भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 589
५४६* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त-योगवासिष्ठ

चिद्रूप, अजन्मा, अव्यक्त, एक, अविनाशी, ईश्वर, खत्व और भावत्वसे रहित ब्रह्म ही सर्वत्र व्याप्त है। वह आकाशसे भी अत्यन्त शान्त है। जैसे आत्मामें स्वप्नका अनुभव भ्रान्ति है, वैसे ही ब्रह्मरूपी समुद्रमें अविद्या-जनित संसाररूपी तरङ्गें भी भ्रान्तिरूप ही हैं। वास्तवमें तो परमात्मामें न स्वप्न है न सृष्टि ही है। ब्रह्म एक ही है, उसमें न तो कोई आभास है, न चित्स्वरूप कोई दूसरा धर्म है और न जड़ता है। वह न सत् है, न असत् है; बल्कि वह सत्-असत्‌से विलक्षण सम, अविनाशी और द्वैतभावसे रहित है। पूर्वोक्त स्थितिके अनुसार आचरण करनेवाले जिस सत्पुरुषको यथार्थ आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया है, उसे मुनियोंमें श्रेष्ठ कहा जाता है। जैसे संकल्प-जनित नगरकी सृष्टि पुनः उसका संकल्प न करनेसे नष्ट हो जाती है, वैसे ही विषयानुभवसे उत्पन्न अहंकाररूप जगत् पुनः अनुभव न करनेसे चिद्ब्रह्ममें लीन हो जाता है। वास्तवमें तो यहाँ किसी भी पदार्थका कोई स्वभाव है ही नहीं। ये जितनी अनुभूतियाँ हैं, ये सभी महाचितिरूप जलकी द्रवरूपता हैं। वे ही अनुभूतियाँ महाचेतनरूपी वायुके स्पन्दन हैं तथा इन्हींको ब्रह्मरूपी आकाशकी शून्यता भी जानना चाहिये। जैसे वायु और उसका स्पन्दन—दोनों अभिन्न हैं, वैसे ही ब्रह्म और उसकी सृष्टिमें भी कोई भेद नहीं है। परंतु अपने स्वरूपकी भ्रान्ति हो जानेपर उनमें विभिन्नता प्रतीत होती है, यद्यपि वह स्वप्नमें देखी गयी अपनी मृत्युके समान असत्य है। जबतक ब्रह्मविचार स्पष्ट नहीं हो जाता, तभीतक यह भ्रान्ति रहती है; परंतु विचार स्पष्ट होते ही वह भ्रान्ति ब्रह्मरूपताको प्राप्त हो जाती है।

(सर्ग ३३)


जगत्‌के स्वरूपका विवेचन और ब्रह्मके स्वरूपका सविस्तर वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! तुम ऐसा समझो कि सुखके प्राप्त होनेपर दुःखका और दुःखके प्राप्त होनेपर सुखका नाश हो जाता है; अतः ये दोनों ही नाशवान् हैं और जिसका नाश नहीं होता, वह अविनाशी आत्मा है। बस, अब इस विषयमें विशेष शास्त्रोपदेश करना व्यर्थ है। जिसके मनमें इच्छाओंकी परम्परा बनी हुई है, उसे सुख-दुःखादि अवश्य ही प्राप्त होते रहते हैं। इसलिये यदि उन सुखादि रोगोंकी भलीभाँति चिकित्सा करना अभिप्रेत है तो पहले इच्छाका ही परित्याग करना चाहिये। परमपदरूप परमात्मामें अहंकार और इस जगत्‌की भ्रान्ति है ही नहीं। वह तो शान्त, निरालम्ब, सर्वात्मक, अविनाशी मोक्षरूप है। वास्तवमें तो न अहं है, न जगत् है; क्योंकि जो शान्त और अद्वितीय है, वह तो सर्वात्मकरूप है। ऐसी दशामें उसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व कैसे और कहाँसे सम्भव हो सकते हैं। ज्ञान भी आत्मस्वरूप ही है, अतः जो कुछ दीखता है, वह सब तद्रूप ही है। इसलिये अहंकारसहित सारा जगत् परमात्मासे अभिन्न है। एक आत्मा ही जब अज्ञानके कारण अनेकरूपताको प्राप्त हुआ-सा दीखता है, तब वही संसार कहलाता है और वह संसार स्वयं असत् है, इसी कारण तत्त्वदृष्टिसे विचार करनेपर उसकी सत्ता उपलब्ध नहीं होती। जैसे प्रवहणशील होनेके कारण सागर तरङ्गोंके रूपमें प्रतीत होता है, उसी तरह चिद्रूप होनेके कारण यह ब्रह्म ही अपनी सत्तासे निर्मल जगत्‌के रूपमें विकसित हुआ-सा जान पड़ता है। जैसे मेघाच्छादित आकाशमें वृक्ष, हाथी, घोड़े और मृग आदिका आकार परिलक्षित होता है, वैसे ही अवयव एवं आकाररहित परब्रह्ममें सृष्टि और अहंकारका रूप दीख पड़ता है। यह सारा जगत् परब्रह्ममें उसका अवयव-सा प्रतीत होता है। रामभद्र ! उसकी उपमा यों समझो—जैसे वटवृक्ष और