संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५४८ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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अहंभावरूप होकर अनहंभाव तथा अन्यरूप होकर आत्मरूप और आत्मरूप होकर अन्यरूप-सा स्थित है। इस चिद्रूपी परिपूर्ण सागरके भीतर ये त्रिभुवनरूपी तरंगें, द्रवता ही जिनका स्वभाव है, स्फुरित-सी हो रही हैं। यह चिद्रूप परमदेव यद्यपि देश-काल आदि अवयवोंसे रहित है, तथापि रात-दिन असद्रूप जगत्का वैसे ही विस्तार करता रहता है, जैसे जल तरङ्गसमूहका। इस चिद्रूपी जलकी जो द्रवता है वही जगत् कहलाता है। उस जगत्के संवित्द्वारा उपलब्ध खादिष्ट रूप, रस आदि विषय ही अङ्ग हैं और वह भुवनरूपी आवर्तोंसे युक्त है। इस उदीप्त चितिके प्रकाशित रहने-पर सम्पूर्ण प्रकाशशील पदार्थोंकी श्री उसके सामने शान्त हो जाती है और पुनः उसीसे उत्पन्न भी होती है, जैसे सूर्य आदिके तेजसे उनका अपना प्रकाश। यह चिदाकाश रङ्गभूमिके समान है, इसमें नियति (ईश्वरका विधान) रूपी नर्तकी भुवन-रचनारूपी नाटकके विभ्रमोंसे युक्त होकर अनवरत कार्यमें संलग्न हो रात-दिन नाचती रहती है। इस परब्रह्म परमात्माका उन्मेष ही जगत्का सौन्दर्य है और निमेष ही प्रलयका सूचक है। वास्तवमें तो वह उन्मेष और निमेषसे रहित होकर अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है।
(सर्ग ३४-३५)
जीवन्मुक्तिकी प्रशंसा तथा 'इच्छा ही बन्धन है और इच्छाका त्याग ही मुक्ति है' इसका सविस्तर वर्णन और उससे छूटनेके उपायका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम! जितने अनर्थस्वरूप सांसारिक पदार्थ हैं, वे सभी जलमें आवर्तकी भाँति भिन्न-भिन्न रूप धारण करके चमत्कार पैदा करते हैं अर्थात् इच्छाओंको उत्पन्न करके चित्तको मोहमें डाल देते हैं; परंतु जैसे सभी लहरें जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही सम्पूर्ण पदार्थ वस्तुतः नश्वर स्वभावके ही हैं। जैसे बालककी चिन्तासे कल्पित यक्ष-पिशाच आदिका रूप उसके सामने आकाशमें दीख पड़ता है; परंतु मुझ-जैसे ज्ञानीके लिये वह कुछ भी नहीं है, उसी तरह मेरी दृष्टिमें तत्त्वतः यह विश्व कुछ नहीं है; परंतु अज्ञानीके चित्तमें यही सत्य-सा प्रतीत होता है। यह विश्व पत्थरपर खुदी हुई पुतलियोंकी सेनाकी भाँति रूपावलोक तथा बाह्य और आभ्यन्तर विषयसे शून्य है, फिर इसमें विश्वता कैसी ? परंतु अज्ञानियोंके लिये यह रूपावलोक और मनन आदिसे युक्त प्रतीत होता है। श्रीराम! जगत्को जगद्रूपसे जानना भ्रम है और इसे जगद्रूपसे न जानना भ्रमशून्यता है। राघव! त्वत्ता और अहंता आदि सारे विभ्रम-विलास शान्त, शिव तथा शुद्ध ब्रह्मस्वरूप ही हैं, इसीलिये मुझे ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दिखायी पड़ता—ठीक वैसे ही जैसे आकाशमें कानन दृष्टिगोचर नहीं होता।
श्रीराम! जिसकी चेष्टा प्रारब्धप्राप्त कर्मोंमें कठपुतलीकी तरह इच्छाशून्य तथा व्याकुलतारहित होती है, वही विश्रान्त मनवाला जीवन्मुक्त मुनि है। जीवन्मुक्त ज्ञानीको इस जगत्का जीवन बाँसकी तरह बाहर-भीतरसे शून्य, रसहीन और वासनारहित प्रतीत होता है। जिसकी इस दृश्य-प्रपञ्चमें रुचि नहीं है और हृदयमें जिसे चिन्मात्र अदृश्य ब्रह्म ही अच्छा लगता है, उसने मानो बाहर-भीतरसे शान्ति प्राप्त कर ली और वह इस भवसागरसे पार हो गया।
रघुनन्दन! शास्त्रज्ञोंका कहना है कि मनका इच्छारहित हो जाना ही समाधि है; क्योंकि मनको जैसी शान्ति इच्छाका त्याग कर देनेसे प्राप्त होती है, वैसी सैकड़ों उपदेशोंसे भी उपलब्ध नहीं होती। इच्छाकी उत्पत्तिसे जैसा दुःख प्राप्त होता है, वैसा दुःख तो नरकमें भी नहीं मिलता; और इच्छाकी शान्तिसे