संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * जगत्के स्वरूपका विवेचन और ब्रह्मके स्वरूपका सविस्तर वर्णन * ५९३
उसके बीजमें कार्य-कारणभाव है, वैसी ही कार्य-कारणता जगत् और ब्रह्ममें है। वस्तुतः तो न तुमलोग हो, न हमलोग हैं, न ये जगत् हैं और न आकाश आदि ही हैं; बल्कि सर्वोपद्रवशून्य अपरोक्ष ब्रह्म ही सर्वत्र अशेषरूपसे वर्तमान है।
रघुकुलतिलक ! जैसे वायु और स्पन्दनमें भेद-प्रतीति होती है, वैसे ही अद्वितीय ब्रह्म और जीवात्मामें भी अज्ञानसे भेद प्रतीत होता है; अतः इस विषयमें ऐसा समझना चाहिये कि चित् और अचित्का भेददर्शन ही संसार है तथा अद्वितीय ब्रह्म और जीवात्माकी एकता ही मोक्ष है। इस प्रकार यह सारा जगत् निर्विकार परब्रह्ममय है, अतः इसे भी निर्विकार, आदि- अन्तरहित और निरामय ही समझो। संकल्पजनित नगरके समान द्वैताद्वैत-विकाररूप यह जगत् जीवके अपने ही संकल्पसे उत्पन्न होता है और अपने ही संकल्पसे नष्ट भी हो जाता है। वस्तुतः इस जगत्-रूप ब्रह्ममें कुछ भी उत्पन्न नहीं होता—ठीक वैसे ही, जैसे जलकी तरङ्गका उठना वास्तवमें उत्पन्न होना नहीं है और उसका नष्ट होना वास्तवमें नाश नहीं है; क्योंकि दोनों अवस्थाओंमें वह एकमात्र जल ही है।
रघुनन्दन ! क्षणमात्रमें ही एक देशसे दूसरे अत्यन्त दूर देशमें प्राप्त हुए संवित् (ज्ञान) का उन दोनों देशोंके मध्यमें जो निर्मल रूप होता है, वही परब्रह्म परमात्माका सर्वोत्कृष्ट रूप है। जीवन्मुक्तोंकी स्थिति तथा आचारके अनुसार व्यवहार करते हुए उस निराभास, सत्य तथा वासना और इच्छासे रहित चित्स्वरूपसे सुमेरु- गिरिकी तरह कभी चलायमान न होना ही विद्या है तथा भलीभाँति विवेक-विचारपूर्वक अन्वेषण करनेपर जिसकी उपलब्धि नहीं होती, वही अविद्या है। अविद्याका अभाव हो जानेपर क्या कहीं चिति और चेत्यका भेद सम्भव हो सकता है ? अर्थात् नहीं। और भेदका अभाव हो जानेपर फिर चिति अपने अंदर कैसे किसीको प्रकट कर सकेगी; इसलिये शान्ति—विषयशून्य चिन्मात्र स्थिति ही स्वतः प्रकट होती है। वास्तवमें तो ब्रह्म और जगत् एक ही हैं, अज्ञानके कारण वे अनेक-से अर्थात् विभिन्न जान पड़ते हैं। अज्ञानसे ही सर्वव्यापी, परिपूर्ण तथा शुद्ध ब्रह्म अपूर्ण एवं अशुद्ध-सा प्रतीत होता है। वही ब्रह्म अज्ञानसे निर्विकार होते हुए विकारयुक्त, शान्त एवं समरूप होते हुए अशान्त एवं विषम, सत् होते हुए अदृश्य होनेके कारण असत्, तद्रूप होते हुए अनद्रूप, विभाग- रहित होते हुए विभागवाला, जडतारहित होते हुए जडतायुक्त, निर्विषय होते हुए विषयी, अवयवशून्य होते हुए सावयव, स्वप्रकाश होते हुए घनान्धकार और पुरातन होते हुए नूतनके समान प्रतीत होता है। वह परमाणुसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होकर जगत्-समूहोंको अपने उदरमें समेट लेनेवाला है।
वत्स राम ! वह अनन्त और अपार होकर भी किसी एक स्थानपर नियतरूपसे स्थित नहीं रहता तथा आकाश- में भी वनकी कल्पना और पर्वतका निर्माण करनेमें तत्पर रहता है। (अर्थात् असम्भवको भी सम्भव कर सकता है।) वह सूक्ष्म पदार्थोंमें सबसे सूक्ष्म, स्थूलोंमें सबसे स्थूल, गरिष्ठोंमें सबसे अधिक गरिष्ठ और श्रेष्ठोंमें सबसे बढ़कर श्रेष्ठ है तथा कर्ता, कर्म और कारणसे रहित है। वह जगत्का उद्गमस्थान होकर भी नित्य अरण्यकी भाँति शून्य है और असंख्य पर्वतोंकी कठोरतासे युक्त होनेपर भी आकाशके लवांशसे भी कोमल है। वह प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक कालस्वरूप होकर प्रायः सबसे परे, प्राचीन होनेपर भी कोमल और नवीन, प्रकाशस्वरूप होकर भी अन्धकारके सदृश मलिन और प्रलयकालीन तमस्वरूप होकर भी प्रकाशरूपसे सर्वत्र व्याप्त है। वह प्रत्यक्ष होते हुए भी आँखोंकी पहुँचके बाहर, परोक्ष होते हुए भी सम्मुख उपस्थित, चिद्रूप होते हुए भी जड और जड होते हुए भी चिद्रूप है। वह ब्रह्म अनहंभावरूप होकर अहम्भाव ही