भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५४२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

होना असम्भव है; इसलिये यहाँ न दुःख है न सुख, न पुण्य है न पाप और न किसीका कुछ नष्ट ही हुआ है । जिस अहंकारमें यह ममताबुद्धि होती है, वह भी दो चन्द्रमा और स्वप्नके नगरकी भाँति असत् (मिथ्या) ही है; इसलिये सब कुछ निराकार एव निराधार है। समस्त द्वैतसे रहित तत्त्वज्ञ पुरुष व्यवहारपरायण हो अथवा काष्ठ या पाषाणके समान निश्चल होकर चुपचाप बैठा रहे, सभी अवस्थाओंमें वह ब्रह्मस्वरूपताको ही प्राप्त है। रघुनन्दन ! जो ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंद्वारा पूर्णरूपसे सेवित है, जिसे दूसरा कोई छीन नहीं सकता तथा जो ज्ञानस्वरूप, निर्मल, शिव, अजन्मा, अविनाशी, नित्य- सिद्ध, सम, परमार्थ सत्य तथा शान्त ब्रह्मपद है, वही तुम हो । तुम उस परमपदमें नित्य प्रतिष्ठित हो ।

अहंभावना ही सबसे बड़ी अविद्या है, जो मोक्षकी प्राप्तिमे रुकावट डालनेवाली होती है । मूढ़ मनुष्य उस अविद्याके द्वारा ही जो मोक्षका अन्वेषण करते हैं, वह उनकी पागलोंकी-सी चेष्टा है। अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाली अहंता ही अज्ञानकी सत्ताका पूर्ण परिचय देनेवाली है; क्योंकि जो तत्त्वज्ञानी शान्त पुरुष है, उसमें ममता या अहन्ता नहीं रहती । अहंताका भलीभाँति त्याग करके आकाशकी भाँति निर्मल तथा मुक्त हुआ ज्ञानी पुरुष सदाके लिये निश्चिन्त हो जाता है; उसका शरीर रहे या न रहे; उसकी उपर्युक्त स्थितिमें कोई अन्तर नहीं आता । जो तत्त्ववेत्ता पुरुष भीतरकी मानसिक तरङ्गोंसे कभी क्षुब्ध नहीं होता, बाहरसे भी अस्तगत सूर्यकी भाँति शान्त रहता है और जिसे सदा प्रसन्नता बनी रहती है, वह मुक्त कहलाता है। इष्ट और अनिष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होनेपर भी वह सदा शान्त बना रहता है—हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होता । व्यवहारमें संलग्न रहनेपर भी द्वैतभावका अनुभव नहीं करता तथा भीतरसे पूर्ण परमानन्दमें निमग्न रहता है । जैसे समुद्रमें जलरूप आधारकी सत्ता ही नावों या जहाजोंको क्रय-विक्रयकी वस्तुओका दुःखद भार वहन करनेके लिये अवसर देती है, उसी प्रकार जीव और जगत्की जड सत्ता ही तृष्णाके पाशमें बँधे हुए मनुष्योंको इस जगत्में केवल दुःखका भार वहन करनेके लिये प्रेरित करती है । जो-जो वस्तु संकल्पसे प्राप्त होती है, वह संकल्पसे ही नष्ट भी हो जाती है । इसलिये जहाँ इस संकल्पकी सम्भावना ही नहीं है, वही सत्य एवं अविनाशी पद है । विचार करनेसे जिन पुरुषोंके सम्पूर्ण विशेष (भेदभाव) शान्त हो चुके हैं, उनके लिये केवल अहंताका नाश करनेवाली मुक्तिका उदय होता है । उनका कुछ बिगड़ता नहीं । अज्ञानी पुरुषो ! मोक्षकी प्राप्तिके लिये भोगोंके त्याग, विवेक-विचार तथा मन और इन्द्रियोंके निग्रहरूप पुरुषार्थ—इन तीनके सिवा चौथी किसी वस्तुका उपयोग नहीं है । अतः अनात्मवस्तुका त्याग करके तुमलोग शीघ्र अपने आत्माकी ही शरणमें आ जाओ ।

(सर्ग २९-३०)

निर्वाणकी स्थितिका तथा 'मोक्ष स्वाधीन है' इस विषयका सयुक्तिक वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! ब्रह्मके अतिरिक्त न नाश है न अस्तित्व, न अनर्थ है न जन्म- मृत्यु, न आकाश है न शून्यता और न नानात्व ही है । अर्थात् सब कुछ ब्रह्म ही है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं । जैसे मिथ्या अवभासित होनेवाले संकल्पनगरका नाश किसी प्रकार सम्भव नहीं—क्योंकि वह तो मिथ्या है ही, फिर उसका विनाश कैसा, उसी तरह जगत् और अहंकार आदि भी असत् हैं, अतः उनके लिये 'नाश' शब्दका प्रयोग नहीं होता; क्योंकि असत् वस्तु स्वयं ही विद्यमान नहीं रहती । स्वप्नपुरुषकी भाँति जिन