संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
चिन्मय परब्रह्मके सिवा अन्य वस्तुकी सत्ताका निराकरण, जगत्की निःसारता तथा सत्सङ्ग, सत्-शास्त्र-विचार और आत्मप्रयत्नके द्वारा अविद्याके नाशका प्रतिपादन
भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! जैसे 'महाकाशमें घटाकाश उत्पन्न हुआ है' अपने मनसे इस तरहकी कल्पना करना भ्रममात्र ही है; उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें प्रपञ्चात्मक, असद्रूप अहंभावकी भावना केवल भ्रम ही है । सम्पूर्ण कल्पनाओंका अधिष्ठान वह ब्रह्म परम सूक्ष्म है । उसीकी कल्पना यह आकाश आदि जगत् है । देश, काल आदि जगत् तथा इसके सहस्रों अवान्तर कार्यरूपी विस्तारोंमें भी एकमात्र घन, सूक्ष्म, चिन्मय ब्रह्मके विस्तारके सिवा दूसरा कोई वास्तविक रूप हो, यह सम्भव नहीं है । चिन्मय परमात्माका विस्तार होनेसे ही काल, आकाश, नौका, जल, स्थल, निद्रा, जाग्रत् और स्वप्नमें भी जगत् उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता है। विद्याधर ! यह जगत् किसी पटपर अङ्कित हुए विशाल राज्यके चित्रके समान सुन्दर जान पड़ता है । इसमें सहस्रों खुर (पैर), मस्तक, नेत्र, हाथ और मुख, मुखोंकी चेष्टाएँ तथा तर्क-वितर्क दृष्टिगोचर होते हैं । इसमें परिमित जगहमें ही नाना प्रकारके पर्वत, शरीर, दिशा, देश और नदी आदि दृश्य वस्तुओंका चित्रण हुआ है । यह भीतरसे शून्य और निःसार है । अनेक प्रकारके रंगोंसे रँगा हुआ है । वैराग्य-मात्रके प्रकट होते ही इसका विनाश हो जाता है। इस चित्रमय जगत्में देवता, असुर, गन्धर्व, विद्याधर, बड़े-बड़े नाग और मनुष्य आदि प्राणी अङ्कित हैं । जैसे नूतन चित्र अंगुलियोंद्वारा किया गया मर्दन नहीं सह सकता, उसी तरह यह जगत् विचारको नहीं सहन कर पाता अर्थात् जैसे हाथसे रगड़नेपर चित्र मिट जाता है, उसी तरह विवेकपूर्वक विचार करनेपर यह जगत् भी नहीं टिक पाता है । मानसिक संकल्प-विकल्पसे ही यह प्रकाशमें आता है । हृदयको क्षुब्ध कर देनेवाली काम-वासनारूप जालके समूहोंसे निबद्ध, सम्पूर्ण आवर्त-रूपी विकारोंसे युक्त, स्त्री-पुत्र आदिमें फैलते हुए स्नेहसे मिश्रित तथा मिथ्या होनेके कारण अज्ञात विषयोंके बारंबार आस्वादनके द्वारा प्रसारको प्राप्त हुआ जो जीवात्माका संकल्प है, वह चित्रलिखित विशाल राज्यके रूपमें वर्णित यह संसार है । विद्याधर ! मन, अहंकार, बुद्धि आदि जो कुछ भी विकल्पक ज्ञान है, उस सबको तुम एकमात्र अविद्या ही समझो, जो पुरुष-प्रयत्नसे शीघ्र नष्ट हो जाती है ।
इतना प्रसंग सुनानेके बाद श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! संसार-सागरको पार करनेकी इच्छावाले विरक्त श्रेष्ठ पुरुषके साथ तथा परमात्मज्ञानीके साथ भी बैठकर इस संसारके विषयमें विवेकी मनुष्यको विचार करना चाहिये (कि यह क्या है ? इसका परिणाम, मूल और सार क्या है ? तथा इससे मुक्त होनेका क्या उपाय है ?)। विवेकी पुरुषको उचित है कि वह जहाँ-कहींसे भी विरक्त, ईर्ष्यारहित एवं परमात्मज्ञानी श्रेष्ठ पुरुषको ढूँढ़ निकाले और यत्नपूर्वक उसका संग और सेवा करे । ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान रखनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! तुम यह अच्छी तरह जान लो कि श्रेष्ठ पुरुषका संग सिद्ध हो जानेपर साधकको महान् श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त होती है, जिससे अविद्याका आधा भाग तत्काल नष्ट हो जाता है । इस प्रकार अविद्याका आधा भाग तो सत्संग-से नष्ट होता है और एक चौथाई भाग शास्त्रोंके तात्पर्यकी आलोचनासे दूर हो जाता है; फिर जो चतुर्थ भाग शेष रह जाता है, उसे मनुष्यको अपने प्रयत्नसे परमात्म-साक्षात्कारके द्वारा नष्ट कर देना चाहिये । यदि संसार-बन्धनसे मुक्त होनेकी एकमात्र उत्कट इच्छा उत्पन्न हो जाय तो वह इच्छा वैराग्यके द्वारा उस पुरुषको भोगों और उसके साधनोंसे दूर हटा देती है । भोग-इच्छाका नाश हो जानेपर अविद्याका चतुर्थ अंश अपने यत्नसे नष्ट