संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्राप्त होते हैं। 'पुत्र-कलत्र आदिका मैं सम्बन्धी हूँ और पुत्र, कलत्र आदि परिवार मेरा सम्बन्धी है तथा मैं ऐसा हूँ' इस प्रकारके मोहको जिन लोगोंने बुद्धिपूर्वक छोड़ दिया है, वे महानुभाव ऊँचेसे भी ऊँचे लोकको प्राप्त होते हैं। इसलिये राजन्! तुम अपने आप ही प्रकाशित होनेवाले चिन्मय परमात्माका शीघ्र ही आश्रय लेकर स्थित हो जाओ और समस्त जगत्को परिपूर्ण अनन्त विज्ञानानन्दघनरूप ही देखो। जिस समय तुम इस प्रकारके सर्वव्यापी, पूर्ण, चिन्मय परमात्माके स्वरूपको यथार्थरूपसे जान जाओगे, उसी समय संसारसे तर जाओगे और परब्रह्म हो जाओगे; क्योंकि जो पुरुष विज्ञानानन्दघन-स्वरूप हो गया है, जो संसाररूपी मृत्युसे पार हो चुका है और जिसका चित्त विलीन हो गया है, उस महापुरुषको जो परमानन्द प्राप्त होता है, उसकी उपमा किस आनन्दसे दी जा सकती है? इस परमात्माके स्वरूपको प्राप्त करनेपर अविद्या शान्त हो जाती है। फिर, उसके लिये ब्रह्मकी प्राप्तिके सिवा मोक्ष नामका न कोई देश है, न कोई काल है और न कोई स्थिति ही है; क्योंकि यह जो वासनारूपी अविद्या है, वह अहंकाररूपी मोहके विनाशसे विलीन हो जाती है और अविद्याका यह अभाव ही प्रसिद्ध मोक्ष है। जब योगीपुरुषकी अविद्या नष्ट हो जाती है, तब उसकी नाना प्रकारके शास्त्रार्थोंके विचारकी चञ्चलता शान्त हो जाती है। काव्य, नाटक आदि विषयोंकी उत्कण्ठा नष्ट हो जाती है और उसके सारे विकल्प-विभ्रम विलीन हो जाते हैं। वह केवल शाश्वत और सम परमात्मस्वरूप होकर सुखपूर्वक स्थित रहता है।
जो वाणीसे अतीत ब्रह्ममें स्थित है तथा विषय-कामनासे रहित है, वह पुरुष संसारमें परम शोभासे सम्पन्न है। वह गम्भीर, प्रसन्न तथा निरन्तर परमात्माके आनन्दमें मत्त योगी स्वयं ही अपने आत्मस्वरूप परब्रह्ममें रमण करता रहता है। वह सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंका त्याग करनेवाला, ब्रह्मानन्दमें नित्य तृप्त और संसारके आश्रयसे रहित योगीपुरुष पुण्य-पाप और हर्ष-शोक आदि विकारोंसे लिपायमान नहीं होता, जनसमूहमें विचरण करता हुआ भी वह महाज्ञानी अपनी देहके छेदन या पूजनसे शोक या हर्षका अनुभव नहीं करता। उस ब्रह्मज्ञानी पुरुषसे प्राणियोंको उद्वेग नहीं होता। वह भी दूसरे प्राणियोंकी प्रतिकूल चेष्टासे उद्वेगवान् नहीं होता। वह ज्ञानीपुरुष अपने शरीरका किसी तीर्थमें त्याग कर दे या किसी चाण्डालके घरमें त्याग कर दे अथवा कभी भी शरीरका त्याग न करे या वर्तमान क्षणमें ही त्याग कर दे, फिर भी वह ज्ञानप्राप्तिकालमें पहलेसे ही अन्तःकरणसे रहित और जीवन्मुक्त हो चुका है। अहंकारकी भ्रान्ति बन्धनकारक है और ज्ञानसे अहंकारका नाश होकर मोक्ष-की प्राप्ति होती है। विभूति और वैभव चाहनेवाले पुरुष-को प्रयत्नपूर्वक उपयुक्त ज्ञानी महात्मा पुरुषकी पूजा, स्तुति, नमस्कार, दर्शन और अभिवादन करना चाहिये। प्रिय पुत्र ! जो सांसारिक दोषोंसे सर्वथा रहित हैं, उन जीवन्मुक्त आत्मज्ञानी सज्जनोंकी श्रद्धाभक्तिपूर्वक सेवा-पूजा करनेसे जो परम पवित्र पद प्राप्त होता है, वह न तो यज्ञों और तीर्थोंसे प्राप्त होता है एवं न तपस्याओं तथा दानोंसे ही।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं - श्रीराम ! यों कहकर मनु-भगवान् ब्रह्मलोकको चले गये और इक्ष्वाकु भी उस बोधरूप दृष्टिका अवलम्बन करके स्थिर हो गये।
(सर्ग १२०-१२२)