संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विषयभोगोंकी आसक्तिसे रहित होना ही सामान्य असङ्ग है। 'सुख या दुःखकी प्राप्ति पूर्वकर्मके अनुसार निश्चित और ईश्वरके अधीन है अर्थात् ईश्वरके विधानके अनुसार होती है । इसमें मेरा कर्तृत्व कैसा ? ये विस्तृत विषयभोग अन्तमें संताप देनेवाले होनेके कारण महारोग हैं तथा ये सांसारिक सारी सम्पत्तियाँ परम आपत्तियाँ हैं । संयोगका अन्तमें वियोग निश्चित है और ये मनके सारे विकार बुद्धिकी व्याधियाँ हैं। सब पदार्थोंको ग्रास बना लेनेके लिये काल सदा तैयार रहता है।' इस तरह अध्यात्मविषयक वचनोंके अर्थमें संलग्र चित्तवाले पुरुषकी सम्पूर्ण पदार्थोंमें जो आन्तरिक मिथ्यात्वकी भावना है, वह भी सामान्य असङ्ग कहलाता है । इस पूर्वोक्त अभ्यासयोगसे, महापुरुषोंकी संगतिसे, दुर्जनोंकी संगतिके त्यागसे, आत्मज्ञानके प्रयोगसे तथा लगातार अभ्यासयोगद्वारा अपने पुरुष-प्रयत्नसे संसारसागरके पार, सबके सार, परम कारणभूत परमात्माके ध्यानकी स्थिति हस्तामलकवत् दृढ़रूपसे खूब स्पष्ट हो जानेपर जो नाम-रूपकी भावनासे रहित होकर 'न मैं कर्ता हूँ, न ईश्वर कर्ता है, न प्रारब्ध कर्ता है'—यों शान्त और मौनरूपसे स्थित रहना है वही श्रेष्ठ (विशेष) असङ्ग कहलाता है। तथा जो शान्त, आदि-अन्तसे रहित सुन्दर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है वही श्रेष्ठ असङ्ग कहा जाता है । यही श्रेष्ठ असङ्ग नामक तीसरी भूमिका है। इसीको 'निदिध्यासन' भी कहते हैं। इस भूमिकामें स्थित पुरुष सम्पूर्ण संकल्पोंकी कल्पनाओंसे शून्य होकर परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाता है ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! असत्कुलमें उत्पन्न, कामोपभोगमें ही प्रवृत्त, अधम तथा योगी महात्माके सङ्गसे रहित मूढ़ मनुष्यका उद्धार कैसे होगा ? तथा पहली, दूसरी, तीसरी भूमिकामें आरूढ होकर मरे हुए प्राणीकी कैसी गति होती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! प्रवृद्ध रागादि दोषों-वाले मूढ़ पुरुषको सैकड़ों जन्मोंके बाद जबतक काकतालीय न्यायसे या महापुरुषोंके सङ्गसे वैराग्य उत्पन्न नहीं हो जाता, तबतक उसका यह विस्तृत संसार रहता ही है अर्थात् बिना वैराग्यके उसका उद्धार होना कठिन है। वैराग्य उत्पन्न हो जानेपर प्रथम भूमिकाका उदय प्राणीको अवश्य होता है और तदनन्तर उसका संसार नष्ट हो जाता है, यही शास्त्रोंका परम सिद्धान्त है ! प्रथम आदि भूमिकाओंमें पहुँचकर मरनेवाले प्राणीका भूमिकाओंके अनुसार ही पूर्वजन्मका दुष्कृत नष्ट हो जाता है। तदनन्तर वह योगी देवताओंके विमानोंमें, लोकपालोंके नगरोंमें तथा सुमेरु पर्वतके वन-कुञ्जोंमें, अप्सराओंके साथ रमण करता है। उसके बाद पूर्वजन्ममें किये गये पुण्यों और पापोंका भोगसमूहोंके द्वारा नाश हो जानेपर वे योगी लोग पृथ्वीपर पवित्र, गुणवान् और लक्ष्मीवान् सज्जनोंके घरमें जन्म लेते हैं और वहाँ जन्म लेकर वे लोग पूर्वजन्मके योग-साधनके संस्कारोंके अनुसार योगका ही साधन करते हैं। वहाँपर पूर्व जन्ममें की गयी भावनाओंसे अभ्यस्त हुए योगभूमिकाओंके क्रमका स्मरण करके वे बुद्धिमान् लोग आगेके भूमिका-क्रमका भलीभाँति अभ्यास करने लग जाते हैं।
श्रीराम ! ये पूर्वोक्त तीनों भूमिकाएँ जाग्रत् कही गयी हैं; क्योंकि इन भूमिकाओंमें यथार्थ भेदबुद्धि रहनेसे यह सम्पूर्ण दृश्यसमूह उस जाग्रत्कालकी तरह ही दिखायी पडता है। इन तीनों भूमिकाओंमें योगयुक्त पुरुषोंमें केवल आर्यता (श्रेष्ठता) का उदय होता है, जिसे देखकर मूढ़बुद्धि पुरुषोंको भी मुक्त होनेकी अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोंका भलीभाँति सम्पादन करता है तथा शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंको सर्वथा नहीं करता है एवं सदाचारमें स्थित रहता है, वह आर्य कहा गया है । श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा आचरित, शास्त्रोक्त तथा मनको प्रिय और हितकर यथोचित व्यवहारोंको जो ग्रहण करता है, वह आर्य कहा गया है।