भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५०४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जाती है। संकल्पोंका अभाव रहनेके कारण यह अवस्था न जाग्रत् है, न स्वप्न है और अज्ञानका अभाव होनेसे यह न सुषुप्त ही है अर्थात् यह इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत है। ज्ञानके द्वारा सामने दिखायी देनेवाले इस जगत्की जो निवृत्ति है, परमात्मामें स्थित एवं भलीभाँति प्रबुद्ध हुए ज्ञानी पुरुषोंकी उसी अवस्थाको तुर्यपद कहते हैं। अहङ्कारका त्याग होनेपर और चित्तके विलीन हो जानेपर जब समताकी उत्पत्ति हो जाती है, तब उसे तुर्यावस्था कहते हैं।

श्रीराम ! इसके अनन्तर अब तुम्हें मैं एक दृष्टान्त बतला रहा हूँ, उसे सुनो। किसी एक विस्तृत घने जंगलमें महामौन धारण करके बैठे हुए किसी एक अद्भुत मुनिको देखकर एक व्याधने उनसे पूछा—'मुने मेरे बाणके द्वारा घायल एक मृग इधर आया था, वह कहाँ चला गया ? इस प्रकारका उस व्याधका प्रश्न सुनकर उस मुनिने उस व्याधको उत्तर दिया—'सखे ! हम जंगलके निवासी मुनि समता और शीलवान् होते हैं। व्यवहारका कारण जो अहंकार है, वह हमलोगोंमें नहीं है। सम्पूर्ण इन्द्रियोंका कार्य अकेला अहङ्काररूप मन ही करता है और वह मेरा मन निःसन्देह चिरकालसे विलीन हो चुका है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक किसी भी अवस्थाको मैं नहीं जानता। इन अवस्थाओंसे अतीत एकमात्र तुर्यपदमें ही, जहाँ दृश्यका अभाव है, मैं स्थित रहता हूँ।' रघुनन्दन ! उस मुनिश्रेष्ठके ऐसे वचन सुनकर वह व्याध उनके अर्थको न समझकर अपनी अभीष्ट दिशाकी ओर चला गया। इसीलिये मैं कहता हूँ कि महाबाहो ! तुर्यसे श्रेष्ठ अन्य कोई अवस्था नहीं है। कल्पनासे रहित सच्चिदानन्द परमात्मा ही तुर्य है और वही यहाँ विद्यमान है, उसके सिवा अन्य कुछ नहीं है;

क्योंकि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ चित्तका ही विकार होनेसे उसका स्वरूप है। जाग्रत् अवस्थाका चित्त घोर है, स्वप्न अवस्थाका चित्त शान्त है और सुषुप्त अवस्थाका चित्त मूढ़ है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित हुआ चित्त 'मृत' है। जो 'मृत' चित्त है, उसमें एकमात्र सत्त्व ही सम-रूपसे स्थित रहता है। इसीका समस्त योगीजन बड़े यत्नके साथ सम्पादन करते हैं और मुक्त हो जाते हैं।

समस्त दृश्य-जगत्का बाध करना ही सम्पूर्ण अध्यात्मशास्त्रोंका परम सिद्धान्त है। वहाँ न तो अविद्या है और न माया ही है; किंतु एक अद्वितीय, क्रियारहित शान्त विज्ञानानन्दघन परब्रह्म ही है। जो शान्त, चेतन, स्वच्छ, सर्वत्र एकरूपसे विद्यमान तथा सर्वशक्तिसम्पन्न 'ब्रह्म' नामसे कहा गया है, उसे अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार निर्णय करके कोई शून्य, कोई विज्ञानमात्र और कोई ईश्वररूप कहते हुए आपसमें विवाद किया करते हैं। मनुष्यको रमणीय या अरमणीय वस्तुको देखकर उनमें समभावसे स्थित रहना चाहिये। बस, इतने ही अपने साधनसे यह संसार जीत लिया जाता है। सुख या दुःख अथवा सुख-दुःख-मिश्रित पदार्थके प्राप्त होनेपर उनकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिये। बस, इतने ही अपने साधनसे वास्तविक अक्षय अनन्त सुखरूप परमात्मा-की प्राप्ति हो जाती है। जिसने तीनो लोकोंकी सभी वस्तुओंके साररूप परमात्माका ज्ञान कर लिया है, जो शोभायमान तथा अमृतमय है और जिसका अन्तःकरण पूर्ण चन्द्रमण्डलके सदृश शान्त है, ऐसा परमपदमें स्थित ज्ञानी महात्मा पुरुष विज्ञानानन्दघन परमात्माको प्राप्त करता है। वह कर्मोंको करता हुआ भी कुछ नहीं करता।

(सर्ग १२३—१२५)