भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 566

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * संसार-वृक्षके उच्छेदके उपाय तथा ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन * ५२३


भी नहीं है अथवा कोई अनिर्वचनीय वस्तु ही है। तुम अहन्ताको ही इस विश्वका बीज—मूलकारण समझो; क्योंकि उसीसे पर्वत, समुद्र, पृथ्वी और नदी आदिके सहित यह जगत्-रूपी वृक्ष प्रकट हुआ है और इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्तिरूपी रससे परिपूर्ण जो ऊपरके भुवन हैं, वे ही इस वृक्षके मूल भाग हैं। चारों युग इसमें लगे हुए घुन हैं। अज्ञान ही इसकी उत्पत्तिकी भूमि है। जीवमात्र इसपर बसेरे लेनेवाले करोड़ों पक्षी हैं। भ्रान्ति-ज्ञान इस वृक्षका विशाल तना है और तत्त्वज्ञानसे उपलब्ध होनेवाला मोक्ष ही इस वृक्षको दग्ध करनेवाली अग्नि है। इन्द्रियोंद्वारा विषयोंकी उपलब्धि और मनसे होनेवाले संकल्प-विकल्प आदि इस वृक्षके विविध भाँति-भाँतिके सौरभ (सुगन्ध) हैं। विशाल आकाश महान् वन है। ऋतुएँ इसकी विचित्र शाखाएँ हैं, दसों दिशाएँ उपशाखाएँ हैं। इस तरह संसाररूपी वृक्ष अपने मूलभागसे पातालको, मध्यभागसे सम्पूर्ण दिशाओंको और शिखाभागसे अन्तरिक्षको परिपूर्ण करके वास्तवमें असद्रूप होता हुआ भी सद्के समान प्रतीत होता है।

(सर्ग ७)


संसार-वृक्षके उच्छेदके उपाय, प्रतीयमान जगत्‌की असत्ता, ब्रह्ममें ही जगत्‌की प्रतीति तथा सर्वत्र ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन

भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! पातालसहित यह पृथ्वी जिसका आवार (मूलभाग) है, लोकालोकपर्यन्त फैले हुए पर्वतोंकी कन्दराएँ जिसकी वेदी हैं, ऐसा यह संसार-रूपी वृक्ष अहंकाररूप बीजसे उत्पन्न होता है। ज्ञानरूपी अग्निसे जब इसका बीज दग्ध हो जाता है, तब कुछ भी उत्पन्न नहीं होता। यहाँ जो कुछ प्रतीत हो रहा है, सब असत्य ही है। मायाके हाथी-घोड़ोंकी तरह कहींसे यों ही पैदा हो गया है। संकल्प-विकल्पको त्याग देनेमात्रसे इस संसार-भ्रमका नाश हो जाता है। शुद्धात्मन् ! तुम पहले पतनके हेतुभूत अविवेक-पदमें स्थित थे। किंतु अब उससे भिन्न उस पुण्यमयी दूसरी विवेक-पदवीको प्राप्त हो गये हो, जो तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली है। अतः मेरा अनुमान है कि इस मनके द्वारा अब फिर तुम नीचे नहीं गिरोगे। इसलिये तुम मन और वाणीकी चेष्टासे रहित, निर्मल, सच्चिदानन्द परमात्मपदका आश्रय लेकर सम्पूर्ण दृश्यसमूहको त्याग दो।

निष्पाप विद्याधर ! दृश्यको याद न रखते हुए सब प्रकारके तापसे शून्य एवं शान्त सच्चिदानन्दघन-स्वरूपसे स्थित रहो। अहंकारकी सत्ता नहीं है, इस भावनासे अहंकाररहित होकर यदि तुम्हारा चेतन-स्वरूप चिन्मय परमात्मामें पूर्णरूपसे मिलकर एक हो जाय तो दूसरी कोई प्रकाशित वस्तु है ही नहीं, फिर तुम्हारे स्वरूपभूत ब्रह्मकी किससे उपमा दी जाय।

चिन्मय परमात्मासे भिन्न माने गये इस जगत्‌के स्फुरणको तुम चिन्मय परमात्मासे ही उत्पन्न हुआ जानो; क्योंकि काष्ठ, जल और दीवार सबमें ही परब्रह्म परमात्मा विराजमान है। सभी स्थानोंमें सृष्टिका समूह परस्पर गुँथा हुआ स्थित है। ब्रह्म और जगत्‌में जो भेद कहा गया है, वह असत् है। जैसे सुवर्ण और कटकमें भेद नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्म और जगत्‌में भी भेद नहीं है।

(सर्ग ८-१०)

संक्षिप्त योगवासिष्ठ · पृष्ठ 566, कुल 750 में से · BharatKosha