संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * तत्त्वज्ञान हो जानेपर इच्छाके उत्पन्न न होनेका निरूपण * ७५१
गयी तो उसकी इच्छा शान्त हो जाती है; क्योंकि प्रकाश और अन्धकारकी तरह इच्छा और तत्त्वज्ञान—ये दोनों एक साथ रह ही नहीं सकते । और जिसकी सारी इच्छाएँ शान्त हो गयी हैं, उसको भला, कौन किस प्रयोजनके लिये क्या उपदेश दे सकता है । जो इच्छाओंका अत्यन्त क्षीण हो जाना, समस्त प्राणियोंको आह्लादित करना अथवा आत्मानन्दका अनुभव है, वही तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिका लक्षण है । तत्त्वज्ञानीको जब किसी भी भोगपदार्थमें स्वादका अनुभव नहीं होता, तब सारा दृश्य-प्रपञ्च उसे फीका लगने लगता है । उस समय उसकी इच्छाका प्रसार रुक जाता है और तभी उसे मुक्ति भी मिल जाती है । तत्त्वज्ञान हो जानेसे जो एकता और अनेकता अर्थात् द्वैताद्वैतके प्रपञ्चसे मुक्त होकर शान्त हो गया है, उसके इच्छा और अनिच्छा आदि सभी भाव शिवात्मक—परमब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं । उसका न इच्छासे न अनिच्छासे, न सद्वस्तुसे न असद्वस्तुसे, न अपनेसे न परायेसे, न जीवनसे न मरणसे—यों किसीसे भी सरोकार नहीं रह जाता ।
रघुवीर ! जिसे निर्वाणका तत्त्वज्ञान हो गया है, उसके हृदयमें तो इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं । यदि कदाचित् उसमें इच्छा-सी उत्पन्न हो भी जाय तो वह शाश्वत ब्रह्मस्वरूप ही होती है । 'यह जगत् न दुःखस्वरूप है न सुखरूप, बल्कि अज, शिवस्वरूप और शान्त है'—ऐसी भावनासे जिसका अन्तःकरण शिलाकी भाँति सुदृढ़ हो गया है, उसे विद्वान् लोग तत्त्वज्ञ कहते हैं । इस प्रकार पूर्ववर्णित परमात्मतत्त्वका निश्चय करके जो धीरात्मा योगी निरतिशयानन्दस्वरूप परमात्माकी भावनासे विषको अमृतरूपमें परिवर्तित कर देनेकी भाँति दुःखका सुखरूपमें अनुभव करता है, वह प्रबुद्ध कहा जाता है। जगत्की सत्ताका अभाव समझमें आ जानेपर जब एकमात्र दृश्यानुभवरहित चिन्मय आकाश ही सर्वत्र व्याप्त दीखता है, तब सबमें समानरूपसे रहनेवाले, सौम्य, शान्त एव आनन्दमय परमात्मामें स्थिति हो जानेपर जीवका अहंताका भ्रम मिट जाता है । यह जो कुछ चराचरात्मक जगत् दिखायी पड़ रहा है, वह सब शान्त चिदाकाशात्मक ब्रह्मरूप ही है । इसके सिवा और जो कुछ दीखता है, वह दूसरेके मनोराज्यके नगरकी तरह असत् है । स्वप्नमें देखे गये नगर और बालकोंद्वारा कल्पित प्रेतकी तरह यह जो कुछ दीख रहा है, उसमें असत्यताके अतिरिक्त और क्या है अर्थात् वह निश्चय ही असत्य है । चूँकि सत्य ब्रह्म ही 'अहम्' 'इदम्' आदि रूपसे असत्य-सा भासित होता है, इसलिये यह भ्रान्ति भ्रान्तिग्रस्त पुरुषके बिना ही स्फुरित होती है; अतएव वह असत्य है।
रामभद्र ! वास्तवमें तो चाहे इच्छा हो या अनिच्छा, सृष्टि हो अथवा प्रलय; इससे यहाँ न तो किसीकी कोई हानि है और न इससे कुछ लाभ ही है । ये जो इच्छा-अनिच्छा, सद्-असत्, भाव-अभाव और सुख-दुःख आदिकी कल्पनाएँ हैं, इनमेंसे किसीका भी तत्त्वज्ञानीके चिदाकाशमें उत्पन्न होना सम्भव नहीं है । विवेकद्वारा प्राप्त हुई शान्तिमें तृप्त हुए जिस विवेकीकी इच्छाएँ दिन-पर-दिन क्षीण होती जाती हैं, उसीको मोक्षका अधिकारी कहा जाता है । किंतु जिस अविवेकीका हृदय इच्छारूपी छुरीसे विद्ध हो गया है, उसमें ऐसी भीषण वेदना होती है, जिसे ये मणि, मन्त्र और महौषध आदि भी मिटानेमें समर्थ नहीं हो सकते । वस्तुतः तो इस परमात्मामें जगत् आदि कुछ भी पदार्थ न तो उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है; बल्कि निद्रागत हृदयकी तरह चेत्य प्रतिभासित होता है । प्रतिभासमात्र होनेके कारण पृथ्वी आदि कारणोंसहित इस देहकी भी सत्ता नहीं है, केवल चिन्मात्र ब्रह्म ही स्थित है ।
रघुकुलतिलक! योगीलोग ज्ञानरूप निर्विकल्प-समाधिके प्रयोगसे आधे क्षणमें ही जगत्को आकाशरूपमें और