संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण * ५०५
योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण, योगभ्रष्ट पुरुषकी गति एवं महान् अनर्थकारिणी हथिनिरूप इच्छाके स्वरूप और उसके नाशके उपाय
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा— मुने ! सातों योगभूमिकाओंका अभ्यास कैसे किया जाता है तथा प्रत्येक भूमिकामें योगीके चिह्न किस तरहके होते हैं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! जीव चौरासी लाख योनियोंमें घूमता हुआ अन्तमें मनुष्य-जन्ममें भाग्योदय होनेपर विवेकी बन जाता है । 'अहो ! संसारकी यह व्यवस्था बिल्कुल असार है । इस व्यवस्थासे मुझे क्या प्रयोजन है ? इन व्यर्थ कर्मोंसे ही मैं अपना दिन क्यों बिता रहा हूँ ? मैं वैराग्यवान् बनकर किस तरह संसार-सागरको तैर जाऊँ'—इस प्रकारके विचारमें जब सद्बुद्धि प्राणी तत्पर होता है, तब उसके हृदयमें भोगों और सांसारिक सङ्कल्पोंमें हर समय वैराग्य रहता है । वह सत्सङ्ग, स्वाध्याय, ईश्वरोपासना आदि उत्तम क्रियाओंका अनुष्ठान करता है और उन्हींमें प्रसन्न रहता है । तुच्छ व्यर्थ चेष्टाओंमें उसे निरन्तर वैराग्य रहता है । वह दूसरोंके दोषोंको प्रकट नहीं करता और स्वयं यज्ञ, दान, तप, सेवा-पूजा आदि पुण्य कर्मोंका ही सेवन करता है । वह किसीके भी मनमें उद्वेग न पहुँचानेवाले शास्त्रविहित विनययुक्त कर्मोंका आचरण करता है, शास्त्रविपरीत कर्मसे सदा डरता रहता है और सांसारिक विषयभोगोंकी कभी अभिलाषा नहीं करता । वह स्नेह और प्रणयसे पूर्ण, कोमल, सत्य, प्रिय और हितकारक तथा देश-कालोचित वचन बोलता है । वह मन, कर्म एवं वाणीसे सत्पुरुषोंका संग और सेवा करता है । जिस-किसी जगहसे ज्ञानदायक शास्त्रोंको प्राप्त करके उनका विवेक-विचारपूर्वक स्वाध्याय करता है । संसार-सागरको तैर जानेके लिये इस प्रकारके विचारसे सम्पन्न पुरुष प्रथम 'शुभेच्छा' नामक भूमिकाको प्राप्त होता है । इसमें उसे आत्मोद्धारके सिवा और कोई भी इच्छा नहीं रह जाती । इसीको 'श्रवण' भूमिका भी कहते हैं ।
इसके बाद अधिकारकी प्राप्ति होनेपर वह 'विचार' नामक दूसरी योगभूमिकामें प्रवेश करता है । उस समय वह श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा, ध्यान और कर्मोंमें तत्पर रहनेवाले पुरुषोंमेंसे, जिन्होंने अध्यात्म-शास्त्रोंकी प्रशस्त व्याख्या करनेके कारण अच्छी ख्याति प्राप्त कर ली है, उन श्रेष्ठ विद्वानोंका आश्रय लेकर उनके उपदेशानुसार साधन करता है । वह आगमशास्त्रका श्रवण करके कार्य और अकार्यके स्वरूपको तत्त्वतः जान लेता है । वह मद, अभिमान, मात्सर्य, मोह और लोभको उसी तरह छोड़ देता है, जिस तरह साँप केंचुलको । उपर्युक्त यथार्थ निश्चयसे युक्त पुरुष सत् शास्त्र, गुरु और सज्जनोंकी सेवासे ब्रह्मविषयक रहस्यको विवेक-विचार-पूर्वक यथार्थरूपसे पूर्णतया जान लेता है और उसके अनुसार मनन करता है । वह अध्यात्मविषयक शास्त्रोंके वाक्यार्थमें अपनी बुद्धिको निश्चलतापूर्वक स्थापित करता है, तपस्वियोंके आश्रमोंमें निवास करता है, अध्यात्मशास्त्रोंकी कथाओंका मनन करता है तथा निन्दनीय संसारके विषय-भोगरूप पदार्थोंसे वैराग्य करके पत्थरकी चट्टानरूपी शय्यापर आसीन हो अपनी आयु बिताता है । अध्यात्म-विषयक सत्-शास्त्रोंके अध्ययन-मननरूप अभ्याससे तथा निष्काम पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे उस पुरुषको अध्यात्मविषयक यथार्थ दृष्टि प्राप्त हो जाती है । इस भूमिकाका नाम 'विचारणा' है । इसीको 'मनन' भी कहते हैं ।
तीसरी भूमिकामें पहुँचकर विवेकी पुरुष दो प्रकारके असङ्गका अनुभव करता है । श्रीराम ! तुम उसके इस भेदको सुनो । यह असङ्ग दो तरहका है--एक सामान्य और दूसरा श्रेष्ठ (विशेष) । 'मैं न कर्ता हूँ और न भोक्ता ही; मैं सांसारिक कर्मोंके लिये बाध्य नहीं हूँ और न दूसरोंके लिये बाधक हूँ।' इस प्रकारके निश्चयसे