भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जीवन्मुक्त पुरुषकी विशेषता आदिका प्रतिपादन * ५०३


श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके प्रति जीवन्मुक्त पुरुषकी विशेषता, रागसे बन्धन और वैराग्यसे मुक्ति तथा तुर्यपद और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवन् ! ऐसा होनेपर श्रेष्ठबुद्धि आत्मज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुषमें अन्य सिद्धोंकी अपेक्षा कौन-सी विशेषता होती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जीवन्मुक्त ब्रह्मज्ञानी पुरुषकी बुद्धि सच्चिदानन्द परमात्मामें ही दृढ़रूपसे जम जाती है । यही कारण है कि वह नित्यतृप्त शान्तचित्त पुरुष परमात्म-स्वरूपमें ही स्थित रहता है । मन्त्र, तप एवं तन्त्रकी सिद्धिसे युक्त सिद्धोंके द्वारा प्राप्त की गयी जो आकाशगमन आदि सिद्धियाँ हैं, उनमें कौन-सी अपूर्व ( महत्त्वकी ) विशेषताकी बात है ? मन्त्रसिद्धि आदिसे युक्त उन सिद्धोंने प्रयत्नपूर्वक साधन कर जिन अणिमादि सिद्धियोंकी प्राप्ति की है, उनमें ब्रह्मज्ञानी पुरुष कोई विशेषता नहीं समझता । उस जीवन्मुक्त महात्मामें यही विशेषता है कि वह मूढ़बुद्धि अज्ञानी पुरुषोंके समान नहीं रहता । उस महाबुद्धिका मन सभी वस्तुओंमें आसक्तिके परित्यागके कारण रागरहित तथा निर्मल ही बना रहता है और वह कभी भी विषयभोगोंमें नहीं फँसता है । जिसका स्वरूप समस्त बाहरी चिह्नोंसे रहित है तथा तत्त्वज्ञानसे दीर्घकालिक सांसारिक भ्रमकी निवृत्ति हो जानेके कारण जो परम शान्तिको प्राप्त हो चुका है, उस ज्ञानी महापुरुषमें काम, क्रोध, विषाद, मोह, लोभ आदि आपत्तियोंका नित्य अत्यन्त अभाव ही रहता है ।

प्रिय श्रीराम ! महासर्गके आरम्भमें प्राणी उस परमात्मासे निकलकर अपने अपने कर्मोंके अनुसार अनेक प्रकारके जन्मोंका अनुभव करते हैं । परमात्मासे निकलनेके बाद उन जीवोंके अपने-अपने जो कर्म हैं वे ही सुख और दुःखके कारण होते हैं तथा अपनी-अपनी समझके अनुसार उत्पन्न हुआ जो संकल्प है वही शुभाशुभ कर्मोंका कारण होता है । निष्पाप श्रीराम ! ये इन्द्रियाँ जिस-जिस विषयकी ओर निरन्तर दौड़ती हैं, उस-उस विषयमें पुरुष रागके द्वारा बँध जाता है । इसलिये उन विषयोंमें राग न करनेवाला पुरुष ही मुक्त होता है । अतएव तृणसे लेकर देहादि शरीरतकके जितने स्थावर-जङ्गमस्वरूप विनाशशील पदार्थ हैं, उनमें तुमको रुचि नहीं करनी चाहिये । तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो और जो कुछ दान करते हो, उन सब क्रियाओंमें तुम वास्तवमें न कर्ता हो और न भोक्ता हो; क्योंकि तुम उन सबसे मुक्त और शान्तस्वरूप हो । जो महात्मा पुरुष हैं, वे न तो अतीतके विषयमें शोक करते हैं और न भविष्यके विषयमें चिन्ता ही करते हैं । वे तो वर्तमानकालमें जो कुछ न्याययुक्त कर्म प्राप्त हो जाता है, उसीका उचितरूपमें सम्पादन करते हैं । श्रीराम ! तृष्णा, मोह, मद आदि जितने त्याज्य भाव हैं वे सब मनमें ही स्थित रहते हैं, इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको अपने विवेक-विचारयुक्त मनके द्वारा ही मनसहित उनका विनाश कर देना चाहिये; क्योंकि जैसे अति तीक्ष्ण लोहेसे लोहा काटा जाता है, वैसे ही सब भ्रमोंकी शान्ति-के लिये अति तीक्ष्ण विवेक-विचारयुक्त मनसे दोषसहित मन काटा जाता है ।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—मुनिनायक ! जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंमें व्यापक और अनवच्छिन्न जो तुर्यरूप है, उसका विशेषरूपसे विवेचन करते हुए बतलाइये ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! जो असक्त, सम और स्वच्छ स्वरूपस्थित है वही तुर्य है । जिसमें जीवन्मुक्त पुरुषोंकी स्थिति है, जो स्वच्छ, समरूप और शान्त है तथा जो व्यवहारकालमे साक्षीरूप है, वही तुर्यावस्था कही