संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तत्त्वज्ञान हो जानेपर इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं और यदि कहीं उत्पन्न होती-सी दीखे तो वह ब्रह्मस्वरूप होती है—इसका सयुक्तिक वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यदि आत्माके अतिरिक्त यहाँ कोई दूसरी वस्तु विद्यमान हो, तब तो इच्छापूर्वक उसे प्राप्त करनेकी चेष्टा की जाय; परंतु जब उसके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी सत्ता है ही नहीं, तब आत्मासे भिन्न किस पदार्थकी इच्छा कैसे की जाय ? वह चिदात्मा आकाशरूप है और स्वयं आकाश ही आकाशरूप विषय और उसका ज्ञाता है तथा जगत्का आभास भी आकाशस्वरूप ही है—ऐसी दशामें यहाँ इच्छाका विषय ही क्या है। जहाँ निर्वाण है, वहाँ दृश्य-प्रपञ्च आदि नहीं रहते और जहाँ दृश्य-प्रपञ्च वर्तमान है, वहाँ निर्वाणका रहना असम्भव है। इस प्रकार छाया और आतपकी भाँति इन दोनोंके परस्पर सहयोगका अनुभव नहीं होता। यदि ये दोनों एक साथ रहते तो परस्पर बाधित होनेके कारण दोनों असत्य हो जाते और असत्यमें निर्वाण रहता नहीं; क्योंकि निर्वाणका अनुभव अजर-अमर और दुःखरहित रूपसे होता है। अधम प्राणियो ! दृश्य-प्रपञ्च तो आत्माको बन्धनमें डालनेवाला है, अतः तुमलोग उसे भस्म क्यों नहीं कर डालते और स्पष्टरूपसे स्फुरित होती हुई परमार्थ-वस्तुका दर्शन क्यों नहीं करते।
जब कार्य-कारणभाव आदि सब कुछ ब्रह्मरूप ही भासने लगता है तभी इस विस्तृत चिन्मात्रस्वरूप प्रत्यगात्मामें ब्रह्मता सिद्ध होती है। अतः जो लोग इस एकमात्र चिदाकाशस्वरूप सर्वात्मक ब्रह्मके सर्वत्र व्याप्त रहते हुए ब्रह्मज्ञानके लिये अन्य साधनोंका अन्वेषण करते फिरते हैं, उन मृगरूपी शिष्योंसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है। जब न दुःख है न सुख है, जगत् भी शान्त और मङ्गलमय है तथा चिन्मात्रतासे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, तब इच्छा कहाँसे उत्पन्न हो सकती है। जैसे मिट्टीके बने हुए योद्धाओंकी सेनामें मिट्टीके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, वैसे ही सदात्मक जगत् और अहंता आदि दृश्य-प्रपञ्चमें ब्रह्मके सिवा और कुछ नहीं है।
श्रीरामजीने पूछा—मुनीश्वर ! यदि ऐसी बात है तब तो इच्छाका उदय हो या न हो; क्योंकि वह भी तो ब्रह्मरूप ही ठहरी। ऐसी दशामें उसके विधि-निषेधसे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! आत्मतत्त्वका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर इच्छा ब्रह्मरूप ही हो जाती है, उससे भिन्न नहीं रहती; अतः तुमने जैसा समझा है वह बिल्कुल सत्य है; किंतु इस विषयमें मेरी यह बात और सुनो। जब-जब आत्मज्ञानका उदय होता है, तब-तब इच्छा शान्त हो जाती है। जैसे सूर्योदय होनेपर रात्रि विलीन हो जाती है, वैसे ही आत्मज्ञान हो जानेपर इच्छा आदि सभी विकार शान्त हो जाते हैं। ज्यों-ज्यों ज्ञानका उदय होता है, त्यों-त्यों द्वैतकी शान्ति और वासनाका विनाश होता जाता है। ऐसी स्थितिमें भला, इच्छा कैसे उत्पन्न हो सकती है। सम्पूर्ण दृश्य पदार्थोंसे वैराग्य हो जानेके कारण जिसकी किसी विषयमें इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं, उस पुरुषकी अविद्या शान्त हो जाती है और निर्मल मुक्तिका उदय हो जाता है। फिर तो उसका दृश्य-प्रपञ्चविषयक वैराग्य और अनुराग—दोनों नष्ट हो जाते हैं। उस समय उसका एकमात्र ऐसा स्वभाव ही हो जाता है कि उसे द्रष्टा और दृश्यकी शोभा रुचती ही नहीं। ऐसी परिस्थितिमें उस तत्त्वज्ञानीकी इच्छा और अनिच्छा—दोनों ही ब्रह्मस्वरूप ही हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है अथवा तत्त्वज्ञानीमें अवश्य ही इच्छा उत्पन्न ही नहीं होती। यदि किसी मनुष्यको तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो