसे स्वर्गादि लोकोंमें जाकर कुछ कालतक मनोऽनुकूल सुख भोगनेपर भी वहाँ देहाभिमानसे बँधे रहनेके कारण चिरस्थायी परमानन्दस्वरूप मोक्ष नहीं पा सकोगे।) पामरोंके आवासस्थान इस गाँवमें (देहाभिमानियों-के निवासस्थान इस शरीरमें) विश्राम नहीं मिल सकता। जैसे नमकीन पानी पीनेसे प्यास बढ़ती ही है, घटती नहीं, उसी प्रकार यहाँ सुखभोगकी इच्छा बढ़ती है, परंतु पूरी नहीं होती। यहाँ रहनेवाले प्राणी काम, धनकी आसक्ति और द्वेष आदिमें ही पुरुषार्थकी पराकाष्ठा समझते हैं। इनके विचार जले हुए हैं। इसलिये ये आपातरमणीय सकाम कर्मोमें ही रमते रहते हैं, जिससे उनमें कुलीनता-के कारण विस्तारको प्राप्त होनेवाली, उदार, शीतलतथा-ब्रह्मानन्दसे सुशोभित होनेवाली विवेकयुक्त बुद्धि नहीं होती। जैसे मधुमिश्रित विषके कण पलभरके लिये स्वादमें मीठे होते हैं, किंतु दूसरे ही क्षण अपनी ओरसे विराग उत्पन्न कर देते हैं और अनिवार्यरूपसे मृत्युदायक होते हैं, उसी प्रकार ग्राम्य सुखभोग क्षणभरके लिये मधुर प्रतीत होते हैं किंतु दूसरे ही क्षण विराग पैदा कर देने तथा प्रायः मार डालनेवाले होते हैं (अतः इनके उपभोगसे तुम्हें चिर विश्रामकी उपलब्धि नहीं हो सकती) !' निष्पाप श्रीराम ! जब मैंने ऐसी बात कही, तब मेरे वचनसे उसे इतनी शान्ति मिली, मानो उसने अमृतमय जलसे स्नान कर लिया हो। तत्पश्चात् वह मुझसे इस प्रकार बोला।
पथिकने कहा—भगवन् ! आप कौन हैं ? आप भीतरसे पूर्णकाम आत्मज्ञानी महात्मा जान पड़ते हैं। आप इस जगत्को शान्तभावसे देख रहे हैं। क्या आपने अमृतका पान किया है ? क्या आप सम्राट् या विराट् पुरुष हैं ? सम्पूर्ण अर्थोंसे रिक्त होते हुए भी आप परिपूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे हैं। मुने ! आपका शान्त, कान्तिमान्, अप्रतिहत, सब ओरसे निवृत्त तथा शक्तिशाली तेजस्वी रूप जो दिखायी देता है, यह कैसे ? आप पृथिवीपर स्थित होकर भी ऐसे जान पड़ते हैं, मानो समस्त लोकोंके ऊपर आकाशमें खड़े हों। आपकी संसारमें कहीं भी आस्था नहीं है, तथापि मुझ-जैसे लोगों-के उद्धारके लिये आप अत्यन्त दृढ़ आस्थासे युक्त दिखायी देते हैं। आप पूर्ण चन्द्रमाके समान सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त होते हुए भी निष्कलङ्क हैं। आपका अन्तःकरण शीतल है। आप प्रकाशमान, समत्वबुद्धिसे युक्त तथा रसायनकी राशिसे सम्पन्न होकर अपनी सहज शोभासे प्रकाशित हो रहे हैं। महाभाग महर्षे ! मैं शाण्डिल्य गोत्रमें उत्पन्न ब्राह्मण हूँ। मेरा नाम मङ्कि है। मैं तीर्थयात्राके लिये निकला था। मैंने दूरतकका रास्ता तय करके बहुत-से तीर्थोंका दर्शन किया है और अब दीर्घ-कालके पश्चात् अपने घरको जानेके लिये उद्यत हुआ हूँ। इस ब्रह्माण्डके भीतर बिजलीकी चमकके समान क्षण-
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मङ्किके द्वारा संसारके दोषों तथा उनसे होनेवाले कष्टोंका वर्णन * ५३५
मङ्गुर भूतोंको देखकर मेरा मन संसारसे विरक्त हो रहा है। अतः अब मुझे घर लौटनेका उत्साह नहीं है। भगवन् ! मुझपर कृपा करके आप अपना यथार्थ परिचय दीजिये; क्योंकि साधु पुरुषोंके हृदयरूपी सरोवर स्वच्छ एवं गम्भीर होते हैं। दर्शनमात्रसे ही मित्रता करनेवाले आप-जैसे महात्माओंके सामने आ जानेपर ही समस्त प्राणी कमलोंके समान विकसित और आश्वस्त होते हैं। प्रभो ! मैं समझता हूँ कि मेरा यह मन मोहवश संसार-श्रमजनित दुःखको मिटानेमें समर्थ नहीं है। अतः आप मुझे तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेकी कृपाद्वारा अनुगृहीत कीजिये।
तब मैंने कहा—महाबुद्धे ! मैं आकाशवासी वसिष्ठ मुनि हूँ। राजर्षि अजके किसी आवश्यक कार्यसे मैं इस मार्गपर उपस्थित हुआ हूँ। ब्रह्मन् ! अब तुम विषाद न करो; क्योंकि मनीषी पुरुषोंके मार्गपर आ गये हो और प्रायः संसार-सागरके दूसरे तटपर आ पहुँचे हो। जो महात्मा नहीं है, उसकी बुद्धि और वाणी इस तरहके वैराग्य-वैभवसे उदार नहीं होती तथा उसकी आकृति भी इतनी शान्तिपूर्ण नहीं दिखायी देती। जैसे धीरे-धीरे सानपर घिसनेसे मणि साफ होकर चमक उठती है, उसी प्रकार राग आदि मलोंके पक जानेसे चित्तमें विवेकका उदय होता है। बताओ, तुम क्या जानना चाहते हो ? और इस संसारको क्यों छोड़नेकी इच्छा रखते हो ? मैं तो यह मानता हूँ कि साधक अपने ही प्रयत्नोंसे महात्माओंके दिये हुए उपदेशको सफल बनाता है। जिसकी वासना रागादि मलोंसे रहित हो गयी है, अतएव जिसका हृदय वैराग्य आदि उत्तम साधनोंसे सम्पन्न है तथा जिसकी बुद्धि नित्यानित्य एवं सारासारके विवेकसे सुशोभित है, ऐसा साधक ही महापुरुषोंके उपदेशरूपी तेजसे शोकरहित विशुद्ध परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करनेका अधिकारी होता है, दूसरा नहीं। इसलिये जन्म आदि सम्पूर्ण दुःखोंसे पार होनेकी इच्छा रखनेवाले तुमसे मैं यह कहता हूँ कि तुम उपदेश पानेके योग्य हो। अतः अपना पूर्व वृत्तान्त बताओ।
( सर्ग २३ )
मङ्किके द्वारा संसार, लौकिक सुख, मन, बुद्धि और तृष्णा आदिके दोषों तथा उनसे होनेवाले कष्टोंका वर्णन और वसिष्ठजीसे उपदेश देनेके लिये प्रार्थना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जब मैंने ऐसी बात कही, तब मङ्कि मेरे चरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम करके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भरकर मार्गमें चलते हुए ही इस प्रकार बोले।
मङ्किने कहा—भगवन् ! जैसे नेत्र बारंवार दसों दिशाओंकी ओर दृष्टिपात करते हैं, उसी प्रकार मैंने भी संत-महात्माकी खोजके लिये अनेक बार दसों दिशाओंमें भ्रमण किया; परंतु संशयका विनाश करनेवाला कोई श्रेष्ठ महापुरुष मुझे नहीं मिला। आज आपको पाकर मैंने समस्त शरीरोंके सारोंके भी सार इस ब्राह्मणशरीरका फल पा लिया। भगवन् ! संसाररूपी दोष प्रदान करनेवाली दशाओंको देखते-देखते मैं उद्विग्न हो उठा हूँ। मुने ! संसारके सभी सुख अन्ततोगत्वा अवश्य ही दुःखरूपमें परिणत हो जाते हैं, इसलिये वे अत्यन्त दुःखरूप ही हैं। इन सांसारिक सुखोंकी अपेक्षा तो दुःख ही श्रेष्ठ है। अन्तमें सुदृढ़ दुःखकी प्राप्ति करानेके कारण ये लौकिक सुख मुझे दुःखमें ही डाल रहे हैं, मानो मेरे लिये दुःख ही सुखके रूपमें प्राप्त हुआ हो।
१. मित्रका दूसरा अर्थ सूर्य है। सूर्यके सामने कमल खिलते हैं, अतः यहाँ 'मित्रता' शब्द मैत्री तथा सूर्यसम्बन्धी दोनों अर्थोंका वाचक है।
५३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
दाँत, केश और आँतोंके साथ ही मेरी अवस्था भी अब जरासे जर्जर हो गयी है। मेरा मन पीपलके उड़ते हुए सूखे पत्ते आदिके संचयसे गंदे गाँवोंके मध्यभागकी भाँति मलिन हो गया है तथा मेरी जीविका भी नाना प्रकारकी भोग-वासनारूपी दुर्गन्धोंको अपने अङ्गमें धारण करनेवाली गृध्रतुल्य इन्द्रियोंके कारण निकृष्ट गाँवोंकी स्थितिके समान अत्यन्त पापपूर्ण एवं दुःखदायिनी हो गयी है। मेरी बुद्धि काँटेदार वृक्षपर फुननेवाली चोंचके समान विकराल एवं कुटिल है। आयाससे युक्त और अज्ञानान्धकारसे आच्छादित जो विषयोंकी निरन्तर चिन्ता है, उसमें रत रहकर मैंने अपनी सारी आयु व्यर्थ गवाँ दी है। ब्रह्म-साक्षात्कार-रूपी प्रकाश मुझे इस जीवनमें अभीतक नहीं मिला। स्वजनोंमें आसक्त हुआ यह जीवन जीर्ण हो चला, परंतु अबतक मैं संसारको पार न कर सका। जन्म-मरणका भय देनेवाली भोगोंकी अभिलाषा दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। कण्टकयुक्त और अपवित्र स्थानमें स्थित भिलावेके वृक्षकी भाँति मेरा मन भी क्रूरतासे युक्त और अपवित्र विषयोंमें रत है। यह सारे शरीरमें फैलने या रेंगने-वाले अर्जुनवात नामक रोगके समान चञ्चल है तथा असत् होनेपर भी सङ्कल्पद्वारा बड़े-बड़े कर्मोंका आरम्भ करनेवाला है। इसकी इच्छाएँ कभी पूरी नहीं हुईं तथा शरीरोंके मरनेपर भी इसकी मृत्यु नहीं हुई। यह केवल दुःख देनेके लिये ही उछल-कूद मचाता है। मैंने अवस्तुको ही वस्तु समझा है। मेरा मनरूपी हाथी मतवाला हो गया है और इन्द्रियाँ मुझे काटे डालती हैं। न जाने मेरी क्या दशा होगी। मैंने ज्ञानी पुरुषोंकी सेवा करके वह शास्त्रीय दृष्टि नहीं प्राप्त की, जो संसार-सागरसे पार करनेके लिये नौकाके समान है। तात ! इसलिये इस प्रकार सब ओरसे अनर्थोंकी ही प्राप्ति होनेके कारण मैं अत्यन्त भयंकर मोहमें डूब गया हूँ। इस मोह सागरसे उद्धार पानेके लिये भविष्यमें जो कल्याणकारी उपाय हो, उसीको मैं पूछ रहा हूँ। अतः कृपा करके आप उसे बताइये। श्रेष्ठ महात्मा पुरुषका सङ्ग प्राप्त होनेपर मोहका नाश हो जाता है और समस्त आशाएँ निर्मल हो जाती हैं—ठीक उसी तरह जैसे शरत्काल आनेपर कुहरे मिट जाते हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ हो जाती हैं। संतोंकी महिमाके विषयमें जो ऐसी बात कही गयी है, वह आपके द्वारा मुझे भवरोगको शान्त करनेवाले बोधकी प्राप्ति करनेके साथ ही सत्य एवं सफल हो।
(सर्ग २४)
संसारके चार बीजोंका वर्णन और परमात्माके तत्त्वज्ञानसे ही इन बीजोंके विनाशपूर्वक मोक्षका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजीने (मैंने) कहा—ब्रह्मन् ! संवेदन¹, भावन², वासना³ और कलना⁴—ये चार ही शब्द ऐसे हैं, जिनके अर्थ इस संसारमें अनर्थ पैदा करनेवाले हैं। ये सभी मिथ्या होनेके कारण निष्प्रयोजन हैं, तथापि अविद्यासे विस्तारको प्राप्त हो रहे हैं। वेदन और भावन—इन दोको समस्त दोषोंका आश्रय समझो। इनमें भी जो भावन है, उसीमें सारी आपत्तियाँ निवास करती हैं—ठीक वैसे ही, जैसे वसन्तऋतुके द्वारा प्रवर्तित रसमें ही पुष्प, पल्लव आदिसे समृद्ध लताएँ विद्यमान रहती हैं (क्योंकि लताका सारा वैभव उस रसका ही परिणाम होता है)। यह संसारमार्ग बड़ा गहन है। इसपर वासनाका आवेश लेकर चलते हुए प्राणीके ऊपर विचित्र परिणामवाले अनेक प्रकारके घटना-चक्र आते रहते हैं। जो
१. पहले-पहल इन्द्रियोंसे जो विषयोंका उपभोग होता है उसीको संवेदन कहते हैं। २. विषयोंके नष्ट हो जानेपर उनका बारम्बार चिन्तन ही भावन कहा गया है। ३. बारंबार विषय-चिन्तनसे जो चित्तमें विषयोंका दृढ़ संस्कार जम जाता है, उसका नाम वासना है। ४. उस वासनाके कारण मृत्युकालमें भावी शरीरके लिये जो स्मृति होती है, उसको कलना कहते हैं।
निर्वाण प्रकरण उ०] * भावना और वासनाके कारण संसार-दुःखकी प्राप्ति तथा विवेकसे उसकी शान्ति * ५३७
विवेकी है, उसका संसारभ्रम वसन्तके अन्तमें ग्रीष्म ऋतुके तापसे सूख जानेवाले पृथ्वीके रसकी भाँति वासना-सहित नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार वसन्त ऋतुका रसप्रवाह कदलीवनमें फैलनेवाली कदलीका विस्तार करती है, उसी प्रकार वासना मनारूपी काँटेदार झाड़ीका प्रसार करती है। यहाँ अद्वितीय विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माके सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है। जैसे अनन्त आकाशमें शून्यरूपताको छोड़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उसी प्रकार असीम परमात्मामें चैतन्य सत्ताके सिवा और कोई वस्तु नहीं है। जैसे बालकको वेतालके न होनेपर भी अज्ञानवश उसके होनेका भ्रम हो जाता है, उसी प्रकार असत् होकर भी सत्की भाँति भासित होनेवाला यह संसार परमात्मतत्त्वको न जाननेके कारण ही अनुभवमें आ रहा है। परमात्मतत्त्वके ज्ञानका प्रकाश होते ही यह क्षणभरमें नष्ट हो जाता है। जो वस्तु तत्त्वज्ञानसे ज्ञात होती है, वह ज्ञानस्वरूप ही कही जाती है; क्योंकि अज्ञान ज्ञानका विरोधी है, इसलिये वह ज्ञानरूपसे नहीं जाना जाता। इस तरह विचार करनेसे ज्ञेय और ज्ञान दोनों एकरूप सिद्ध होते हैं। उनमें कोई भेद नहीं है। द्रष्टा, दर्शन और दृश्य—इन तीनोंमेंसे प्रत्येककी बोधरूपता ही सार है। जैसे आकाशमें फूल नहीं होता, उसी तरह द्रष्टा आदिकी त्रिपुटीमें ज्ञानरूपतासे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं होती। 'यह मेरा है' इस तरहकी ममता ही बन्धनमें डालनेवाली है और 'मैं यह शरीर आदि नहीं हूँ' इस प्रकार जो अहंताका अभाव है, वह ममताके बन्धनको दूर करके मुक्ति प्रदान करनेवाला है—जब यह समझ पूर्णतया अपने अधीन हो जाय, तब अज्ञान कहाँ रहा ! अपनी वासना और अभिमानके अनुसार राग आदि रससे रञ्जित लोग हथेलीसे ताड़ित हुए गेंदके समान खूब इधर-उधर उछल-कूदकर अन्तमें नरकोंके गर्तमें गिर जाते हैं। वहाँ दीर्घकालतक तरह-तरहकी वासनाओंके क्लेशोंसे भलीभाँति जर्जर हो कालान्तरमें पुनः स्थावर, कृमि-कीट आदि दूसरे-दूसरे रूपोंमें प्रकट होते हैं। (मानव-जन्म तो उनके लिये दुर्लभ ही बना रहता है।) (सर्ग २५)
भावना और वासनाके कारण संसार-दुःखकी प्राप्ति तथा विवेकसे उसकी शान्ति, सर्वत्र ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन एवं मङ्किके मोहका निवारण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! संसारके ये सभी पदार्थ वनमें बिखरे हुए प्रस्तर-खण्डोंके समान एक-दूसरेसे कोई लगाव नहीं रखते। भावना ही इन्हें एक-दूसरेसे जोड़नेके लिये शृङ्खला है। अहो ! कितने आश्चर्यकी बात है कि वासनाके वशीभूत होकर विवश हुए ये समस्त प्राणी विभिन्न जन्मोंमें विचित्र प्रकारके सुख-दुःखोंको भोगते रहते हैं। अहो ! यह वासना बड़ी विषम है, जिसके वशमें होकर लोग असत् विषयोंसे ही अपने मनमें तृप्तिका अनुभव करते हैं, यद्यपि यह तृप्ति उनका भ्रम ही है। जैसे रूपका अवलोकन दृष्टिका प्रसारमात्र है, उसी प्रकार अहंकारयुक्त जगत् जीवात्माके अविवेक और प्रमादसे पूर्ण मानसिक मरुप्रपञ्चका विस्तारमात्र है। जैसे वायु अपनी चेष्टाका प्रसार करती है, उसी प्रकार विशुद्ध जीवात्मा वास्तवमें शुद्ध होनेपर भी किञ्चित् अविवेकजनित प्रसरणमात्रसे अहंकारयुक्त असत् जगत्का विस्तार करता है। जैसे जड आकाश शून्यमात्र है, वायु स्पन्दनमात्र है और लहर आदि जलमात्र ही हैं, उसी प्रकार यह जगत् भी जीवात्माकी भावना या सङ्कल्पमात्र ही है। 'ब्रह्म' शब्दसे जिस महत्ताका प्रतिपादन किया जाता है, वही सम्पूर्ण पदार्थोंका उनका वास्तविक रूप है। इसमें किसी तरहकी शङ्का नहीं
५३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
है। इसलिये सब कुछ अविनाशी ब्रह्ममय ही है।
प्रिय विप्रवर ! आकाशके समान निर्मल आत्मामें मनको विलीन करके स्थित हुए ज्ञानयोगीको नाम और रूपकी प्रतीति ही नहीं होती। स्वरूपस्थितिके लिये उसके द्वारा किया गया अभ्यास जबतक दृढ़ नहीं हो जाता, तभीतक उसे अपने मनमें स्वप्न-विकारके समान नाम-रूपका भान होता है। मन जहाँ जो कुछ निर्माण या प्रसार करता है, वहाँ वह स्वयं ही उन-उन वस्तुओंका रूप धारण करके स्थित हो जाता है। अतः मनसे भिन्न किसी दृश्य वस्तुकी सत्ता न होनेके कारण यह दृश्य-प्रपञ्च वास्तवमें है ही नहीं। फिर कौन कहाँ किसकी सृष्टि करता है? जब जीवात्मामें अहंताकी रेखा खिंच जाती है, तभी वह संसार-भ्रमरूप भाव-विकारसे युक्त हो जाता है और जब अहंताकी वह रेखा मिट जाती है, तब वह अपने स्वरूपमात्रमें स्थित हो सहज शान्तिसे सुशोभित होता है। परमात्मा मोक्षरूप, मनसे रहित, मौनी, कर्ता, अकर्ता और शीतल है। वह ज्ञानस्वरूप एवं शान्त ही है। वह दृश्य-प्रपञ्चसे शून्य होता हुआ ही सर्वत्र परिपूर्ण है। जैसे किसी यन्त्रद्वारा बनाये गये पुतलेका शरीर वासना और चेष्टासे शून्य होता है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप आत्मा वास्तवमें वासनारहित एवं स्पन्दनशून्य है। वह व्यवहार-परायण प्रतीत होकर भी अपने यथार्थ स्वरूपमें ही स्थित रहता है।
जैसे झूलते हुए झूलेमें सोये हुए बालकके अङ्ग नहीं हिलते, झूलेके हिलनेसे ही उन अङ्गोंका हिलना प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुषमें स्वरूपानुसंधानके सिवा दूसरी कोई चेष्टा नहीं होती; वे परेच्छासे ही चेष्टाशील दिखायी देते हैं, स्वतः नहीं। आशा, चेष्टा, एषणा और कामना आदिसे रहित तथा बहिर्मुख वृत्तिसे शून्य जो अखण्ड आत्मबोध है, वह शान्त, अनन्त आत्मस्वरूप ही है। अतः उसे शरीर आदिका अनुसंधान होना कैसे सम्भव है। समस्त कामनाओंसे रहित जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुषको, जो द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीसे रहित निराकार ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार कर चुका है, शरीरका अनुसंधान कैसे हो सकता है। समस्त वस्तुओंकी अपेक्षा (इच्छा) ही सुदृढ बन्धन है और उनकी उपेक्षा ही मुक्ति है। जो उस मुक्तिमें विश्राम कर रहा है, उसे किस वस्तुकी इच्छा हो सकती है। तत्त्वज्ञानी विद्वान् केवल अपने यथार्थ स्वरूपमें ही स्थित रहता है। उसकी सारी इच्छाएँ और चेष्टाएँ शान्त हो जाती हैं तथा उसकी सब उत्कण्ठाएँ दूर हो जाती हैं। उसे अपने शरीरका भी भान नहीं होता।
श्रीराम ! मेरे इस उपदेशको सुनकर मङ्किने वहीं अपने महान् मोहको भी उसी तरह पूर्णरूपसे त्याग दिया, जैसे साँप अपनी केंचुलको छोड़ देता है। प्रारब्धवश प्राप्त हुए कार्यको वासनाशून्य होकर करते हुए मङ्किमुनि सौ वर्षोंके पश्चात् एक पर्वतपर समाधिमें स्थित हो गये। वे आजतक वहाँ प्रस्तरके समान निश्चल होकर बैठे हैं। उनकी नेत्र आदि समस्त इन्द्रियाँ शान्त हो गयी हैं। कभी-कभी दूसरोंद्वारा जगाये जानेपर ज्ञानयोगी मङ्कि समाधिसे जग भी जाते हैं।
(सर्ग २६)
आत्मा या ब्रह्मकी समता, सर्वरूपता तथा द्वैतशून्यताका प्रतिपादन; जीवात्माकी ब्रह्मभावनासे संसार-निवृत्तिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सर्वत्र व्यापक परमात्मा एक होता हुआ ही सभी रूपोंमें विराजमान
है। उसमें अज्ञानवश ही अनेकताकी कल्पना हुई है। ज्ञान हो जानेपर तो न वह एक है और न अनेक
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * परमार्थ-तत्त्वका उपदेश * ५३९
या सर्वरूप ही; फिर उसमें नानात्वकी कल्पना कैसे हो सकती है । आदि-अन्तसे रहित सारा आकाश चित्तत्त्व—सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मासे परिपूर्ण है । फिर शरीरकी उत्पत्ति और विनाश होनेपर भी उस चेतन तत्त्वका खण्डन कैसे हो सकता है । अमावास्याके बाद जब प्रतिपदाको चन्द्रमाकी एक कला उदित होती है, तब समुद्र आनन्दके मारे उछलने लगता है और जब प्रलयकालकी प्रचण्ड वायु चलती है, तब वह सूख जाता है । परंतु आत्मतत्त्व कभी किसी अवस्थामें न तो क्षुब्ध होता है और न क्षीण ही होता है । वह सदा समभावसे सौम्य बना रहता है । जैसे नावपर यात्रा करनेवाले पुरुषको स्थावर वृक्ष और पर्वत आदि चलते-से प्रतीत होते हैं तथा जैसे सीपीमें लोगोंको चाँदीका भ्रम होता है, उसी प्रकार चित्तको चिन्मय परमात्मामें देहादिरूप जगत्की प्रतीति होती है । यह शरीर आदि चित्तकी कल्पना है और शरीर आदिकी दृष्टिसे चित्तकी कल्पना हुई है । इसी प्रकार देह और चित्त दोनोंकी दृष्टिसे जीवभावकी कल्पना हुई है । वास्तवमें ये सब-के-सब परमपदस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें बिना हुए ही प्रतीत होते हैं अथवा ये सब-के-सब चिन्मय परम तत्त्वसे भिन्न नहीं हैं; ऐसी दशामें द्वैत कहाँ रहा ? परब्रह्म परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर यह सब कुछ एकमात्र शान्तस्वरूप ब्रह्म ही सिद्ध होता है । अतः ब्रह्मके सिवा जगत् आदि दूसरा कोई पदार्थ नहीं है और न दूसरी कोई भ्रान्ति ही है ।
रघुनन्दन ! वासनायुक्त जीवात्माकी भावनासे जगत् सम्पत्तिका प्रादुर्भाव होता है और वासनाशून्य जीवात्माकी ब्रह्मभावनासे संसारकी निवृत्ति होती है । जीवात्माका जो वासनारहित विशुद्ध स्पन्दन (भावना) है, उसे स्पन्दन माना ही नहीं गया है, जैसे समुद्रमें भंवर आदिके द्वारा भीतर घूमती हुई तरङ्ग स्पन्दनशील होनेपर भी स्पन्दनशून्य ही मानी जाती है । किंतु जगत्की कारणभूता जो जीवात्माकी दृश्यभावना है, उसके भीतर जो वासनारस विद्यमान है, वही अङ्कुर प्रकट करता है; अतः उसीको असङ्गरूप अग्निसे जलाकर भस्म कर देना चाहिये । मनुष्य कर्म करता हो या न करता हो; परंतु शुभाशुभ कार्योंमें वह जो मनसे डूब नहीं जाता, उसकी इस अनासक्तिको ही विद्वान् पुरुष असङ्ग मानते हैं अथवा वासनाको उखाड़ फेंकना ही असङ्ग कहा गया है । अहम्भावका त्याग करना ही संसार-सागरसे पार होना है और उसीका नाम वासनाक्षय है । इसके लिये अपने पुरुषार्थके सिवा दूसरी कोई गति नहीं है । श्रीराम ! तुम तो आत्माराम और पूर्णकाम हो ही । सारी इच्छाओंसे रहित निश्शङ्क हो समस्त कार्य करते हुए भी केवल अपने चिन्मय स्वरूपमें ही स्थित रहो । भय तुमसे सदा दूर ही रहता है । अतः अपनी सहज शान्तिके द्वारा सबके मनोऽभिराम बने रहो ।
(सर्ग २७-२८)
परमार्थ-तत्त्वका उपदेश और स्वरूपभूत परमात्मपदमें प्रतिष्ठित रहते हुए व्यवहार करते रहनेका आदेश देते हुए वसिष्ठजीका श्रीरामके प्रश्नोंका उत्तर देना तथा संसारी मनुष्योंको आत्मज्ञान एवं मोक्षके लिये प्रेरित करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--श्रीराम ! तुम आकाशके समान विशद और तत्त्वके ज्ञाता हो । एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मपदमें तुम्हारी स्थिति है । तुम सर्वत्र सम सौम्य और सम्पूर्णानन्दमय हो, तुम्हारा अन्तःकरण ब्रह्मस्वरूप एवं विशाल है । निष्पाप रघुनन्दन ! जो पुरुष अपनी इन्द्रियोंको अन्तर्मुख करके सदा ब्रह्मानन्दमें निमग्न हो आत्माराम, शान्त एवं उदार-भावसे कार्य करता है, वह जन्मजनने दोषसे रहित
५४० * अविच्छिन्नञ्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
होता है। जो समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित अपनी बुद्धिगुहा—हृदयाकाशमें विराजमान परमात्मपदमें स्वेच्छानुसार स्थित रहता है, वह अपने आत्मामें ही रमण करनेवाला परमेश्वररूप ही है। जो लोग सदा अन्तर्मुख रहकर बाहरके कार्योंका सम्पादन करते रहते हैं, उनके जीवित रहते हुए भी उनके मनमें उसी तरह वासना नहीं उत्पन्न होती, जैसे जड पत्थरोंमें वह नहीं उत्पन्न होती। जगत् न तो द्वैतरूपमें है और न अद्वैतरूपमें ही।
श्रीरामजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! यदि ऐसी बात है तो अहम्भावकी प्रतीतिरूप वसिष्ठ-नामक आप यहाँ कैसे स्थित हैं? यह बताइये।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजी आधे मुहूर्ततक चुपचाप ही बैठे रह गये। उनकी यह चेष्टा सुस्पष्ट ज्ञात हो रही थी। उनके चुप हो जाने-पर सभामें जो बड़े-बड़े लोग बैठे हुए थे, वे संशयके समुद्रमें गोते लगाने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजीने फिर पूछा—'भगवन् ! आप मेरी ही तरह चुपचाप क्यों बैठे हैं? संसारमें कोई ऐसा प्रश्न नहीं है, जिसका उत्तर आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुष न दे सकें।'
श्रीवसिष्ठजीने कहा—निष्पाप रघुनन्दन ! मुझमें कुछ कहनेकी शक्ति न होनेके कारण मेरे पास युक्तियोंका अभाव हो गया हो ऐसी बात नहीं है। परंतु यह प्रश्न जिस कोटिका है, उसमें चुप हो जाना ही इसका उत्तर है। प्रश्नकर्ता दो प्रकारके होते हैं—एक तत्त्वज्ञ और दूसरे अज्ञानी। अज्ञानी प्रश्नकर्ताको अज्ञानी बनकर ही उत्तर देना चाहिये और ज्ञानीको ज्ञानी बनकर। परम सुन्दर श्रीराम ! तत्त्वज्ञ पुरुषको उसके प्रश्नका कलङ्कयुक्त उत्तर नहीं देना चाहिये। परंतु कोई भी ऐसी वाणी नहीं है, जो निष्कलङ्क हो और तुम केवल ज्ञानी ही नहीं, परम ज्ञानी हो। अतः तुम्हारे प्रश्नका मौन ही उत्तर है। जो परमपद है, वह तत्त्वज्ञानके पूर्व इस रूपमें उपस्थित किया जाता है जिससे उसके विषयमें उपदेश वाणीकी प्रवृत्ति हो सके। अतः अज्ञानसे, ही उसको ससंकल्प वाणीका विषय बताया गया है एवं उसका कल्पित स्वरूप ही उपदेशका विषय होता है। किंतु तत्त्वज्ञानके पश्चात् जो उसका यथार्थ स्वरूप प्रकट होता है, उसे मौन अर्थात् वाणीका अविषय ही कहा गया है। इसीलिये तुम-जैसे तत्त्वज्ञशिरोमणिको मौनके रूपमें ही सुन्दर उत्तर दिया गया है। प्रिय रघुनन्दन ! वक्ता पुरुष स्वयं जैसा होता है, उसके अनुरूप ही वह उपदेश करता है। मैं ज्ञेय ब्रह्मरूप ही हूँ। अतः उस परमपदमें प्रतिष्ठित हूँ, जहाँ वाणीकी पहुँच नहीं है। जो वाणीसे अतीत पदमें प्रतिष्ठित है, वह वाणीरूप मलको कैसे ग्रहण कर सकता है। मैं मौन रहकर उस तत्त्वका प्रतिपादन कर रहा हूँ, जो अनिर्वचनीय है—जिसका वाणीद्वारा ठीक-ठीक वर्णन हो नहीं सकता, क्योंकि वाणी संकल्परूप कलङ्कसे युक्त होती है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! वाणीमें जो-जो दोष आते हैं, उनका आदर न करके विधिरूपसे और निषेधरूपसे यह बताइये कि वास्तवमें आप कौन हैं?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! यदि तुम मुझसे मेरे स्वरूपका परिचय सुनना चाहते हो तो इस विषयको यथावत् सुनो। 'तुम कौन हो,' 'मैं कौन हूँ' और 'यह जगत् क्या है' इसका विवेचन किया जा रहा है। तात ! यह जो निर्विकार अनन्त चिन्मय परमात्मा है, वही मैं हूँ। इसमे बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंका सर्वथा अभाव है तथा यह समस्त कल्पनाओंसे परे है। मैं निर्मल अनन्त चेतन हूँ, तुम अनन्त चेतन हो, सारा जगत् अनन्त चेतन है और सब कुछ अनन्त चेतनमात्र ही है। विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्मामें मैं विशुद्ध
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * परमार्थ-तत्त्वका उपदेश * ५४१
ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही हूँ। मुझमें भेदज्ञानकी दृष्टि है ही नहीं। अतः मैं किसी भी वस्तुको अपनेसे भिन्न कहना नहीं जानता । जीवित रहकर व्यवहारपरायण होता हुआ भी जो परम शान्त है, उस ज्ञानी पुरुषकी जो मुर्देके समान स्थिति है, उसीको परमपद कहते हैं। जो बाहर- भीतरके साधनोंसे रहित, शान्त, अनन्त, साधनरूप और सम है, जिसे न सुख कहा जा सकता है न दुःख, जो 'अहं' भी नहीं है तथा 'यत्र नान्यत् पश्यति' इत्यादि श्रुतिके द्वारा जिसके स्वरूपका निर्देश कराया गया है, वह कल्याणस्वरूप तत्त्व ही परम पद है। उसे मैं अपनेसे भिन्न नहीं समझता। वस्तुतः उसे दूसरा कोई नहीं जानता। लोकैषणासे विरक्त ज्ञानी पुरुषके द्वारा आत्मामें ज्ञातापनकी भाँति उसका स्वयं ही अनुभव किया जाता है। उस परम पद- में न अहंता (मैं-पन) है न त्वत्ता (तू-पना), न अहंताका अभाव है और न अन्यता ही। वह केवल निर्वाणस्वरूप विशुद्ध कल्याणमय कैवल्य ही है। इस चेतन जीवात्माका चेत्य विषयोंकी ओर उन्मुख होना ही चित्तरूपता है, यही इसका संसार है और यही महान् कष्ट देनेवाला बन्धन है। चेतन जीवात्माका चेत्य विषयोंकी ओर उन्मुख न होना ही अचेत्यरूपता है। इसीको मोक्ष समझो। यही शान्त एवं अविनाशी परमपद है। जो दिशा और देश-काल आदिकी सीमासे बँधा हुआ नहीं है, वह शान्तस्वरूप शान्तात्मा परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान है, उसमें चेत्य (दृश्य) की सम्भावना ही नहीं है। फिर कौन, किसका और किस प्रकार चिन्तन करता है ? ये जो मन-बुद्धि आदि हैं, ये सब अन्तर्मुख दशामें चैतन्यरूप ही हैं। मन-बुद्धि आदि शब्दोंके अर्थरूपसे भावित होनेपर वे ही जडरूप मानी गयी हैं। समस्त दृश्योंका बाध हो जानेपर जो विशुद्ध चैतन्यस्वरूप परमात्मा अवशिष्ट रह जाता है, उसमें और शून्य आकाशमें क्या अन्तर है—इसे साधारण लोग नहीं जानते—विद्वान् ज्ञानी पुरुष ही जानते हैं। उनका कहना है, कि वह परमात्मा चिन्मय और निरतिशयानन्दस्वरूप है, इसलिये वाणीका विषय नहीं होता। जैसे अन्धकारमें देखनेका प्रयत्न करनेसे नेत्रोंमें कुछ सद्सद्रूप आभास दीखता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें जो आभास परिलक्षित होता है, वही यह जगत् है। 'मैं अज्ञानी हूँ' इस रूप- में जो जीवोंको अपने अज्ञानका बोध होता है, उससे सुरक्षित अज्ञानरूपी वायुका सहारा पाकर उनकी अविद्याग्नि प्रज्वलित होती रहती है। फिर जब उन्हें 'मैं ब्रह्म हूँ' यह यथार्थ बोध होता है, तब वही वायु उस अविद्याग्निको दुर्बल पाकर बुझा देती है।
अनावृत स्वप्रकाश निरतिशयानन्दरूपसे स्थित हुए तत्त्वज्ञानी पुरुषोंकी संसारके भानसे रहित तथा दुःखरूप क्षोभसे शून्य जो स्थिति है, उसीको मोक्ष कहते हैं और वही अविनाशी पद है। परमात्मज्ञानके साथ सांसारिक पदार्थोंके ज्ञानसे युक्त हो मनुष्य मुनि बन जाता है। परंतु जो परमात्माके अज्ञानके साथ-साथ सांसारिक पदार्थों- के ज्ञानसे शून्य होता है, वह पशु एवं वृक्ष बन जाता है। जैसे सुषुप्तावस्थामें स्वप्नका लय हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर उस तत्त्वज्ञके समाहित अन्तःकरणके भीतर सारे दृश्य-प्रपञ्चका लय हो जाता है। फिर तो केवल अपना परमात्मस्वरूप ही लक्षित होता है। जैसे आकाशमें नीलिमाकी प्रतीति भ्रममात्र ही है, उसी प्रकार कल्याणस्वरूप परमात्मामें पृथ्वी आदि पाञ्चभौतिक जगत्की प्रतीति भ्रमके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जैसे आकाश नील आदि वर्णोंसे रहित निर्मल है, उसी प्रकार शिवस्वरूप परमात्मा भी दृश्य-प्रपञ्चसे रहित एवं निर्मल है। जिस पुरुषकी बुद्धिमें यह निश्चय हो गया है कि यह सारा दृश्य-प्रपञ्च असत् (मिथ्या) ही है, वह समस्त विशुद्ध वासनाओं- से युक्त होनेपर भी उन वासनाओंसे रहित ही है। सर्वव्यापी शुद्ध-बुद्ध परमात्मामें कर्तृत्व और भोक्तृत्वका
५४२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
होना असम्भव है; इसलिये यहाँ न दुःख है न सुख, न पुण्य है न पाप और न किसीका कुछ नष्ट ही हुआ है । जिस अहंकारमें यह ममताबुद्धि होती है, वह भी दो चन्द्रमा और स्वप्नके नगरकी भाँति असत् (मिथ्या) ही है; इसलिये सब कुछ निराकार एव निराधार है। समस्त द्वैतसे रहित तत्त्वज्ञ पुरुष व्यवहारपरायण हो अथवा काष्ठ या पाषाणके समान निश्चल होकर चुपचाप बैठा रहे, सभी अवस्थाओंमें वह ब्रह्मस्वरूपताको ही प्राप्त है। रघुनन्दन ! जो ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंद्वारा पूर्णरूपसे सेवित है, जिसे दूसरा कोई छीन नहीं सकता तथा जो ज्ञानस्वरूप, निर्मल, शिव, अजन्मा, अविनाशी, नित्य- सिद्ध, सम, परमार्थ सत्य तथा शान्त ब्रह्मपद है, वही तुम हो । तुम उस परमपदमें नित्य प्रतिष्ठित हो ।
अहंभावना ही सबसे बड़ी अविद्या है, जो मोक्षकी प्राप्तिमे रुकावट डालनेवाली होती है । मूढ़ मनुष्य उस अविद्याके द्वारा ही जो मोक्षका अन्वेषण करते हैं, वह उनकी पागलोंकी-सी चेष्टा है। अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाली अहंता ही अज्ञानकी सत्ताका पूर्ण परिचय देनेवाली है; क्योंकि जो तत्त्वज्ञानी शान्त पुरुष है, उसमें ममता या अहन्ता नहीं रहती । अहंताका भलीभाँति त्याग करके आकाशकी भाँति निर्मल तथा मुक्त हुआ ज्ञानी पुरुष सदाके लिये निश्चिन्त हो जाता है; उसका शरीर रहे या न रहे; उसकी उपर्युक्त स्थितिमें कोई अन्तर नहीं आता । जो तत्त्ववेत्ता पुरुष भीतरकी मानसिक तरङ्गोंसे कभी क्षुब्ध नहीं होता, बाहरसे भी अस्तगत सूर्यकी भाँति शान्त रहता है और जिसे सदा प्रसन्नता बनी रहती है, वह मुक्त कहलाता है। इष्ट और अनिष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होनेपर भी वह सदा शान्त बना रहता है—हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होता । व्यवहारमें संलग्न रहनेपर भी द्वैतभावका अनुभव नहीं करता तथा भीतरसे पूर्ण परमानन्दमें निमग्न रहता है । जैसे समुद्रमें जलरूप आधारकी सत्ता ही नावों या जहाजोंको क्रय-विक्रयकी वस्तुओका दुःखद भार वहन करनेके लिये अवसर देती है, उसी प्रकार जीव और जगत्की जड सत्ता ही तृष्णाके पाशमें बँधे हुए मनुष्योंको इस जगत्में केवल दुःखका भार वहन करनेके लिये प्रेरित करती है । जो-जो वस्तु संकल्पसे प्राप्त होती है, वह संकल्पसे ही नष्ट भी हो जाती है । इसलिये जहाँ इस संकल्पकी सम्भावना ही नहीं है, वही सत्य एवं अविनाशी पद है । विचार करनेसे जिन पुरुषोंके सम्पूर्ण विशेष (भेदभाव) शान्त हो चुके हैं, उनके लिये केवल अहंताका नाश करनेवाली मुक्तिका उदय होता है । उनका कुछ बिगड़ता नहीं । अज्ञानी पुरुषो ! मोक्षकी प्राप्तिके लिये भोगोंके त्याग, विवेक-विचार तथा मन और इन्द्रियोंके निग्रहरूप पुरुषार्थ—इन तीनके सिवा चौथी किसी वस्तुका उपयोग नहीं है । अतः अनात्मवस्तुका त्याग करके तुमलोग शीघ्र अपने आत्माकी ही शरणमें आ जाओ ।
(सर्ग २९-३०)
निर्वाणकी स्थितिका तथा 'मोक्ष स्वाधीन है' इस विषयका सयुक्तिक वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! ब्रह्मके अतिरिक्त न नाश है न अस्तित्व, न अनर्थ है न जन्म- मृत्यु, न आकाश है न शून्यता और न नानात्व ही है । अर्थात् सब कुछ ब्रह्म ही है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं । जैसे मिथ्या अवभासित होनेवाले संकल्पनगरका नाश किसी प्रकार सम्भव नहीं—क्योंकि वह तो मिथ्या है ही, फिर उसका विनाश कैसा, उसी तरह जगत् और अहंकार आदि भी असत् हैं, अतः उनके लिये 'नाश' शब्दका प्रयोग नहीं होता; क्योंकि असत् वस्तु स्वयं ही विद्यमान नहीं रहती । स्वप्नपुरुषकी भाँति जिन
निर्वाण-प्रकरण उ०] * निर्वाणकी स्थितिका तथा 'मोक्ष स्वाधीन है' इस विषयका वर्णन * ५२३
अज्ञानियोंकी दृष्टिमें यह संसार विद्यमान है, वे पुरुष तथा वह सृष्टि—सब-के-सब मृगतृष्णाकी जलतरङ्गके समान मिथ्या ही हैं। यही कारण है कि जो लोग असत्पदार्थोंको ही सत्-सा मानते हैं, उनकी उस मान्यताको हमलोग वन्ध्यापुत्रकी वाणीकी तरह निर्णयात्मक नहीं समझते। इसीलिये जलसे परिपूर्ण महासागरकी तरह तत्त्वज्ञानियोंकी पूर्णता कोई अपूर्व ही होती है—वे सदा चिदानन्दसे परिपूर्ण रहते हैं; क्योंकि वे द्रष्टा और दृश्यांशके फेरमें नहीं पड़ते। वे व्यवहारयुक्त हों अथवा व्यवहारशून्य—किसी भी अवस्थामें पर्वतकी भाँति निश्चल और वायुशून्य स्थानमें रखे हुए समप्रकाशयुक्त दीपककी तरह एकरस रहते हुए सदा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं।
श्रीराम ! अज्ञानी पुरुष तो इस जगत्में वासनारूप ही हैं और वह वासना तत्त्वदृष्टिसे विचार करनेपर ठहरती नहीं; परन्तु कोई भी उस वासनाके असली स्वरूपपर विचार नहीं करता, इसी कारण यह संसार उपस्थित हुआ है। वास्तवमें तो जिस पुरुषको इस संसारका भ्रम है, वह असत् ही है और असत् पदार्थ तत्त्वदृष्टिसे देखनेपर मृगतृष्णाके जलकी भाँति लक्षित होता नहीं; फिर किसीके लिये भी कौन-सा संसार कहाँसे आ गया। 'यह सारा दृश्य जगत् सद्ब्रह्म ही है' ऐसा स्पष्ट ज्ञान हो जानेपर कल्याणमय ब्रह्मरूपका उदय होता है। जिसे परम पदमें विश्राम प्राप्त हो चुका है, ऐसे समदर्शी—तत्त्वज्ञानीके आचरणमें शान्तरूपता अथवा राग-द्वेषशून्य व्यवहार दोनों परिलक्षित होते हैं। अथवा जो निर्वाणरूप सप्तम भूमिकामें पहुँच चुका है, उस ज्ञानीकी शान्तरूपता ही अवशेष रह जाती है; क्योंकि वह तो वासनारहित मुनि हो जाता है, फिर वह व्यवहार कैसे कर सकता है। परन्तु जबतक उस ज्ञानीका निर्वाण (सप्तम भूमिकाकी प्राप्ति) सुदृढ़ नहीं हो जाता, तबतक वह राग-द्वेष और भय आदिसे रहित हो व्यवहार करता है। तथा सप्तम भूमिकामें सुदृढ़ रूपसे स्थित हुए ज्ञानीका मन शान्त हो जाता है। उसके राग-द्वेष, भय, क्रोध आदि विकार सर्वथा नष्ट हो जाते हैं तथा वह मुनि होकर शिष्य न होते हुए भी शिलाकी तरह सदा निश्चलरूपसे स्थित रहता है।
राघव ! आत्मा ही बाह्यताकी भावना करनेसे बाह्य और आत्मत्वकी भावना करनेसे आत्मरूप होता है, इसलिये परब्रह्म-तत्त्वमें तत्-तत् भावना ही उसके बाह्य और अन्तर होनेमें कारण है। अन्तःकरणमें जो जाग्रत्-स्वप्नादिकी विभ्रान्ति है, वही बाह्यता कही जाती है। वस्तुतः तो जैसे दूधको दो पात्रोंमें रख देनेसे उस दूधमें कोई भेद नहीं होता, उसी तरह स्वप्न और जाग्रत्में थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं है। उनमें जो जाग्रत्में स्थिरता और स्वप्नमें अस्थिरताकी प्रतीति होती है, वह तो केवल भ्रान्तिमात्र है। उसी तरह जाग्रत्में आधारता और स्वप्नमें आधेयता-की प्रतीति भी जल और उसकी तरङ्गकी भाँति भेदशून्य ही है। जैसे आत्म के अन्यत्वज्ञानसे स्वप्नकालके पदार्थोंमें भी अन्यताकी प्रतीति होती है और आत्मैक्यका ज्ञान हो जानेपर उस आत्मासे भिन्न कुछ नहीं दीखता, उसी तरह जाग्रत्-कालमें जबतक शुद्ध आत्मतत्त्वका ज्ञान नहीं हो जाता, तभीतक पदार्थोंमें अन्यरूपता प्रतीत होती है। आत्मतत्त्वका बोध हो जानेपर तो सभी एकरूप-से ही दीखते हैं। परमात्माका जो कल्पनाओंसे रहित तथा शान्त रूप है, उसकी जिस जिस रूपमें भावना की जाती है, वह उसी रूपमें परिणत हो जाता है। स्वप्नादिके ज्ञानके भलीभाँति शान्त हो जानेपर परमात्माका जो शुद्ध रूप अवशिष्ट रहता है, उसे 'यह है' न तो ऐसा ही कह सकते हैं और न 'यह नहीं है' ऐसा ही कह सकते हैं; अतः वह वाणीका विषय नहीं है।
सं० यो० व० अं० १९—
५५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वत्स राम ! चित्तिका जो बाह्य पदार्थोंकी ओर प्रसरण है, वह तो (अज्ञानयुक्त) अनुभवसे ही सिद्ध है। जब विद्यासे उस अनुभवका बाध हो जाता है, तब पुरुषको असत् पदार्थका अनुभव नहीं होता। उस समय उसके अनुभवमें यह बात आती है कि जैसे बालक असत्य प्रेतका अनुभव करता है, वैसे ही मैं भी व्यर्थ ही अबतक असत् पदार्थका अनुभव करता रहा। जब अपने अंदर 'यह मैं हूँ' ऐसा अनुभव होने लगता है, तब वह अहंभाव भी दुःख ( बन्धन ) का ही कारण होता है और जब अहंकारका अनुभव नहीं होता, तब वह मुक्तिका कारण बन जाता है; अतः बन्धन और मुक्ति तो अपने ही अधीन हैं। श्रीराम ! जिस पुरुषकी वासना सुदृढ हो गयी है, वह जैसे संकल्पद्वारा रचित रूपालोक और मानसिक व्याधियोंका अनुभव करता है, उसी तरह असत् दुःखका भी खमद्रष्टाकी तरह आश्रय ग्रहण करता है; परंतु जिसकी वासनाएँ क्षीण हो गयी हैं, उसे जैसे संकल्प-शून्य रूपालोक और मानसिक व्याधियोंका अनुभव नहीं होता, वैसे ही वह प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए दुःखका भी सोये हुए पुरुषकी भाँति उपभोग नहीं करता। इसलिये जैसे देश, काल और क्रियाके सम्पर्कसे पदार्थोंमें उत्पन्न हुई भावना पदार्थरूपताको प्राप्त होती है, वैसे ही वासना ही अत्यन्त सूक्ष्म होकर मुक्तिमें कारण होती है। जैसे आकाशमें उत्पन्न होनेवाले मेघ और कुहरा आदि अत्यन्त सूक्ष्म हो जानेसे उसी आकाशके रूपमें परिणत हो जाते हैं, वैसे ही वासना अत्यन्त सूक्ष्म होकर मुक्तिके स्वरूपमें परिणत हो जाती है।
आत्मामें जो यह जगत् आदि भासित होता है, वह 'मैं कौन हूँ?' और 'यह कैसे उत्पन्न हुआ?' इस प्रकारके विचारसे ही शान्त हो जाता है। 'जब अहंताकी सत्ताका अभाव ही मोक्ष है, तब इतनेको ही लेकर मूढ़ताका आश्रय क्यों ग्रहण किया जाय ?' ऐसा ज्ञान सत्सङ्ग और विचारसे शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। जैसे प्रकाशसे अन्धकारका और दिनसे रात्रिका विनाश हो जाता है, वैसे ही तत्त्वज्ञानीके सङ्गसे अहंता-रूपी बन्धन नष्ट हो जाता है।
रघुनन्दन ! जैसे आकाशमें चाहे जितने घने बादल छा जायें और महासागरमें तरङ्ग उठने लगें, किंतु उनसे आकाश तथा महासागरमें किसी प्रकारकी हानि अथवा वृद्धि नहीं होती, उसी प्रकार सम्पूर्ण संकल्पोंसे रहित ज्ञानीको इष्ट-अनिष्टकी प्राप्तिमें कुछ भी लाभ-हानिका अनुभव नहीं होता। समस्त विकारोंसे शून्य एवं परिपूर्ण-स्वरूप शान्त ब्रह्मका विचार कर लेनेपर—परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर यह सारा जगत्-प्रपञ्च मृगतृष्णाके जलकी भाँति असत् सिद्ध हो जाता है। उस समय अहंताका भी विनाश हो जाता है; तब भला, उस ज्ञानीको संसारके मनन आदिका भ्रम कहाँ, कैसे और किस कारणसे हो सकता है। ( सर्ग ३१-३२ )
जीवकी बहिर्मुखताके निवारणसे भ्रान्तिकल्पनाके निवर्तक उपाय तथा परलोककी चिकित्साका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! यदि सत्पुरुषोंके समागससे विकासको प्राप्त हुई अपनी बुद्धिरूप पुरुषार्थके द्वारा पुरुषको तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई तो फिर उसके अतिरिक्त उसकी प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है। एकमात्र अहंताको छोड़कर दूसरी कोई अविद्या है ही नहीं। उसकी भावना न करनेसे जब उस अहंताका शमन हो जाता है, तब दूसरा कोई मोक्ष पाना शेष नहीं रह जाता अर्थात् अहंताका नाश ही मोक्ष है। पत्थरके सदृश निश्चल वृत्तिवाले जिस पुरुषके लिये यह साग जगत् असत् होता हुआ भी सत्की तरह शान्त हो गया
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * भ्रान्तिसल्पनाके निवर्तक उपाय तथा परलोकरूपी चिकित्सा * ५४२
है, उस महात्माको नमस्कार है । जिसका चित्त परब्रह्ममें पूर्णतया लीन हो गया है, उसे पत्थरके सदृश बाहरका ज्ञान नहीं होता और भीतर चितिरूपताकी भावनासे उसकी संकल्प-शून्य-सी अवस्था हो जाती है, जिससे उसके लिये यह सारा दृश्य-प्रपञ्च शान्त हो जाता है ।
श्रीराम ! प्राणियोंके लिये दो व्याधियाँ बड़ी भयंकर हैं—एक तो यह लोक और दूसरा परलोक । क्योंकि इन्हीं दोनोंसे पीड़ित होकर सभी प्राणी भीषण दुःख भोगते हैं । इनमें जो अज्ञानी जीव हैं, वे इस लोकमें व्याधिग्रस्त होनेपर उसके निवारणके लिये भोग-रूपी कुत्सित औषधोंद्वारा जीवनपर्यन्त यथाशक्ति प्रयत्न करते हैं; परंतु परलोकरूपी व्याधिके लिये वे कुछ भी चिकित्सा नहीं करते । तथा जो उत्तम पुरुष हैं, वे परलोकरूपी महाव्याधिकी चिकित्साके लिये अमृत-तुल्य शम, सत्सङ्ग और आत्मविचाररूप उपायोंद्वारा प्रयत्न करते हैं । जो लोग परलोकरूपी व्याधिकी चिकित्साके लिये सदा सावधान रहते हैं, वे मोक्षमार्गकी उत्कट इच्छा उत्पन्न होनेपर अपनी शम-शक्तिद्वारा विजयी होते हैं । जो पुरुष इस लोकमें ही नरकरूपी व्याधिकी चिकित्सा नहीं कर लेता, वह रोगग्रस्त होकर औषधरहित स्थान (नरक) में जाकर फिर क्या करेगा । इसलिये अज्ञानियो ! तुमलोग इहलोककी चिकित्सा में ही अपने जीवनको मत गँवा दो । इसीके साथ-साथ आत्मज्ञानरूपी औषधोंद्वारा परलोककी भी चिकित्सा कर लो । अरे ! यह आयु तो वायुके वेगसे हिलते हुए पत्तेके ऊपर पड़े हुए छोटे-से जल-कणके समान क्षणभङ्गुर है, अतः पूर्ण प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही परलोकरूपी महाव्याधिकी चिकित्सा में जुट जाओ; क्योंकि शीघ्र ही यत्नपूर्वक परलोकरूपी महा-व्याधिकी चिकित्सा कर लेनेपर इस लोककी व्याधि तत्काल ही अपने-आप नष्ट हो जाती है ।
राघव ! जितने जन्तु हैं, वे सभी संवित्मात्र (आत्माके ही स्वरूप) हैं और उस संवित्के संकल्पका जो विस्तार है, वही जगत् है। ऐसा यह सारा जगत् एक छोटे-से परमाणुके भीतर सैकड़ों पर्वतोंके विस्तारसहित विद्यमान है । आत्मचितिका जो प्रसरण है, वह बाह्य तथा आन्तर विषय है । उन विषयोंका विस्तार चेतन-आकाशमें ही अनुभव होता है, इसलिये जगत्का भ्रम कभी सत्य नहीं हो सकता । यदि मनुष्य अपने पुरुषार्थके चमत्कार-से भोगरूपी कीचड़के समुद्रमें फँसे हुए अपने आत्माका उद्धार नहीं कर लेता तो फिर उसके उद्धारका दूसरा कोई उपाय नहीं है । जो मनुष्य अपने आत्माको काबूमें नहीं कर सका है, अतएव विषयभोगरूपी दलदलमें फँसा है, वही मूढ़ सम्पूर्ण आपत्तियोंका पात्र है। जैसे बाल्यावस्था जीवनकी प्रथम सीढ़ी मानी जाती है, वैसे ही भोगोंका सर्वथा त्याग, जो रागोंसे शान्ति प्रदान करनेवाला है, मोक्षका प्रथम सोपान है; परंतु जो अज्ञानी हैं, उनकी जीवन-रूपी नदियाँ करुण-क्रन्दनोंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त भयावनी होती हैं । उनमें रागवृत्तियोंसे उत्पन्न अनेक प्रकारके विक्षोभरूपी कल्लोल साथ-साथ बहनेवाली भँवरियाँ हैं । जैसे अज्ञानसे दो चन्द्रमा, बाल-वेताल, मृगतृष्णाका जल और स्वप्न-संसार—ये सभी प्रकट होते हैं, वैसे ही अज्ञानियोंके लिये जीवकी बहिर्मुखताके कारण अनेक प्रकारके सर्ग उत्पन्न होते रहते हैं। संवित्की बहिर्मुखताके भ्रमसे आकाश-मण्डलमें (गन्धर्व-नगर आदि) बहुत-से जगत् सत्-से अनुभूत होने लगते हैं; परंतु विचार करनेपर वे सत्य नहीं ठहरते । संवित्का निर्वाण—बहिर्मुखताका न होना जगत्का क्षय है और संवित्का उन्मीलन जगत् है । वास्तवमें तो न कुछ अंदर है न बाहर, जो कुछ है वह सर्वानन्द ब्रह्म ही है ।
| ५४६ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त-योगवासिष्ठ |
|---|
चिद्रूप, अजन्मा, अव्यक्त, एक, अविनाशी, ईश्वर, खत्व और भावत्वसे रहित ब्रह्म ही सर्वत्र व्याप्त है। वह आकाशसे भी अत्यन्त शान्त है। जैसे आत्मामें स्वप्नका अनुभव भ्रान्ति है, वैसे ही ब्रह्मरूपी समुद्रमें अविद्या-जनित संसाररूपी तरङ्गें भी भ्रान्तिरूप ही हैं। वास्तवमें तो परमात्मामें न स्वप्न है न सृष्टि ही है। ब्रह्म एक ही है, उसमें न तो कोई आभास है, न चित्स्वरूप कोई दूसरा धर्म है और न जड़ता है। वह न सत् है, न असत् है; बल्कि वह सत्-असत्से विलक्षण सम, अविनाशी और द्वैतभावसे रहित है। पूर्वोक्त स्थितिके अनुसार आचरण करनेवाले जिस सत्पुरुषको यथार्थ आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया है, उसे मुनियोंमें श्रेष्ठ कहा जाता है। जैसे संकल्प-जनित नगरकी सृष्टि पुनः उसका संकल्प न करनेसे नष्ट हो जाती है, वैसे ही विषयानुभवसे उत्पन्न अहंकाररूप जगत् पुनः अनुभव न करनेसे चिद्ब्रह्ममें लीन हो जाता है। वास्तवमें तो यहाँ किसी भी पदार्थका कोई स्वभाव है ही नहीं। ये जितनी अनुभूतियाँ हैं, ये सभी महाचितिरूप जलकी द्रवरूपता हैं। वे ही अनुभूतियाँ महाचेतनरूपी वायुके स्पन्दन हैं तथा इन्हींको ब्रह्मरूपी आकाशकी शून्यता भी जानना चाहिये। जैसे वायु और उसका स्पन्दन—दोनों अभिन्न हैं, वैसे ही ब्रह्म और उसकी सृष्टिमें भी कोई भेद नहीं है। परंतु अपने स्वरूपकी भ्रान्ति हो जानेपर उनमें विभिन्नता प्रतीत होती है, यद्यपि वह स्वप्नमें देखी गयी अपनी मृत्युके समान असत्य है। जबतक ब्रह्मविचार स्पष्ट नहीं हो जाता, तभीतक यह भ्रान्ति रहती है; परंतु विचार स्पष्ट होते ही वह भ्रान्ति ब्रह्मरूपताको प्राप्त हो जाती है।
(सर्ग ३३)
जगत्के स्वरूपका विवेचन और ब्रह्मके स्वरूपका सविस्तर वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! तुम ऐसा समझो कि सुखके प्राप्त होनेपर दुःखका और दुःखके प्राप्त होनेपर सुखका नाश हो जाता है; अतः ये दोनों ही नाशवान् हैं और जिसका नाश नहीं होता, वह अविनाशी आत्मा है। बस, अब इस विषयमें विशेष शास्त्रोपदेश करना व्यर्थ है। जिसके मनमें इच्छाओंकी परम्परा बनी हुई है, उसे सुख-दुःखादि अवश्य ही प्राप्त होते रहते हैं। इसलिये यदि उन सुखादि रोगोंकी भलीभाँति चिकित्सा करना अभिप्रेत है तो पहले इच्छाका ही परित्याग करना चाहिये। परमपदरूप परमात्मामें अहंकार और इस जगत्की भ्रान्ति है ही नहीं। वह तो शान्त, निरालम्ब, सर्वात्मक, अविनाशी मोक्षरूप है। वास्तवमें तो न अहं है, न जगत् है; क्योंकि जो शान्त और अद्वितीय है, वह तो सर्वात्मकरूप है। ऐसी दशामें उसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व कैसे और कहाँसे सम्भव हो सकते हैं। ज्ञान भी आत्मस्वरूप ही है, अतः जो कुछ दीखता है, वह सब तद्रूप ही है। इसलिये अहंकारसहित सारा जगत् परमात्मासे अभिन्न है। एक आत्मा ही जब अज्ञानके कारण अनेकरूपताको प्राप्त हुआ-सा दीखता है, तब वही संसार कहलाता है और वह संसार स्वयं असत् है, इसी कारण तत्त्वदृष्टिसे विचार करनेपर उसकी सत्ता उपलब्ध नहीं होती। जैसे प्रवहणशील होनेके कारण सागर तरङ्गोंके रूपमें प्रतीत होता है, उसी तरह चिद्रूप होनेके कारण यह ब्रह्म ही अपनी सत्तासे निर्मल जगत्के रूपमें विकसित हुआ-सा जान पड़ता है। जैसे मेघाच्छादित आकाशमें वृक्ष, हाथी, घोड़े और मृग आदिका आकार परिलक्षित होता है, वैसे ही अवयव एवं आकाररहित परब्रह्ममें सृष्टि और अहंकारका रूप दीख पड़ता है। यह सारा जगत् परब्रह्ममें उसका अवयव-सा प्रतीत होता है। रामभद्र ! उसकी उपमा यों समझो—जैसे वटवृक्ष और
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * जगत्के स्वरूपका विवेचन और ब्रह्मके स्वरूपका सविस्तर वर्णन * ५९३
उसके बीजमें कार्य-कारणभाव है, वैसी ही कार्य-कारणता जगत् और ब्रह्ममें है। वस्तुतः तो न तुमलोग हो, न हमलोग हैं, न ये जगत् हैं और न आकाश आदि ही हैं; बल्कि सर्वोपद्रवशून्य अपरोक्ष ब्रह्म ही सर्वत्र अशेषरूपसे वर्तमान है।
रघुकुलतिलक ! जैसे वायु और स्पन्दनमें भेद-प्रतीति होती है, वैसे ही अद्वितीय ब्रह्म और जीवात्मामें भी अज्ञानसे भेद प्रतीत होता है; अतः इस विषयमें ऐसा समझना चाहिये कि चित् और अचित्का भेददर्शन ही संसार है तथा अद्वितीय ब्रह्म और जीवात्माकी एकता ही मोक्ष है। इस प्रकार यह सारा जगत् निर्विकार परब्रह्ममय है, अतः इसे भी निर्विकार, आदि- अन्तरहित और निरामय ही समझो। संकल्पजनित नगरके समान द्वैताद्वैत-विकाररूप यह जगत् जीवके अपने ही संकल्पसे उत्पन्न होता है और अपने ही संकल्पसे नष्ट भी हो जाता है। वस्तुतः इस जगत्-रूप ब्रह्ममें कुछ भी उत्पन्न नहीं होता—ठीक वैसे ही, जैसे जलकी तरङ्गका उठना वास्तवमें उत्पन्न होना नहीं है और उसका नष्ट होना वास्तवमें नाश नहीं है; क्योंकि दोनों अवस्थाओंमें वह एकमात्र जल ही है।
रघुनन्दन ! क्षणमात्रमें ही एक देशसे दूसरे अत्यन्त दूर देशमें प्राप्त हुए संवित् (ज्ञान) का उन दोनों देशोंके मध्यमें जो निर्मल रूप होता है, वही परब्रह्म परमात्माका सर्वोत्कृष्ट रूप है। जीवन्मुक्तोंकी स्थिति तथा आचारके अनुसार व्यवहार करते हुए उस निराभास, सत्य तथा वासना और इच्छासे रहित चित्स्वरूपसे सुमेरु- गिरिकी तरह कभी चलायमान न होना ही विद्या है तथा भलीभाँति विवेक-विचारपूर्वक अन्वेषण करनेपर जिसकी उपलब्धि नहीं होती, वही अविद्या है। अविद्याका अभाव हो जानेपर क्या कहीं चिति और चेत्यका भेद सम्भव हो सकता है ? अर्थात् नहीं। और भेदका अभाव हो जानेपर फिर चिति अपने अंदर कैसे किसीको प्रकट कर सकेगी; इसलिये शान्ति—विषयशून्य चिन्मात्र स्थिति ही स्वतः प्रकट होती है। वास्तवमें तो ब्रह्म और जगत् एक ही हैं, अज्ञानके कारण वे अनेक-से अर्थात् विभिन्न जान पड़ते हैं। अज्ञानसे ही सर्वव्यापी, परिपूर्ण तथा शुद्ध ब्रह्म अपूर्ण एवं अशुद्ध-सा प्रतीत होता है। वही ब्रह्म अज्ञानसे निर्विकार होते हुए विकारयुक्त, शान्त एवं समरूप होते हुए अशान्त एवं विषम, सत् होते हुए अदृश्य होनेके कारण असत्, तद्रूप होते हुए अनद्रूप, विभाग- रहित होते हुए विभागवाला, जडतारहित होते हुए जडतायुक्त, निर्विषय होते हुए विषयी, अवयवशून्य होते हुए सावयव, स्वप्रकाश होते हुए घनान्धकार और पुरातन होते हुए नूतनके समान प्रतीत होता है। वह परमाणुसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होकर जगत्-समूहोंको अपने उदरमें समेट लेनेवाला है।
वत्स राम ! वह अनन्त और अपार होकर भी किसी एक स्थानपर नियतरूपसे स्थित नहीं रहता तथा आकाश- में भी वनकी कल्पना और पर्वतका निर्माण करनेमें तत्पर रहता है। (अर्थात् असम्भवको भी सम्भव कर सकता है।) वह सूक्ष्म पदार्थोंमें सबसे सूक्ष्म, स्थूलोंमें सबसे स्थूल, गरिष्ठोंमें सबसे अधिक गरिष्ठ और श्रेष्ठोंमें सबसे बढ़कर श्रेष्ठ है तथा कर्ता, कर्म और कारणसे रहित है। वह जगत्का उद्गमस्थान होकर भी नित्य अरण्यकी भाँति शून्य है और असंख्य पर्वतोंकी कठोरतासे युक्त होनेपर भी आकाशके लवांशसे भी कोमल है। वह प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक कालस्वरूप होकर प्रायः सबसे परे, प्राचीन होनेपर भी कोमल और नवीन, प्रकाशस्वरूप होकर भी अन्धकारके सदृश मलिन और प्रलयकालीन तमस्वरूप होकर भी प्रकाशरूपसे सर्वत्र व्याप्त है। वह प्रत्यक्ष होते हुए भी आँखोंकी पहुँचके बाहर, परोक्ष होते हुए भी सम्मुख उपस्थित, चिद्रूप होते हुए भी जड और जड होते हुए भी चिद्रूप है। वह ब्रह्म अनहंभावरूप होकर अहम्भाव ही
| ५४८ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
|---|
अहंभावरूप होकर अनहंभाव तथा अन्यरूप होकर आत्मरूप और आत्मरूप होकर अन्यरूप-सा स्थित है। इस चिद्रूपी परिपूर्ण सागरके भीतर ये त्रिभुवनरूपी तरंगें, द्रवता ही जिनका स्वभाव है, स्फुरित-सी हो रही हैं। यह चिद्रूप परमदेव यद्यपि देश-काल आदि अवयवोंसे रहित है, तथापि रात-दिन असद्रूप जगत्का वैसे ही विस्तार करता रहता है, जैसे जल तरङ्गसमूहका। इस चिद्रूपी जलकी जो द्रवता है वही जगत् कहलाता है। उस जगत्के संवित्द्वारा उपलब्ध खादिष्ट रूप, रस आदि विषय ही अङ्ग हैं और वह भुवनरूपी आवर्तोंसे युक्त है। इस उदीप्त चितिके प्रकाशित रहने-पर सम्पूर्ण प्रकाशशील पदार्थोंकी श्री उसके सामने शान्त हो जाती है और पुनः उसीसे उत्पन्न भी होती है, जैसे सूर्य आदिके तेजसे उनका अपना प्रकाश। यह चिदाकाश रङ्गभूमिके समान है, इसमें नियति (ईश्वरका विधान) रूपी नर्तकी भुवन-रचनारूपी नाटकके विभ्रमोंसे युक्त होकर अनवरत कार्यमें संलग्न हो रात-दिन नाचती रहती है। इस परब्रह्म परमात्माका उन्मेष ही जगत्का सौन्दर्य है और निमेष ही प्रलयका सूचक है। वास्तवमें तो वह उन्मेष और निमेषसे रहित होकर अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है।
(सर्ग ३४-३५)
जीवन्मुक्तिकी प्रशंसा तथा 'इच्छा ही बन्धन है और इच्छाका त्याग ही मुक्ति है' इसका सविस्तर वर्णन और उससे छूटनेके उपायका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम! जितने अनर्थस्वरूप सांसारिक पदार्थ हैं, वे सभी जलमें आवर्तकी भाँति भिन्न-भिन्न रूप धारण करके चमत्कार पैदा करते हैं अर्थात् इच्छाओंको उत्पन्न करके चित्तको मोहमें डाल देते हैं; परंतु जैसे सभी लहरें जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही सम्पूर्ण पदार्थ वस्तुतः नश्वर स्वभावके ही हैं। जैसे बालककी चिन्तासे कल्पित यक्ष-पिशाच आदिका रूप उसके सामने आकाशमें दीख पड़ता है; परंतु मुझ-जैसे ज्ञानीके लिये वह कुछ भी नहीं है, उसी तरह मेरी दृष्टिमें तत्त्वतः यह विश्व कुछ नहीं है; परंतु अज्ञानीके चित्तमें यही सत्य-सा प्रतीत होता है। यह विश्व पत्थरपर खुदी हुई पुतलियोंकी सेनाकी भाँति रूपावलोक तथा बाह्य और आभ्यन्तर विषयसे शून्य है, फिर इसमें विश्वता कैसी ? परंतु अज्ञानियोंके लिये यह रूपावलोक और मनन आदिसे युक्त प्रतीत होता है। श्रीराम! जगत्को जगद्रूपसे जानना भ्रम है और इसे जगद्रूपसे न जानना भ्रमशून्यता है। राघव! त्वत्ता और अहंता आदि सारे विभ्रम-विलास शान्त, शिव तथा शुद्ध ब्रह्मस्वरूप ही हैं, इसीलिये मुझे ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दिखायी पड़ता—ठीक वैसे ही जैसे आकाशमें कानन दृष्टिगोचर नहीं होता।
श्रीराम! जिसकी चेष्टा प्रारब्धप्राप्त कर्मोंमें कठपुतलीकी तरह इच्छाशून्य तथा व्याकुलतारहित होती है, वही विश्रान्त मनवाला जीवन्मुक्त मुनि है। जीवन्मुक्त ज्ञानीको इस जगत्का जीवन बाँसकी तरह बाहर-भीतरसे शून्य, रसहीन और वासनारहित प्रतीत होता है। जिसकी इस दृश्य-प्रपञ्चमें रुचि नहीं है और हृदयमें जिसे चिन्मात्र अदृश्य ब्रह्म ही अच्छा लगता है, उसने मानो बाहर-भीतरसे शान्ति प्राप्त कर ली और वह इस भवसागरसे पार हो गया।
रघुनन्दन! शास्त्रज्ञोंका कहना है कि मनका इच्छारहित हो जाना ही समाधि है; क्योंकि मनको जैसी शान्ति इच्छाका त्याग कर देनेसे प्राप्त होती है, वैसी सैकड़ों उपदेशोंसे भी उपलब्ध नहीं होती। इच्छाकी उत्पत्तिसे जैसा दुःख प्राप्त होता है, वैसा दुःख तो नरकमें भी नहीं मिलता; और इच्छाकी शान्तिसे
३१-ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका तथा मुक्तिके विभिन्न साधनोंका वर्णन
कल्याण
शेषनागपर भगवान् विष्णु, स्वर्गमें इन्द्र और पातालमें प्रह्लाद
(उपशम-प्रकरण, सर्ग ४०)
(इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री उपलब्ध नहीं है / This page contains no readable text.)
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * जीवन्मुक्तिकी प्रशंसा तथा इच्छाके बन्धनसे छूटनेके उपायका निरूपण * ५४९
जैसा सुख मिलता है, वैसे सुखका अनुभव तो ब्रह्मलोकमें भी नहीं होता। इसीलिये समस्त शास्त्रों, तपस्याओं, धर्मों और नियमोंका पर्यवसान इतनेमें ही है कि इच्छा-मात्रको ही दुःखदायक चित्त कहते हैं और उस इच्छा-की शान्ति ही मोक्ष कहलाता है । प्राणीके हृदयमें जैसी-जैसी और जितनी-जितनी इच्छा उत्पन्न होती है, उतनी-उतनी ही उसके दुःखोंके बीजोंकी मूँठ बढ़ती जाती है तथा विवेक-विचारद्वारा जैसे-जैसे उसकी इच्छा क्षीण होती जाती है, वैसे-वैसे ही उसके दुःखोंकी चिन्तारूपी विषूचिका शान्त होती जाती है । सांसारिक विषयोंकी इच्छा आसक्तिवश ज्यों-ज्यों घनीभूत होती जाती है, त्यों-त्यों दुःखोंकी चिन्तारूपी विषैली तरङ्गें बढ़ती जाती हैं । यदि अपने पौरुष-प्रयत्नके बलसे इस इच्छा-रूपी व्याधिकी चिकित्सा न की जा सकी तो मैं यह दृढ़तापूर्वक समझता हूँ कि इस व्याधिसे छूटनेके लिये दूसरी कोई औषध है ही नहीं । यदि एक ही साथ सम्पूर्ण इच्छाओंका पूर्णतया त्याग न किया जा सके तो धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके ही उसका त्याग करना चाहिये । रहना चाहिये इच्छा-त्यागके साधनमें संलग्न ही; क्योंकि सन्मार्गका पथिक दुःखभागी नहीं होता । जो नराधम अपनी इच्छाओंके क्षीण करनेका प्रयत्न नहीं करता, वह मानो दिन-पर-दिन अपने-आपको अन्धकूपमें फेंक रहा है । इच्छा ही दुःखोंको जन्म देनेवाली इस संसृतिरूपी बेलका बीज है । यदि उसे आत्मज्ञानरूपी अग्निसे भलीभाँति जला दिया जाय तो यह पुनः अङ्कुरित नहीं होती ।
रघुकुलभूषण राम ! इच्छामात्र ही संसार है और इच्छाका अवेदन—अभाव ही निर्वाण है । इसलिये निरर्थक नाना प्रकारके उलट-फेरमें न पड़कर केवल ऐसा यत्न करना चाहिये कि इच्छा उत्पन्न ही न हो । जिसे अपनी बुद्धिसे इच्छाका विनाश करना दुस्साध्य प्रतीत होता हो, उसके लिये गुरुका उपदेश और शास्त्र आदि निश्चय ही निरर्थक हैं। जैसे अपनी जन्म-भूमि जंगलमें हरिणीकी मृत्यु निश्चित है, वैसे ही नानाविध दुःखोंका विस्तार करनेवाली इच्छारूपी विषके विकारसे युक्त इस जगत्में मनुष्योंकी मृत्यु बिल्कुल निश्चित है । यदि मनुष्य इच्छाद्वारा बालकों-जैसा मूढ़ न बना दिया जाय तो उसे आत्मज्ञानके लिये बहुत थोड़ा ही प्रयत्न करना पड़े । इसलिये सब तरहसे इच्छाको ही शान्त करना चाहिये; क्योंकि उसकी शान्तिसे परम पदकी प्राप्ति होती है । इच्छारहित हो जाना ही निर्वाण है और इच्छायुक्त होना ही बन्धन है; इसलिये यथाशक्ति इच्छाको जीतना चाहिये । भला, इतना करनेमें कौन-सी कठिनाई है ? जन्म, जरा और मृत्युरूप करञ्ज और खैरके वृक्ष-समूहोंका बीज इच्छा ही है, अतः उसे शमरूपी अग्निसे सदा भीतर-ही-भीतर जला डालना चाहिये । जहाँ-जहाँ इच्छाका अभाव है, वहाँ-वहाँ मुक्ति निश्चित ही है; अतः विवेक-वैराग्य आदि उपायोंकी प्राप्तिपर्यन्त अपनी शक्तिके अनुसार उत्पन्न हुई इच्छाका सर्वथा विनाश कर डालना चाहिये । इसी तरह जहाँ-जहाँ इच्छाका सम्बन्ध है, वहाँ-वहाँ पुण्य-पापरूपी दुःखराशियों तथा विस्तृत पीड़ाओंसे युक्त बन्धन-फाँसोंकी उपस्थिति ही समझो । ज्यों-ज्यों पुरुषकी आन्तरिक इच्छा शान्त होती जाती है, त्यों-त्यों उसका मोक्षके लिये कल्याणकारक साधन बढ़ता जाता है । विवेकहीन आत्माकी इच्छाको जो भलीभाँति पूर्ण करना है, वही मानो संसाररूपी विष-वृक्षको सींचना है।
(सर्ग ३६)
५५० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तत्त्वज्ञान हो जानेपर इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं और यदि कहीं उत्पन्न होती-सी दीखे तो वह ब्रह्मस्वरूप होती है—इसका सयुक्तिक वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यदि आत्माके अतिरिक्त यहाँ कोई दूसरी वस्तु विद्यमान हो, तब तो इच्छापूर्वक उसे प्राप्त करनेकी चेष्टा की जाय; परंतु जब उसके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी सत्ता है ही नहीं, तब आत्मासे भिन्न किस पदार्थकी इच्छा कैसे की जाय ? वह चिदात्मा आकाशरूप है और स्वयं आकाश ही आकाशरूप विषय और उसका ज्ञाता है तथा जगत्का आभास भी आकाशस्वरूप ही है—ऐसी दशामें यहाँ इच्छाका विषय ही क्या है। जहाँ निर्वाण है, वहाँ दृश्य-प्रपञ्च आदि नहीं रहते और जहाँ दृश्य-प्रपञ्च वर्तमान है, वहाँ निर्वाणका रहना असम्भव है। इस प्रकार छाया और आतपकी भाँति इन दोनोंके परस्पर सहयोगका अनुभव नहीं होता। यदि ये दोनों एक साथ रहते तो परस्पर बाधित होनेके कारण दोनों असत्य हो जाते और असत्यमें निर्वाण रहता नहीं; क्योंकि निर्वाणका अनुभव अजर-अमर और दुःखरहित रूपसे होता है। अधम प्राणियो ! दृश्य-प्रपञ्च तो आत्माको बन्धनमें डालनेवाला है, अतः तुमलोग उसे भस्म क्यों नहीं कर डालते और स्पष्टरूपसे स्फुरित होती हुई परमार्थ-वस्तुका दर्शन क्यों नहीं करते।
जब कार्य-कारणभाव आदि सब कुछ ब्रह्मरूप ही भासने लगता है तभी इस विस्तृत चिन्मात्रस्वरूप प्रत्यगात्मामें ब्रह्मता सिद्ध होती है। अतः जो लोग इस एकमात्र चिदाकाशस्वरूप सर्वात्मक ब्रह्मके सर्वत्र व्याप्त रहते हुए ब्रह्मज्ञानके लिये अन्य साधनोंका अन्वेषण करते फिरते हैं, उन मृगरूपी शिष्योंसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है। जब न दुःख है न सुख है, जगत् भी शान्त और मङ्गलमय है तथा चिन्मात्रतासे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, तब इच्छा कहाँसे उत्पन्न हो सकती है। जैसे मिट्टीके बने हुए योद्धाओंकी सेनामें मिट्टीके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, वैसे ही सदात्मक जगत् और अहंता आदि दृश्य-प्रपञ्चमें ब्रह्मके सिवा और कुछ नहीं है।
श्रीरामजीने पूछा—मुनीश्वर ! यदि ऐसी बात है तब तो इच्छाका उदय हो या न हो; क्योंकि वह भी तो ब्रह्मरूप ही ठहरी। ऐसी दशामें उसके विधि-निषेधसे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! आत्मतत्त्वका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर इच्छा ब्रह्मरूप ही हो जाती है, उससे भिन्न नहीं रहती; अतः तुमने जैसा समझा है वह बिल्कुल सत्य है; किंतु इस विषयमें मेरी यह बात और सुनो। जब-जब आत्मज्ञानका उदय होता है, तब-तब इच्छा शान्त हो जाती है। जैसे सूर्योदय होनेपर रात्रि विलीन हो जाती है, वैसे ही आत्मज्ञान हो जानेपर इच्छा आदि सभी विकार शान्त हो जाते हैं। ज्यों-ज्यों ज्ञानका उदय होता है, त्यों-त्यों द्वैतकी शान्ति और वासनाका विनाश होता जाता है। ऐसी स्थितिमें भला, इच्छा कैसे उत्पन्न हो सकती है। सम्पूर्ण दृश्य पदार्थोंसे वैराग्य हो जानेके कारण जिसकी किसी विषयमें इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं, उस पुरुषकी अविद्या शान्त हो जाती है और निर्मल मुक्तिका उदय हो जाता है। फिर तो उसका दृश्य-प्रपञ्चविषयक वैराग्य और अनुराग—दोनों नष्ट हो जाते हैं। उस समय उसका एकमात्र ऐसा स्वभाव ही हो जाता है कि उसे द्रष्टा और दृश्यकी शोभा रुचती ही नहीं। ऐसी परिस्थितिमें उस तत्त्वज्ञानीकी इच्छा और अनिच्छा—दोनों ही ब्रह्मस्वरूप ही हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है अथवा तत्त्वज्ञानीमें अवश्य ही इच्छा उत्पन्न ही नहीं होती। यदि किसी मनुष्यको तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो