भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५२२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

किसी भोले-भाले बच्चेको ठग लेते हैं। मतवाले हाथी ऐरावतके कुम्भस्थलको विदीर्ण कर देना सरल है; परंतु कुमार्गमें प्रवृत्त हुई अपनी इन इन्द्रियोंको रोकना सरल नहीं है। जो लोग जितेन्द्रिय तथा महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं, वे ही इस भूतलपर मनुष्य कहे जाने योग्य हैं, इनके अतिरिक्त शेष मानवोंको तो मैं मांसकी बनी हुई चलती-फिरती मशीनें समझता हूँ। भोगोंकी आशाका परित्याग कर देनेके सिवा दूसरे कोई ऐसे साधन नहीं हैं, जो इन्द्रियरूपी महान् रोगोंकी शान्ति कर सकें। इनकी शान्तिके लिये न तो ओषधियों, न तीर्थ और न मन्त्र ही लाभकारी सिद्ध होते हैं। जैसे विशाल वनमें बहुत-से-लुटेरे यात्रा करनेवाले अकेले पथिकको महान् कष्टमें डाल देते हैं, उसी प्रकार विषयोंकी ओर दौड़नेवाली इन इन्द्रियोंने मुझे अत्यन्त खेदजनक अवस्थामें पहुँचा दिया है। गहरे गड्ढे और इन्द्रियाँ एक-सी ही हैं, दोनों ही प्राणियोंको नीचे गिरानेमें अत्यन्त कुशल हैं। उनमें दोषरूपी विषधर सर्प वास करते हैं तथा इनमें विषयरूपी लाखों सूखे काँटे होते हैं। राक्षस और अपनी इन्द्रियाँ दोनों एक-से स्वभाववाले हैं। दोनों अपने ही पालन-पोषणमें तत्पर, अनार्य, दुःसाहसी तथा अन्धकारमें विहार करनेवाले होते हैं। जीर्ण बाँस आदिकी लकड़ियाँ और इन्द्रियाँ भीतरसे खोखली, निस्सार, टेढ़ी, गाँठवाली तथा एकमात्र जलानेके ही योग्य होती हैं। दुखियोंका उद्धार करनेवाले महामन् ! इस प्रकार इन इन्द्रियोंके कारण मैं विपत्तिके समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। मेरे पास आत्मरक्षाका कोई साधन नहीं है। आप स्वयं ही कृपा करके मेरा उद्धार कीजिये; क्योंकि संसारमें जो कोई भी श्रेष्ठ संत-महात्मा हैं, उनका समागम बड़े-से-बड़े शोकको हर लेनेवाला है, ऐसा सभी सत्पुरुष कहते हैं। (सर्ग ५-६)


भुशुण्डजीद्वारा विद्याधरको उपदेश—दृश्य-प्रपञ्चकी असत्ता बताते हुए संसार-वृक्षका निरूपण

भुशुण्डजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! विद्याधरके उस पवित्र वचनको सुनकर मैंने उसके प्रश्नके अनुसार सुस्पष्ट पदोंसे युक्त वाणीद्वारा उसे इस प्रकार उत्तर दिया—'विद्याधर ! यह बड़ी अच्छी बात है कि तुम अपने कल्याणके लिये जाग उठे हो। सौभाग्यका विषय है कि तुम्हें चिरकालके बाद संसाररूपी अन्धकारपूर्ण कूपसे ऊपर उठनेकी इच्छा हुई है। आज विवेकसे युक्त हुई तुम्हारी पवित्र बुद्धि अग्निसे व्याप्त सुवर्णकी भाँति अद्भुत शोभा पा रही है। मुझे विश्वास है कि विवेकसे निर्मल हुई तुम्हारी बुद्धि मेरी उपदेशवाणीके तात्पर्यको सुन्दर ढंगसे अनायास ही ग्रहण कर सकती है; क्योंकि स्वच्छ दर्पणमें पदार्थोंका प्रतिबिम्ब अनायास ही प्रकट हो जाता है। इस समय मैं जो कुछ कहूँ, वह सब तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिये; क्योंकि मैंने चिरकालतक अनुसन्धान करके इस विचारको निश्चित किया है। अतएव तुम्हें इस विषयमें कोई दूसरा विचार नहीं करना चाहिये। जो कुछ अहंकार आदि तुम्हारे अन्तःकरणमें प्रतीत हो रहा है, वह सब तुम नहीं हो। इन दृश्योंमें ही कोई आत्मा है, जिसे ढूँढ़कर प्राप्त करना है, ऐसा विचारकर यदि चिरकालतक अपने भीतर ढूँढ़ते रहोगे तो भी तुम्हें अपने स्वरूपभूत आत्माकी उपलब्धि नहीं होगी। इसलिये दृश्यमात्र ही जिसका लक्षण है, उस अज्ञानको छोड़कर तुम उसके साक्षीको आत्मा समझो।

जैसे मृगतृष्णामें जलकी प्रतीति होनेपर भी वास्तवमें वहाँ जल नहीं होता है, उसी प्रकार सारा विश्व अवस्तु-रूप होनेके कारण सद्रूपसे प्रतीत होनेपर भी असत् ही है। अथवा ऐसा समझो कि यह जो कुछ भासित होता है, वह सब ब्रह्म ही है या यों समझो कि वह कुछ