भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास * ५२५


हो जाना है। सत्संग, शास्त्रोंके अर्थका विवेकपूर्वक विचार और अपना प्रयत्न—इन सब साधनोंकी एक साथ प्राप्ति होनेपर एक ही समयमें अथवा एक-एक साधनके प्राप्त होनेपर क्रमशः अविद्यारूपी मलका नाश होता है। अविद्याका नाश हो जाना ही जिसका एकमात्र स्वरूप है, ऐसा जो अविद्याकी निवृत्तिके पश्चात् तत्त्व शेष रहता है, उस नाम और अर्थसे रहित परम वस्तुको वास्तवमें नित्य सत्य होनेके कारण सत् और प्रतीत न होनेके कारण असत् भी कहा गया है। यह परमार्थ वस्तु आनन्दघन, जरा आदि विकारोंसे रहित, अनन्त और एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही है। संकल्पमात्रसे स्फुरित होनेवाला नाम-रूपात्मक जगत् तो वास्तवमें है ही नहीं। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयकी जो त्रिपुटी है, उसके मोहसे तुम सर्वथा रहित हो। अतः निर्वाण ब्रह्मरूपसे सर्वत्र व्याप्त हुए सदा शोकशून्य अवस्था में स्थित हो।

(सर्ग ११-१२)


त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास और उनके गृह, नगर, देश, लोक एवं त्रिलोकके साम्राज्यकी कल्पनाका विस्तार

भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! किसी समयकी बात है, कहीं किसी कल्पवृक्षमें उसकी युगल शाखामें ब्रह्माण्डरूपी गूलरका फल प्रकट हुआ। उसके भीतर तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंके राजा इन्द्र उसी तरह निवास करते थे, जैसे शहदके छत्तेमें मधु-मक्खियोंका स्वामी। वे गुरुके उपदेश और अपने अभ्याससे अविद्याके आवरणका नाश करके महात्मा हो गये थे। अपने अन्तःकरणमें सदा परमात्माके स्वरूपका चिन्तन करते रहते थे। पूर्वापरका ज्ञान रखनेवाले विद्वानोंमें उनका सबसे ऊँचा स्थान था। तदनन्तर एक समय प्रभावशाली भगवान् नारायण और शिव आदि, जब कहीं अपने लोकातीत परमधाममें विराजमान थे, उस समय उन देवराज इन्द्रने अकेले ही अस्त्र-शस्त्ररूपी अग्निज्वालाको धारण करनेवाले महापराक्रमी असुरोंके-साथ युद्ध किया, उसमें उनकी पराजय हुई और उन्हें तुरंत ही युद्धभूमिसे भागना पड़ा। शत्रु उनके पीछे पड़ गये थे; अतः वे बड़े वेगसे दसों दिशाओंमें भागते फिरे। उन्हें कहीं भी ऐसा आश्रय नहीं मिला, जहाँ वे विश्राम ले सकें। इतनेमें ही उनके शत्रुओंकी दृष्टि कहीं इधर-उधर चली गयी। उस समय इन्द्रको छिपनेके लिये थोड़ा-सा अवसर मिल गया। उन्होंने अपने संकल्पजनित स्थूल साकार रूपको शान्त करके अपने अन्तःकरणके भीतर ही सूक्ष्मभूतमें विलीन कर दिया और अत्यन्त अणुरूप होकर बाहर सूर्यकी किरणोंमें स्थित किसी त्रसरेणुके भीतर संकल्पमात्रसे प्रवेश किया, वहाँ उन्हें शीघ्र ही विश्राम प्राप्त हुआ। फिर तो उन्हें युद्धकी बात भूल गयी और इसीलिये वहाँसे बाहर निकलनेका संकल्प भी निवृत्त हो गया। वहाँ उन्होंने अपने रहनेके लिये एक घरकी कल्पना की और क्षणभरमें उन्हें अनुभव हुआ कि घरका निर्माण हो गया और मैं उसमें रह रहा हूँ। उस संकल्पकल्पित भवनके भीतर एक कमलके आसनपर बैठकर वे उसी तरह आनन्दका अनुभव करने लगे, जैसे अपने स्वर्गीय सदनमें सिंहासनपर बैठकर किया करते थे।

उस घरमें रहते हुए इन्द्रने एक ऐसा कल्पित नगर देखा, जिसके परकोटे और महल मणि, मोती तथा मूँगे आदिसे बने हुए थे। उस नगरके भीतर जाकर देवराजने जब इधर-उधर दृष्टिपात किया, तब उन्हें एक देश दिखायी दिया, जो अनेकानेक पर्वत, ग्राम, गोशाला, नगर और काननोंसे सुशोभित था। तत्पश्चात् वैसे ही संकल्पसे युक्त हुए इन्द्रने एक विराट् लोकका