संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * परमार्थ-तत्त्वका उपदेश * ५४१
ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही हूँ। मुझमें भेदज्ञानकी दृष्टि है ही नहीं। अतः मैं किसी भी वस्तुको अपनेसे भिन्न कहना नहीं जानता । जीवित रहकर व्यवहारपरायण होता हुआ भी जो परम शान्त है, उस ज्ञानी पुरुषकी जो मुर्देके समान स्थिति है, उसीको परमपद कहते हैं। जो बाहर- भीतरके साधनोंसे रहित, शान्त, अनन्त, साधनरूप और सम है, जिसे न सुख कहा जा सकता है न दुःख, जो 'अहं' भी नहीं है तथा 'यत्र नान्यत् पश्यति' इत्यादि श्रुतिके द्वारा जिसके स्वरूपका निर्देश कराया गया है, वह कल्याणस्वरूप तत्त्व ही परम पद है। उसे मैं अपनेसे भिन्न नहीं समझता। वस्तुतः उसे दूसरा कोई नहीं जानता। लोकैषणासे विरक्त ज्ञानी पुरुषके द्वारा आत्मामें ज्ञातापनकी भाँति उसका स्वयं ही अनुभव किया जाता है। उस परम पद- में न अहंता (मैं-पन) है न त्वत्ता (तू-पना), न अहंताका अभाव है और न अन्यता ही। वह केवल निर्वाणस्वरूप विशुद्ध कल्याणमय कैवल्य ही है। इस चेतन जीवात्माका चेत्य विषयोंकी ओर उन्मुख होना ही चित्तरूपता है, यही इसका संसार है और यही महान् कष्ट देनेवाला बन्धन है। चेतन जीवात्माका चेत्य विषयोंकी ओर उन्मुख न होना ही अचेत्यरूपता है। इसीको मोक्ष समझो। यही शान्त एवं अविनाशी परमपद है। जो दिशा और देश-काल आदिकी सीमासे बँधा हुआ नहीं है, वह शान्तस्वरूप शान्तात्मा परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान है, उसमें चेत्य (दृश्य) की सम्भावना ही नहीं है। फिर कौन, किसका और किस प्रकार चिन्तन करता है ? ये जो मन-बुद्धि आदि हैं, ये सब अन्तर्मुख दशामें चैतन्यरूप ही हैं। मन-बुद्धि आदि शब्दोंके अर्थरूपसे भावित होनेपर वे ही जडरूप मानी गयी हैं। समस्त दृश्योंका बाध हो जानेपर जो विशुद्ध चैतन्यस्वरूप परमात्मा अवशिष्ट रह जाता है, उसमें और शून्य आकाशमें क्या अन्तर है—इसे साधारण लोग नहीं जानते—विद्वान् ज्ञानी पुरुष ही जानते हैं। उनका कहना है, कि वह परमात्मा चिन्मय और निरतिशयानन्दस्वरूप है, इसलिये वाणीका विषय नहीं होता। जैसे अन्धकारमें देखनेका प्रयत्न करनेसे नेत्रोंमें कुछ सद्सद्रूप आभास दीखता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें जो आभास परिलक्षित होता है, वही यह जगत् है। 'मैं अज्ञानी हूँ' इस रूप- में जो जीवोंको अपने अज्ञानका बोध होता है, उससे सुरक्षित अज्ञानरूपी वायुका सहारा पाकर उनकी अविद्याग्नि प्रज्वलित होती रहती है। फिर जब उन्हें 'मैं ब्रह्म हूँ' यह यथार्थ बोध होता है, तब वही वायु उस अविद्याग्निको दुर्बल पाकर बुझा देती है।
अनावृत स्वप्रकाश निरतिशयानन्दरूपसे स्थित हुए तत्त्वज्ञानी पुरुषोंकी संसारके भानसे रहित तथा दुःखरूप क्षोभसे शून्य जो स्थिति है, उसीको मोक्ष कहते हैं और वही अविनाशी पद है। परमात्मज्ञानके साथ सांसारिक पदार्थोंके ज्ञानसे युक्त हो मनुष्य मुनि बन जाता है। परंतु जो परमात्माके अज्ञानके साथ-साथ सांसारिक पदार्थों- के ज्ञानसे शून्य होता है, वह पशु एवं वृक्ष बन जाता है। जैसे सुषुप्तावस्थामें स्वप्नका लय हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर उस तत्त्वज्ञके समाहित अन्तःकरणके भीतर सारे दृश्य-प्रपञ्चका लय हो जाता है। फिर तो केवल अपना परमात्मस्वरूप ही लक्षित होता है। जैसे आकाशमें नीलिमाकी प्रतीति भ्रममात्र ही है, उसी प्रकार कल्याणस्वरूप परमात्मामें पृथ्वी आदि पाञ्चभौतिक जगत्की प्रतीति भ्रमके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जैसे आकाश नील आदि वर्णोंसे रहित निर्मल है, उसी प्रकार शिवस्वरूप परमात्मा भी दृश्य-प्रपञ्चसे रहित एवं निर्मल है। जिस पुरुषकी बुद्धिमें यह निश्चय हो गया है कि यह सारा दृश्य-प्रपञ्च असत् (मिथ्या) ही है, वह समस्त विशुद्ध वासनाओं- से युक्त होनेपर भी उन वासनाओंसे रहित ही है। सर्वव्यापी शुद्ध-बुद्ध परमात्मामें कर्तृत्व और भोक्तृत्वका