संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * भ्रान्तिसल्पनाके निवर्तक उपाय तथा परलोकरूपी चिकित्सा * ५४२
है, उस महात्माको नमस्कार है । जिसका चित्त परब्रह्ममें पूर्णतया लीन हो गया है, उसे पत्थरके सदृश बाहरका ज्ञान नहीं होता और भीतर चितिरूपताकी भावनासे उसकी संकल्प-शून्य-सी अवस्था हो जाती है, जिससे उसके लिये यह सारा दृश्य-प्रपञ्च शान्त हो जाता है ।
श्रीराम ! प्राणियोंके लिये दो व्याधियाँ बड़ी भयंकर हैं—एक तो यह लोक और दूसरा परलोक । क्योंकि इन्हीं दोनोंसे पीड़ित होकर सभी प्राणी भीषण दुःख भोगते हैं । इनमें जो अज्ञानी जीव हैं, वे इस लोकमें व्याधिग्रस्त होनेपर उसके निवारणके लिये भोग-रूपी कुत्सित औषधोंद्वारा जीवनपर्यन्त यथाशक्ति प्रयत्न करते हैं; परंतु परलोकरूपी व्याधिके लिये वे कुछ भी चिकित्सा नहीं करते । तथा जो उत्तम पुरुष हैं, वे परलोकरूपी महाव्याधिकी चिकित्साके लिये अमृत-तुल्य शम, सत्सङ्ग और आत्मविचाररूप उपायोंद्वारा प्रयत्न करते हैं । जो लोग परलोकरूपी व्याधिकी चिकित्साके लिये सदा सावधान रहते हैं, वे मोक्षमार्गकी उत्कट इच्छा उत्पन्न होनेपर अपनी शम-शक्तिद्वारा विजयी होते हैं । जो पुरुष इस लोकमें ही नरकरूपी व्याधिकी चिकित्सा नहीं कर लेता, वह रोगग्रस्त होकर औषधरहित स्थान (नरक) में जाकर फिर क्या करेगा । इसलिये अज्ञानियो ! तुमलोग इहलोककी चिकित्सा में ही अपने जीवनको मत गँवा दो । इसीके साथ-साथ आत्मज्ञानरूपी औषधोंद्वारा परलोककी भी चिकित्सा कर लो । अरे ! यह आयु तो वायुके वेगसे हिलते हुए पत्तेके ऊपर पड़े हुए छोटे-से जल-कणके समान क्षणभङ्गुर है, अतः पूर्ण प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही परलोकरूपी महाव्याधिकी चिकित्सा में जुट जाओ; क्योंकि शीघ्र ही यत्नपूर्वक परलोकरूपी महा-व्याधिकी चिकित्सा कर लेनेपर इस लोककी व्याधि तत्काल ही अपने-आप नष्ट हो जाती है ।
राघव ! जितने जन्तु हैं, वे सभी संवित्मात्र (आत्माके ही स्वरूप) हैं और उस संवित्के संकल्पका जो विस्तार है, वही जगत् है। ऐसा यह सारा जगत् एक छोटे-से परमाणुके भीतर सैकड़ों पर्वतोंके विस्तारसहित विद्यमान है । आत्मचितिका जो प्रसरण है, वह बाह्य तथा आन्तर विषय है । उन विषयोंका विस्तार चेतन-आकाशमें ही अनुभव होता है, इसलिये जगत्का भ्रम कभी सत्य नहीं हो सकता । यदि मनुष्य अपने पुरुषार्थके चमत्कार-से भोगरूपी कीचड़के समुद्रमें फँसे हुए अपने आत्माका उद्धार नहीं कर लेता तो फिर उसके उद्धारका दूसरा कोई उपाय नहीं है । जो मनुष्य अपने आत्माको काबूमें नहीं कर सका है, अतएव विषयभोगरूपी दलदलमें फँसा है, वही मूढ़ सम्पूर्ण आपत्तियोंका पात्र है। जैसे बाल्यावस्था जीवनकी प्रथम सीढ़ी मानी जाती है, वैसे ही भोगोंका सर्वथा त्याग, जो रागोंसे शान्ति प्रदान करनेवाला है, मोक्षका प्रथम सोपान है; परंतु जो अज्ञानी हैं, उनकी जीवन-रूपी नदियाँ करुण-क्रन्दनोंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त भयावनी होती हैं । उनमें रागवृत्तियोंसे उत्पन्न अनेक प्रकारके विक्षोभरूपी कल्लोल साथ-साथ बहनेवाली भँवरियाँ हैं । जैसे अज्ञानसे दो चन्द्रमा, बाल-वेताल, मृगतृष्णाका जल और स्वप्न-संसार—ये सभी प्रकट होते हैं, वैसे ही अज्ञानियोंके लिये जीवकी बहिर्मुखताके कारण अनेक प्रकारके सर्ग उत्पन्न होते रहते हैं। संवित्की बहिर्मुखताके भ्रमसे आकाश-मण्डलमें (गन्धर्व-नगर आदि) बहुत-से जगत् सत्-से अनुभूत होने लगते हैं; परंतु विचार करनेपर वे सत्य नहीं ठहरते । संवित्का निर्वाण—बहिर्मुखताका न होना जगत्का क्षय है और संवित्का उन्मीलन जगत् है । वास्तवमें तो न कुछ अंदर है न बाहर, जो कुछ है वह सर्वानन्द ब्रह्म ही है ।