भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

५०६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विषयभोगोंकी आसक्तिसे रहित होना ही सामान्य असङ्ग है। 'सुख या दुःखकी प्राप्ति पूर्वकर्मके अनुसार निश्चित और ईश्वरके अधीन है अर्थात् ईश्वरके विधानके अनुसार होती है । इसमें मेरा कर्तृत्व कैसा ? ये विस्तृत विषयभोग अन्तमें संताप देनेवाले होनेके कारण महारोग हैं तथा ये सांसारिक सारी सम्पत्तियाँ परम आपत्तियाँ हैं । संयोगका अन्तमें वियोग निश्चित है और ये मनके सारे विकार बुद्धिकी व्याधियाँ हैं। सब पदार्थोंको ग्रास बना लेनेके लिये काल सदा तैयार रहता है।' इस तरह अध्यात्मविषयक वचनोंके अर्थमें संलग्र चित्तवाले पुरुषकी सम्पूर्ण पदार्थोंमें जो आन्तरिक मिथ्यात्वकी भावना है, वह भी सामान्य असङ्ग कहलाता है । इस पूर्वोक्त अभ्यासयोगसे, महापुरुषोंकी संगतिसे, दुर्जनोंकी संगतिके त्यागसे, आत्मज्ञानके प्रयोगसे तथा लगातार अभ्यासयोगद्वारा अपने पुरुष-प्रयत्नसे संसारसागरके पार, सबके सार, परम कारणभूत परमात्माके ध्यानकी स्थिति हस्तामलकवत् दृढ़रूपसे खूब स्पष्ट हो जानेपर जो नाम-रूपकी भावनासे रहित होकर 'न मैं कर्ता हूँ, न ईश्वर कर्ता है, न प्रारब्ध कर्ता है'—यों शान्त और मौनरूपसे स्थित रहना है वही श्रेष्ठ (विशेष) असङ्ग कहलाता है। तथा जो शान्त, आदि-अन्तसे रहित सुन्दर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है वही श्रेष्ठ असङ्ग कहा जाता है । यही श्रेष्ठ असङ्ग नामक तीसरी भूमिका है। इसीको 'निदिध्यासन' भी कहते हैं। इस भूमिकामें स्थित पुरुष सम्पूर्ण संकल्पोंकी कल्पनाओंसे शून्य होकर परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाता है ।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! असत्कुलमें उत्पन्न, कामोपभोगमें ही प्रवृत्त, अधम तथा योगी महात्माके सङ्गसे रहित मूढ़ मनुष्यका उद्धार कैसे होगा ? तथा पहली, दूसरी, तीसरी भूमिकामें आरूढ होकर मरे हुए प्राणीकी कैसी गति होती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! प्रवृद्ध रागादि दोषों-वाले मूढ़ पुरुषको सैकड़ों जन्मोंके बाद जबतक काकतालीय न्यायसे या महापुरुषोंके सङ्गसे वैराग्य उत्पन्न नहीं हो जाता, तबतक उसका यह विस्तृत संसार रहता ही है अर्थात् बिना वैराग्यके उसका उद्धार होना कठिन है। वैराग्य उत्पन्न हो जानेपर प्रथम भूमिकाका उदय प्राणीको अवश्य होता है और तदनन्तर उसका संसार नष्ट हो जाता है, यही शास्त्रोंका परम सिद्धान्त है ! प्रथम आदि भूमिकाओंमें पहुँचकर मरनेवाले प्राणीका भूमिकाओंके अनुसार ही पूर्वजन्मका दुष्कृत नष्ट हो जाता है। तदनन्तर वह योगी देवताओंके विमानोंमें, लोकपालोंके नगरोंमें तथा सुमेरु पर्वतके वन-कुञ्जोंमें, अप्सराओंके साथ रमण करता है। उसके बाद पूर्वजन्ममें किये गये पुण्यों और पापोंका भोगसमूहोंके द्वारा नाश हो जानेपर वे योगी लोग पृथ्वीपर पवित्र, गुणवान् और लक्ष्मीवान् सज्जनोंके घरमें जन्म लेते हैं और वहाँ जन्म लेकर वे लोग पूर्वजन्मके योग-साधनके संस्कारोंके अनुसार योगका ही साधन करते हैं। वहाँपर पूर्व जन्ममें की गयी भावनाओंसे अभ्यस्त हुए योगभूमिकाओंके क्रमका स्मरण करके वे बुद्धिमान् लोग आगेके भूमिका-क्रमका भलीभाँति अभ्यास करने लग जाते हैं।

श्रीराम ! ये पूर्वोक्त तीनों भूमिकाएँ जाग्रत् कही गयी हैं; क्योंकि इन भूमिकाओंमें यथार्थ भेदबुद्धि रहनेसे यह सम्पूर्ण दृश्यसमूह उस जाग्रत्कालकी तरह ही दिखायी पडता है। इन तीनों भूमिकाओंमें योगयुक्त पुरुषोंमें केवल आर्यता (श्रेष्ठता) का उदय होता है, जिसे देखकर मूढ़बुद्धि पुरुषोंको भी मुक्त होनेकी अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोंका भलीभाँति सम्पादन करता है तथा शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंको सर्वथा नहीं करता है एवं सदाचारमें स्थित रहता है, वह आर्य कहा गया है । श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा आचरित, शास्त्रोक्त तथा मनको प्रिय और हितकर यथोचित व्यवहारोंको जो ग्रहण करता है, वह आर्य कहा गया है।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण * ५०३

योगीकी वही आर्यता प्रथम भूमिकामें अङ्कुरित, द्वितीय भूमिकामें विवेकके द्वारा विकसित तथा तृतीय भूमिकामें संसारके असङ्ग और परमात्माके ध्यानरूप फलसे फलित होती है । इस तीसरी भूमिका (आर्यता) की प्राप्तिके बीचमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ योगी पुरुष शुभ संकल्पयुक्त भोगोंका चिरकालतक उपभोगकर पुनः योगी ही होता है। क्रमशः तीनों भूमिकाओंका अभ्यास करनेसे अज्ञानके नष्ट हो जानेपर वास्तविक ज्ञानका उदय होनेके बाद जब चित्त पूर्ण-चन्द्रोदयके सदृश हो जाता है, तब चौथी भूमिकामें पहुँचे हुए युक्तचित्त योगीलोग सम्पूर्ण जगत्‌में विभागसे तथा आदि और अन्तसे रहित समभावसे परिपूर्ण सच्चिदानन्द ब्रह्मका ही अनुभव करते हैं। द्वैतके सर्वथा शान्त हो जानेपर जब अद्वैत ही अचल रह जाता है तब चौथी भूमिकामें गये हुए योगीलोग समस्त संसारको स्वप्नके समान अनुभव करते हैं । इसलिये पूर्वोक्त तीन भूमिकाओंको तो जाग्रत् कहते हैं और चौथी भूमिकाको स्वप्न कहते हैं।

जो पुरुष पञ्चम भूमिकामें पहुँच गया है, वह केवल सत्स्वरूप ब्रह्म बनकर रहता है। इस अर्धसुषुप्त पञ्चम भूमिकाको प्राप्त करके पुरुष समस्त विकारोंसे मुक्त हो जाता है और अद्वैत परब्रह्मरूप तत्त्वमें नित्य स्थित हो जाता है। पाँचवीं भूमिकामें स्थित पुरुष अन्तर्मुख वृत्तिसे रहता है। बाह्य व्यापारमें लगा हुआ भी निरन्तर चारों ओरसे शान्त होनेके कारण तन्द्रामें स्थितके सदृश दिखायी देता है। वह कभी तो बाहरी व्यवहार करता है और कभी अटल समाधिमें स्थित रहता है। इस भूमिकामें वासनाशून्य होकर अभ्यास करता हुआ पुरुष क्रमशः तुर्या नामकी छठी भूमिकामें चला जाता है। उस भूमिकामें निर्विकल्प होनेके कारण योगी द्वैत और अद्वैतकी भावनासे रहित हो जाता है। वह चिज्जड-ग्रन्थिसे और संदेहसे रहित हो जाता है। वह वासनाओंसे रहित जीवन्मुक्त योगी चित्रलिखित प्रदीपकी भाँति निर्वाणको न प्राप्त हुआ भी निर्वाणको प्राप्त हुआ-सा स्थित रहता है। (उसको बाहरी ज्ञान नहीं रहता। किंतु दूसरोंके चेष्टा करनेपर बाह्य ज्ञान हो सकता है।) वह जीवन्मुक्त योगी बाहर और भीतरसे शून्य आकाशमें स्थित घटकी तरह बाहर-भीतर संसारसे रहित रहता है तथा सागरमें परिपूर्ण घटके समान बाहर-भीतर ब्रह्मसे परिपूर्ण रहता है। तदनन्तर छठी भूमिकामें स्थित हुआ वह योगी सातवीं भूमिकामें पहुँचता है। सातवीं योग-भूमिका विदेहमुक्ता कही गयी है। वह शान्तस्वरूप, वाणीसे अगम्य और सभी भूमिकाओंकी सीमा है।

शैव उसे शिव कहते हैं, वेदान्ती उसे ब्रह्म कहते हैं और साङ्ख्यवादी उसे प्रकृति और पुरुषका यथार्थ ज्ञान कहते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न लोगोंने अपनी बुद्धिके अनुसार अनेक रूपोंसे सप्तम भूमिकाकी भावना की है। यद्यपि यह भूमिका सर्वथा उपदेशयोग्य नहीं है, तथापि किसी तरह इसका उपदेश किया ही जाता है। (इस भूमिकामें स्थित योगीको दूसरोंके द्वारा चेष्टा करनेपर भी संसारका ज्ञान नहीं होता।) श्रीराम ! ये सातों भूमिकाएँ मैंने तुमसे कह दीं। इनके अभ्यासयोगसे मनुष्य सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित हो जाता है। धीरे-धीरे चलनेवाली अत्यन्त मदोन्मत्त, लड़ाई करनेमें सदा तत्पर, अपने बड़े-बड़े दाँतोंमें ख्यातिको प्राप्त करनेवाली तथा अनन्त अनर्थोंको पैदा करनेवाली एक हथिनी है। उसे यदि किसी तरह मार दिया जाय तो मनुष्य इन उपर्युक्त समस्त भूमिकाओंमें विजयी बन सकता है। वह मदोन्मत्त हथिनी जबतक पराक्रमसे जीत नहीं ली जाती, तबतक कौन ऐसा धीर योद्धा है, जो उपर्युक्त भूमिका-पङ्क्तिरूपी समरभूमियोंमें प्रवेश करनेमें भी समर्थ हो !

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! वह प्रमत्त हथिनी कौन है, वे समरभूमियाँ कौन हैं, वह कैसे मारी जाती है तथा वह चिरकालतक कहाँ रमण करती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! 'मुझसेयह मिट जाय,'

५०८* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

ऐसी जो 'इच्छा' है, उसीका नाम हथिनी है। वह शरीर-रूपी जंगलमें रहती है और मत्त होकर अनेक तरहके शोक, मोह आदि विकारोंको उत्पन्न करनेमें लगी रहती है। मत्तवाले इन्द्रियोंके समूह ही उसके उग्र प्रकृतिके बच्चे हैं। वह जीभसे मनोहर भाषण करती है, शुभाशुभ कर्मरूपी दो दाँतोंसे युक्त वह मनरूपी गहन स्थानमें लीन रहती है। चारों ओर दूरतक फैले हुए वासनाओं-का समूह ही इस हथिनीका मद है। और श्रीराम ! संसार-की स्मृतियाँ इसकी युद्धभूमियाँ हैं। यहाँपर पुरुष बार-बार जय और पराजयका अनुभव करता है। यह इच्छा नामवाली हथिनी लोभी मनुष्योंको मारती है। वासना, इच्छा, मनन, चिन्तन, सङ्कल्प, भावना और स्पृहा इत्यादि इसके नाम हैं। यह अन्तःकरणरूपी कोशके अंदर रहती है। बहुत दूरतक फैली हुई तथा सब पदार्थोंमें निवास करनेवाली इस इच्छारूपी हथिनीपर अवहेलनापूर्वक 'धैर्य' नामक सर्वश्रेष्ठ अस्त्रसे प्रहार करके सब प्रकारसे विजय प्राप्त कर लेनी चाहिये।

'यह वस्तु मुझे इस प्रकार प्राप्त हो जाय !' यह इच्छा जबतक अन्तःकरणके भीतर प्रकट रहती है, तभीतक यह महाभयंकर कुत्सित संसार रूपी महाविषसे उत्पन्न विषूचिकादूपी महामारी बनी रहती है। 'यह मुझे मिल जाय' यह जो संकल्परूप इच्छा है, बस, यही संसार है तथा इसका शान्त हो जाना ही मोक्ष है, यही ज्ञानका सार है। इच्छारहित विशुद्ध अन्तःकरणमें महापुरुषोंके पवित्र और सात्त्विक प्रसन्नता पैदा करनेवाले हितमय उपदेश दर्पणमें तैल-बिन्दु की भाँति जम जाते हैं। एकमात्र विषयोंके स्मरणका परित्याग कर देनेसे इच्छारूपी संसारका अङ्कुर उत्पन्न नहीं होता। विषके तुल्य अनेक प्रकारका अनर्थ पैदा करनेवाली इस इच्छाको तनिक-सी बढ़ते ही विषयोंके विस्मरणरूप शस्त्रसे काट डालना चाहिये। इच्छासे युक्त जीवात्मा दीनताको कभी भी नहीं छोड़ सकता। सुन्दर असंवेदनमें यानी उत्तम रूपसे विषयोंका स्मरण न होनेमें श्रेष्ठ प्रयत्न यही है कि चित्त अपने अंदर संकल्पोंसे रहित होकर मृतककी तरह स्थित रहे।

'यह मुझे मिल जाय' इस तीव्र इच्छाको ही उत्तम पुरुष 'संकल्प' कहते हैं और जो संसारके पदार्थोंकी भावना से रहित होना है, उसीको 'संकल्पका त्याग' कहते हैं। श्रीराम ! सङ्कल्पको ही तुम स्मरण समझो। और विस्मरण (संकल्पके अभाव) को विद्वान्लोग कल्याण-रूप समझते हैं। सङ्कल्पमें पहलेके अनुभव किये हुए पदार्थोंकी तथा भविष्यमें होनेवाले पदार्थोंकी भी भावना की जाती है। मै ऊपर हाथ उठाकर बार-बार ऊँचे स्वरसे चिल्लाकर यह कह रहा हूँ, किंतु इसे कोई सुनता नहीं कि संकल्पत्याग ही परम श्रेयका सम्पादक है। इसकी भावना लोग अपने हृदयमें क्यों नहीं करते ?

श्रीराम ! सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनके व्यापारोंसे रहित और ध्यान-समाधिमें लीन वेश हुआ पुरुष उस परम पदको प्राप्त करता है, जहाँ एकच्छत्र साम्राज्य भी तृणके सदृश तुच्छ है। इस विषयमें अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता है ? संक्षेपसे मैं इतना ही कहता हूँ कि संसारका सङ्कल्प ही सबसे बढ़कर बन्धन है और उस संकल्पका अभाव ही मोक्ष है। संसारके स्मरणके अभावको ही स्वाभाविक 'चित्त-विनाशस्वरूप योग' कहते हैं और वह अक्षय योग शान्तरूपसे नित्य स्थित है। श्रीराम ! शिव, सर्वव्यापी, शान्तिमय, चिन्मय, अज और कल्याणरूप ब्रह्मके साथ जो जीव-ब्रह्मके एकत्वका निश्चय है, वही वास्तविक सर्वत्याग है। श्रीराम ! अहंता-ममताकी भावना रखनेवाला मनुष्य दुःखसे कभी छुटकारा नही पाता; किंतु अहंता-ममताकी भावना से रहित हुआ मनुष्य मुक्त हो जाता है।

(सर्ग १२६)

निर्वाण-प्रकरण पू०] * भरद्वाज मुनिके प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा उपदेश * ५०९


भरद्वाज मुनिके उत्कण्ठापूर्वक प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा जगत्की असत्ता और परमात्माकी सत्ताका प्रतिपादन करते हुए कल्याणकारक उपदेश

श्रीभरद्वाजजीने पूछा—गुरो ! निश्चय ही श्रीरामभद्र तो परम योगी, सबके वन्दनीय, देवताओंके भी ईश्वर, जन्म-मरणसे रहित, विशुद्ध ज्ञानमय, समस्त उत्तम गुणोंकी खान, समस्त ऐश्वर्योंके आधार तथा तीनों लोकोंके उत्पादन, रक्षण एवं अनुग्रह करनेवाले थे । उन ब्रह्मानन्दसे परिपूर्ण पूर्णज्ञानी और विशुद्धबुद्धि रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामभद्रने मुनिवर वसिष्ठजीके द्वारा उपदिष्ट इस अति प्राचीन समस्त ज्ञानरूपी सारका श्रवण कर क्या और भी कुछ पूछा था ?

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! वसिष्ठ मुनिके वेदान्तशास्त्रके सङ्ग्रहरूप वचनोंका श्रवण कर अखिल विज्ञानोंके ज्ञाता कमललोचन श्रीरामभद्र अपने चिन्मय आनन्द-स्वरूपमें स्थित रहे । उस समय वे प्रश्न, उत्तर और विभाग आदि करनेकी पद्धतिसे उपरत हो गये थे । उनका चित्त आनन्दरूप अमृतसे पूर्ण था । वे चिन्मय और सर्वव्यापी होनेके कारण अपने मङ्गलमय स्वरूपमें ही समभावसे नित्य स्थित थे । अतः उन्होंने उस समय वसिष्ठजीसे कुछ भी नहीं पूछा ।

श्रीभरद्वाजजीने पूछा—मुनिनायक ! कहाँ तो मेरे-जैसे मूर्ख, स्तब्ध, अल्पज्ञ, पापी और कहाँ ब्रह्मा आदि देवता भी जिसकी आकाङ्क्षा करते हैं—उन भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी अपने स्वरूपमें स्थिति ! मुनीश्वर ! अहो ! मैं किस प्रकार परमात्मपदमें विश्राम पा सकूँगा और इस दुस्तर संसाररूपी महासागरके मोहरूपी जलसे किस प्रकार पार हो सकूँगा ? यह शीघ्र मुझसे कहिये ।

श्रीवाल्मीकिजी बोले—शिष्य ! श्रीवसिष्ठजीके द्वारा कथित आरम्भसे अन्ततक सम्पूर्ण राम-वृत्तान्त, मैंने तुमको सुना दिया, अब तुम अपनी बुद्धिसे पहले विवेकपूर्वक विचारकर पीछे उसका मनन करो । मैं भी इस विषयमें तुमसे जो वर्णन करने योग्य रहस्य है, उसे कहता हूँ, सुनो । भद्र ! यह जो यहाँ संसाररूप अविद्या-प्रपञ्च दीख रहा है, वह तनिक भी सत्य नहीं है। अर्थात् समस्त संसाररूप प्रपञ्च सर्वथा मिथ्या ही है । विवेकी पुरुष वास्तविक तत्त्वको विवेचनपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं, किंतु अविवेकी मनुष्य वाद-विवाद करते रहते हैं । प्रिय मित्र ! वास्तवमें सच्चिदानन्द परमात्मासे अतिरिक्त कोई वस्तु ही नहीं है अतः प्रपञ्चसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है ? मैं तुमसे आगे जो वेदान्तशास्त्रोंके रहस्य बतलाता हूँ, उनके अभ्याससे तुम अपने चित्तको परम विशुद्ध बना डालो।

मित्र ! यह जो संसाररूप प्रपञ्च दीखता है, इसके मूलमें भी सत्ताका अभाव ही है और इसके अन्तमें भी सत्ताका अभाव ही है । मध्यकालमें भी विचार करनेपर इसकी कोई सत्ता न होनेके कारण केवल प्रतीतिमात्र ही है । अतः विवेकी पुरुष इस संसारमें किसी तरहका विश्वास नहीं करते; क्योंकि अनादि वासनाके दोषसे ही यह असत् संसार दिखायी देता है । इसका गन्धर्वनगरके सदृश मिथ्या स्वरूप है और यह अनेक प्रकारके भ्रमोंसे भरा है। भद्र ! तुम चिन्मय कल्याणरूपी अमृत-लताका अभ्यास न कर विषय-वासनारूपी विषलताका आश्रय कर क्यों व्यर्थ मोहमें फँसे हो ? सखे ! यह समस्त जगत् न तो आरम्भमें है और न अन्तमें ही है । इसलिये तुम यह भी समझ लो कि मध्यमें भी यह है ही नहीं । इस जगत्का सारा वृत्तान्त स्वप्न-जैसा है। अज्ञानमूलक ये सारे भेद जलमें बुद्बुदोंकी तरह क्षण-क्षणमें उत्पन्न होते रहते हैं; और अज्ञानका नाश होते ही एकमात्र ज्ञानरूप समुद्रमें विलीन हो जाते हैं । अकेला अज्ञानरूपी समुद्र ही समस्त जगत्को व्याप्त करके स्थित है। इस समुद्रमें

५१० * अविच्छिन्नसंविदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अविद्यारूप वायुसे उत्पन्न सबसे बड़ा यह 'अहम्' नामक तरङ्ग है। उन-उन विषयोंमें चित्तके गिरनेके जो नाना प्रकार हैं, उनके हेतुभूत राग आदि दोष इस समुद्रके छोटे-छोटे कल्पित तरङ्ग हैं। ममता ही इसमें आवर्त है, जो स्वतः ही इच्छानुसार प्रवृत्त होता रहता है। इस समुद्रमें राग और द्वेष बड़े-बड़े मगर हैं, उन्हीं दो मगरोंसे मनुष्य पकड़ लिया जाता है और उसका निश्चय ही अनर्थरूपी पातालमें प्रवेश हो जाता है। यह प्रवेश किसीसे भी रोका नहीं जा सकता। भद्र ! प्रशान्त तथा अमृतरूप तरङ्गोंसे पूर्ण केवल आनन्दामृतके समुद्रमें ही प्रवेश करना चाहिये। व्यर्थ द्वैतरूप मकरोंसे पूर्ण लवणसागरके तरङ्गोंमें क्यों प्रवेश करते हो ?

प्रसिद्ध परमात्माका जो सूक्ष्म तत्त्व है, वह अज्ञानी लोगोंके लिये अज्ञानसे आवृत रहता है। इसलिये जैसे साधारण मनुष्यको जलमें स्थल और स्थलमें जलका भ्रम हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी मनुष्योंको अनात्मामें आत्माका और आत्मामें अनात्माका भ्रम हो जाता है। मित्र ! वास्तवमें न तो असद् वस्तुकी उत्पत्ति होती है और न सद् वस्तुका कभी अभाव होता है। केवल मायाद्वारा रचित चित्र-विचित्र रचनाओंके ये आविर्भाव और तिरोभाव होते रहते हैं। इसलिये प्रचण्ड बने हुए अज्ञानकी इस व्यामोह-शक्तिको विशुद्ध सत्त्वके बलसे जीतकर विश्वासयुक्त मनसे अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि साधनोंका अनुष्ठान करो। इसके अनन्तर ध्यान-समाधिके द्वारा अपने-आप ही परमात्माके शुद्ध स्वरूपका अनुभव करो, जिसके द्वारा अज्ञानसे आच्छादित तुम्हारी बुद्धिरूपी रात्रि दिनके रूपमें परिणत हो जाय। केवल पुरुष-प्रयत्नरूप कर्मोंसे महेश्वरकी कृपा प्राप्त होनेपर ही मनुष्य प्राप्तव्य वस्तु परमपदरूपी परमात्माकी प्राप्ति कर लेते हैं। भरद्वाज ! तुम अपने विवेकसे इस मोहका स्पष्टरूपसे त्याग कर दो। फिर तो तुम असाधारण परमात्माके यथार्थ ज्ञानको प्राप्त कर लोगे। इसमें संदेह नहीं है। पुत्र ! कामना और आसक्ति होनेपर शत्रुरूप हुए जिस पुण्यकर्मसे तुम्हें इस प्रकारका बन्धन प्राप्त हुआ है, कामना और आसक्तिसे रहित होनेपर मित्ररूप हुए उसी पुण्यकर्मसे ज्ञानके द्वारा तुम मोक्ष पा जाओगे; क्योंकि रागादि दोषोंसे रहित सज्जनोंका यह सत्कर्मोंका संवेग प्राणियोंके पूर्वजन्मके पापोंको नष्ट करता हुआ उनके त्रिविध तापोंको वैसे ही शान्त कर देता है, जैसे वर्षाका जलसमूह दावानलको ।

मित्र ! संसारचक्रके आवर्तरूपी भ्रममें यदि तुम भ्रमण करना नहीं चाहते तो सारे काम्य-कर्मोंको छोड़कर केवल ब्रह्ममें आसक्त हो जाओ । ब्रह्ममें प्रीति न होकर जबतक बाह्य विषयोंमें आसक्ति है, तभीतक विकल्पसे उत्पन्न हुआ यह सब जगत् दिखायी देता है। जैसे जलके तरङ्गयुक्त होनेपर ही समुद्र अपने तटकी ओर जाकर उससे टक्कर खा करके विक्षिप्त होता है, जलके निश्चल रहनेपर तो वह केवल जलरूप ही दिखायी देता है। इसी प्रकार ब्रह्ममें चित्तकी स्थिरता होनेपर केवल ब्रह्म ही दिखायी देता है। किंतु जैसे समुद्रकी तरङ्गोंसे तृण विचलित रहते हैं, वैसे ही जो हर्ष और शोकसे विचलित हो जाते हैं, वे लोग श्रेष्ठ नहीं माने जाते । सखे ! वह सारा जीवसमूह हर्ष-विषाद आदि अवस्थारूप झूलेपर निरन्तर आरूढ़ है। इसे राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह आदि रूप छः झूलोंमें झुलाकर काल क्रीडा करता है। अतः इसमें तुम खिन्न क्यों हो रहे हो ? इस तरह क्रीडा करनेवाला काल ही अनेक उपायोंसे एकके पीछे एक अनेक सृष्टियोंको उत्पन्न करता है, विनाश करता है, फिर तत्काल ही उत्पन्न करता है और फिर विनाश करता है। जब देवगण भी दुष्ट कालके पिण्डसे छुटकारा नहीं पाते, तब क्षणभङ्गुर विनाशशील शरीरोंकी तो बात ही क्या ! इसीलिये भरद्वाज ! अनेक तरङ्गोंसे युक्त इस जगत्को क्षणभङ्गुर देखकर ज्ञानी पुरुष तनिक भी

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका वर्णन * ५११


शोक नहीं करता। अतः तुम अमङ्गलस्वरूप शोकको छोड़ दो, कल्याणकारी वस्तुओंका विचार करो और विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माका चिन्तन करो। जो पुरुष देव, द्विज और गुरुओंके ऊपर परिपूर्ण श्रद्धा रखकर निर्मल चित्तवाले हो गये हैं और जो वेदादि सत्-शास्त्रोंमें विश्वासपूर्वक प्रामाण्य बुद्धि रखते हैं, उन पुरुषोंके ऊपर परमात्माका परम अनुग्रह होता है।

भरद्वाजजीने कहा—भगवन् ! आपके प्रसादसे मैंने पूर्णरूपसे ब्रह्म और जगत्का सारा तत्त्व जान लिया। वैराग्यरूप साधनसे बढ़कर दूसरा कोई बन्धु नहीं है और संसारकी प्रीतिसे बढ़कर दूसरा कोई शत्रु नहीं है। अब मैं महाराज वसिष्ठजीद्वारा समस्त ग्रन्थमें कहे गये ज्ञानरूपी रहस्यका सम्पूर्ण निचोड़ थोड़े शब्दोंमें सुनना चाहता हूँ। कृपाकर कहिये।

श्रीवाल्मीकिजी बोले—भरद्वाज ! मुक्ति देनेवाले इस महान् ज्ञानको तुम सुनो। इसके केवल सुननेसे ही तुम फिर संसाररूपी सागरमें नहीं डूबोगे। जो देव वास्तवमें एक होता हुआ भी ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि भेदोंसे अनेक प्रकारका होकर स्थित है, उस सच्चिदानन्द-रूप परमात्माको नमस्कार है। जब सारे प्रपञ्चका अपने कारणमें लय किया जाता है, तब जिस उपायसे परम तत्त्व प्रकाशित होता है, उस उपायको तुम्हें संक्षेपमें भूमिके अनुसार कहता हूँ। अपने अन्तःकरणमे तरङ्गरूपसे ही विचार करना चाहिये। इसीसे वह परमात्मा प्राप्त किया जा सकता है। उसके प्राप्त होनेपर पुरुष फिर शोक नहीं करता। सत्सङ्ग और सत्-शास्त्रसे प्राप्त विवेक-से वैराग्ययुक्त होकर पुरुषको उसी तत्त्वका बार-बार चिन्तन करना चाहिये। ( सर्ग १२७ )


श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका और भरद्वाजजीके द्वारा अपनी स्थितिका वर्णन, वाल्मीकिजी-द्वारा मुक्तिके उपायोंका कथन, श्रीविश्वामित्रजीद्वारा भगवान् श्रीरामके अवतार ग्रहण करनेका प्रतिपादन एवं ग्रन्थश्रवणकी महिमा

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! निषिद्ध कर्म, सकाम कर्म तथा विषयोंके साथ इन्द्रियोंके सम्बन्धसे जनित सुख-भोगसे रहित शम, दम और श्रद्धासे युक्त पुरुष कोमल आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको जीत करके तबतक ॐकारका उच्चारण करता रहे, जब-तक मन पवित्र और प्रसन्न न हो जाय। तदनन्तर अपने अन्तःकरणकी विशुद्धिके लिये प्राणायाम करे और उसके बाद विषयोंसे इन्द्रियोंको धीरे-धीरे खींच ले। देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और क्षेत्रज्ञ इनमें जिस-जिसकी जिस-जिससे उत्पत्ति हुई है, उस-उसको जानकर उन-उनके उपादानकारणमें उन सबको विलीन कर दे। पहले अपने-आपको चराचर विश्वमें अनुभव करे। इसके बाद सारे विश्वको अपने आत्माके अंदर अनुभव करे; फिर विवेकके द्वारा इसका भी अभाव करके केवल आत्मामें ही

सं० यो० व० अं० १८—

स्थित रहे। तदनन्तर प्रकृतिसहित जगत्के स्वरूपमें आत्मभावना करे। इसके पश्चात् परम कारणरूप चैतन्य निर्विशेष निराकार शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मामें आत्मभावना करे।

(अब देह, इन्द्रिय आदिमें जिसकी जिससे उत्पत्ति हुई है, उसका उसमें लय करनेका प्रकार बतलाते हैं—) अपने स्थूल देहके मांस आदि, जो पार्थिव भाग हैं उनका पृथिवीमें, रक्त आदि जो जलीय भाग हैं उनका जलमें तथा जो तैजस भाग हैं उनका अग्निमें विवेकके द्वारा विलय कर दे। व्यष्टि प्राणवायुका महावायु-में और आकाश-अंशका आकाशमें लय कर दे। अपने श्रोत्रेन्द्रियका दिशाओंमें और त्वगिन्द्रियका विद्युत्में लय कर दे। चक्षुरिन्द्रियका सूर्यमें तथा रसनेन्द्रियका उसके देवता वरुणमें (एवं घ्राणेन्द्रियका अश्विनीकुमारोंमें) लय

५१२* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

कर दे। समष्टि प्राणका वायुमें, वाणीका अग्निमें और हस्तेन्द्रियका इन्द्रमें लय कर दे। अपने पादेन्द्रियका विष्णुमें तथा गुदा-इन्द्रियका मित्रमें लय कर दे। उपस्थेन्द्रियका कश्यपमें लय करके मनका चन्द्रमामें लय कर दे। बुद्धिका ब्रह्मामें लय कर दे। मित्र ! इन्द्रियोंके रूपमें देवता ही स्थित हैं। इनका मैं तुम्हें तत्त्वोपदेश-द्वारा लय करनेका आदेश श्रुति-वाक्यको प्रमाण मानकर ही दे रहा हूँ। मैंने अपने मनसे किसी तरहकी कोई कल्पना करके इन अर्थोंको तुम्हारे सामने प्रकट नहीं किया है। इस तरह अपनी देहको उसके कारणमें विलीन करके 'मैं विराट् हूँ' ऐसा चिन्तन करे। (इसके बाद पूर्वोक्त क्रमसे परमात्मामें आत्मभावना करे।) सारे ब्रह्माण्डके भीतर जो यह सदाशिवरूप परमात्मा व्यापक है, वही सम्पूर्ण भूतोंका आधार तथा कारण कहा गया है। वही परमात्मा जगत्‌के व्यवहारमें यज्ञके रूपमें स्थित है।

(अब पृथ्वी आदि भूतोंके लयका क्रम बतलाते हैं—) योगीको चाहिये कि वह पृथ्वीका जलमें लय करके उस जलको फिर तेजमें लीन कर दे। तेजको वायुमें विलीन करके उस वायुको फिर आकाशमें विलीन कर दे और आकाशका समस्त भूतोंकी उत्पत्तिके कारणभूत महाकाशमें लय कर दे। योगी उस महाकाशमें एकमात्र लिङ्गशरीर धारण किये हुए स्थित रहे। वासनाएँ, सूक्ष्मभूत, कर्म, अविद्या, दस इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—इन सबको पण्डितलोग लिङ्गशरीर कहते हैं।* तदनन्तर वह योगी बाहर निकलकर वहाँ 'मैं शुद्ध आत्मा हूँ' यों चिन्तन करे। फिर वह बुद्धिमान् योगी सूक्ष्म और निराकार अव्याकृत प्रकृतिमें अपने लिङ्गशरीरको भी विलीन करके स्थित रहे। जिसमें यह समस्त जगत् रहता है वह अव्यक्त अव्याकृत (माया) नाम और रूपसे रहित है। उसीको कोई प्रकृति, कोई माया तथा कोई परमाणु एवं कोई अविद्या कहते हैं। उस अव्याकृतमें प्रलयकालमें सभी प्राणीपदार्थ लयको प्राप्त होकर अव्यक्त-रूपसे अवस्थित रहते हैं। जबतक दूसरी सृष्टि नहीं होती तबतक वे सभी प्राणी-पदार्थ परस्परके सम्बन्धसे शून्य तथा आस्वादसे रहित होकर उस अव्याकृत (प्रकृति) स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं और प्रलयके अनन्तर सृष्टिकालमें फिर उसी प्रकृतिभूत अव्याकृतसे सब उत्पन्न हो जाते हैं। सर्गके आदिमें प्रकृतिसे अनुलोम-क्रमसे सृष्टि होती है और प्रलयके आरम्भमें प्रतिलोम-क्रमसे प्रकृतिमें सारी सृष्टि विलीन हो जाती है। इसलिये जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनो अवस्थाओंसे रहित होकर अविनाशी तुरीय पदकी प्राप्तिके लिये ब्रह्मका ध्यान करे। पूर्वोक्त प्रकारसे लिङ्गशरीरको भी कारणमें विलीन करके स्वयं सच्चिदानन्द परमात्मामें प्रविष्ट हो जाय।

श्रीभरद्वाजजीने कहा—महाराज ! मैं अब लिङ्गशरीर-रूपी बेड़ीके बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो गया हूँ और सच्चिदानन्दका अंश होनेसे सच्चिदानन्द ब्रह्ममें प्रविष्ट हो गया हूँ। अंश और अंशीका वस्तुतः अभेद होनेके कारण अब मैं समस्त उपाधियोंसे रहित परब्रह्म परमात्मा ही हूँ। मैं कूटस्थ, शुद्ध और व्यापक हूँ। जैसे जलमें छोड़ा हुआ जल, दूधमें छोड़ा हुआ दूध और घीमें छोड़ा हुआ घी—सब-के-सब विनष्ट न होते हुए ही तद्रूप हो जाते हैं, किसी पृथक्‌रूपसे गृहीत नहीं होते, वैसे ही सर्वभावसे नित्य आनन्दस्वरूप सर्वसाक्षी, परम कारण चेतन परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट होकर मैं तद्रूप ही हो गया हूँ। नित्य, सर्वव्यापी, शान्त, सर्वदोषरहित, अक्रिय, शुद्ध, परब्रह्म परमात्मा मैं ही हूँ। पुण्य और पापसे रहित, जगत्‌का परम कारण अद्वितीय, आनन्दमय, अविनाशी और चिन्मयस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही मैं हूँ। इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त, प्रकृतिके सत्त्व, रज, तम—तीनों गुणोंसे अतीत, सर्वव्यापक और


* वासना भूतसूक्ष्माश्च कर्माविद्ये तथैव च ॥
दशेन्द्रियमनोबुद्धिरेतल्लिङ्ग विदुर्बुधाः।
(नि० पू० १२८ । १८-१९)

८-त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास और उनके गृह, नगर, देश, लोक एवं त्रिलोकके साम्राज्यकी कल्पनाका विस्तार

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका वर्णन * ५१३

सर्वस्वरूप ब्रह्मका निष्काम भावसे अपने कर्त्तव्यका पालन करते हुए सदा ध्यान करना चाहिये । इस रीतिसे परब्रह्मविषयक अभ्यास करनेवाले पुरुषका मन ब्रह्ममें विलीन हो जाता है और मनके विलीन हो जानेपर उसे स्वयं ही अपने आत्मस्वरूपका अनुभव हो जाता है । आत्माका अनुभव होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका अन्त होकर आत्मामें आनन्दका अनुभव होने लगता है तथा आत्मा स्वयं ही अपने-आप अपने परमानन्द परमात्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है। तदनन्तर 'मुझसे अतिरिक्त कोई दूसरा सच्चिदानन्दमय परमात्मा नहीं है। मैं ही अद्वितीय परब्रह्म हूँ'—इस प्रकार हृदयमें परमात्माका अनुभव हो जाता है । गुरो ! आपके द्वारा कहा गया यह सब ज्ञान मुझे अवगत हो गया। मेरी बुद्धि सर्वथा निर्मल हो गयी । अब मेरा यह संसार चिरकाल-तक स्थिर नहीं रह सकता । भगवन् ! अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि ज्ञानियोंके लिये कौन-सा कर्म विहित है ? क्या उन्हें कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करना चाहिये और यदि करना चाहिये तो क्या केवल प्रवृत्तिरूप कर्मोंका ही अनुष्ठान करना चाहिये या निवृत्तिरूप कर्मोंका भी ?'

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—मुमुक्षु पुरुषोंको वही कर्म करना चाहिये, जिसमें कोई दोष नहीं हो, विशेष करके मुमुक्षुको काम्य और निषिद्ध कर्म कभी नहीं करना चाहिये । संकल्पोंसे रहित होकर जब जीवात्मा ब्रह्मके लक्षणोंसे युक्त हो जाता है, तब उसकी सभी इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं और वह सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मस्वरूप बन जाता है। 'देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे परे जो जीवात्मा है उससे भी परे जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है, वही मैं हूँ' इस प्रकार निश्चयपूर्वक जब जीवात्मा एकत्वभावसे ध्यान करता है, तब वह सदाके लिये मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है । जब जीवात्मा कर्तृत्व, भोक्तृत्व और ज्ञातृत्वसे तथा सम्पूर्ण देहादि उपाधियोंसे एवं सुख और दुःखोंसे रहित होता है, तब वह सर्वथा मुक्त समझा जाता है । जब जीवात्मा सम्पूर्ण भूतोंमें आत्माको तथा आत्मामें सम्पूर्ण भूतोंको अभेदरूपसे देखने लगता है, तब यह जीवात्मा संसारसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित होकर जब जीवात्मा तुरीय आत्मानन्द-रूपमें प्रवेश करता है, तब वह सर्वथा मुक्त समझा जाता है; क्योंकि शास्त्रोंके विवेकपूर्वक विचारसे, गुरुके वाक्योंका अर्थ और भाव यथार्थ समझनेसे तथा श्रवण, मनन, निदिध्यासनके अभ्याससे सब प्रकारसे सिद्धि प्राप्त होती है अर्थात् वह सदाके लिये मुक्त हो जाता है, यह वेदोंका आदेश है। इसलिये भरद्वाज ! तुम सब कुछ छोड़कर केवल ध्यान समाधिके लिये अभ्यासमें अपना मन तत्परतापूर्वक स्थिर करो । जब महामना साधु-स्वभाव श्रीरामचन्द्रजी अपने ब्रह्मरूपमें समाधिरथ थे, उस समय ऋषियोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजीसे श्रीविश्वामित्रजी कहने लगे ।

श्रीविश्वामित्रजीने कहा — ब्रह्मपुत्र महाभाग वसिष्ठजी! आप महान् हैं । आपने अपना गुरुत्व शीघ्र ही हमलोगोंको दिखला दिया; क्योंकि अपने दर्शन, स्पर्श और वाक्यप्रयोगसे जो कृपा करके शिष्यके शरीरमें शिव-स्वरूप परमात्मभावका समावेश करा दे, वही सच्चा गुरु है । गुरुवाक्य-श्रवणसे होनेवाले ज्ञानमें शिष्यकी श्रद्धा-पूर्वक पवित्र बुद्धि ही कारण है । यह ज्ञानकी प्राप्ति ही गुरु और शिष्यके समागमका वास्तविक प्रयोजन है । विभो ! आप तो परमपदमें स्थित हैं, परंतु हमलोग अभीतक यज्ञादि कार्योंमें लगे हुए हैं । बड़े कष्टके साथ जिसके लिये मैंने स्वयं राजा दशरथसे प्रार्थना की है और जिस उद्देश्यसे मैं यहाँ आपके पास आया हूँ, उस मेरे निर्विघ्न यज्ञसिद्धिरूप कार्यका स्मरण करते हुए आप श्रीरामचन्द्रजीको अब समाधिसे उठानेकी कृपा कीजिये । मुने ! मेरे उस समस्त कार्यको आप अपने शुद्ध मनसे व्यर्थ

५१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


न बनाइये, क्योंकि भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके समाधिसे उठनेपर उनके अवतारके जो अन्य प्रयोजन, देवताओं और ऋषियोंके कार्य हैं, उनका भी हमलोग सम्पादन कर लेंगे। जब मैं श्रीरामचन्द्रजीको अपने आश्रममें ले जाऊँगा, तब वे राक्षसोंका नाश करेंगे और उसके बाद अहल्याको शापसे मुक्त करेंगे। तदनन्तर निश्चयपूर्वक भगवान् शङ्करका धनुष तोड़कर जनकदुलारी सीताके साथ अपना विवाह करेंगे। इस संसारमें पिता-पितामहके राज्यका त्यागकर वनवासके निमित्त वनमें पहुँचकर अभय और निःस्पृह श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंका वध करके दण्डकारण्यके निवासी मुनियो, अनेक तीर्थों तथा अन्यान्य प्राणियोंका उद्धार करेंगे। सीताहरणके निमित्त रावण आदिका वध करके श्रीरामचन्द्रजी इन्द्रके वरदानद्वारा युद्धमें मरे हुए वानर आदिको पुनर्जीवित हुए दिखलायेंगे। तदनन्तर साध्वी सीताकी अग्निमें प्रवेशके द्वारा शुद्धिके उद्देश्यसे भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अपने चरित्रकी आदर्शता दिखलायेंगे। जो लोग भगवान् श्रीरामका दर्शन करेंगे, उनके चरित्रका स्मरण तथा श्रवण करेंगे एवं जो लोग भगवान्‌के स्वरूपका दूसरोंको बोध करायेंगे, उन सम्पूर्ण अवस्थाओंमें स्थित अपने भक्तोंको भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जीवन्मुक्ति प्रदान करेंगे। इस प्रकार तीनों लोकोंका तथा मेरा भी हित इन महापुरुष भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा सम्पूर्णरूपसे सम्पन्न होगा। सज्जनो! आप सब लोग इन भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार कीजिये। इनके नमस्कारसे ही आपलोग सारे संसारको जीत लेंगे अर्थात् आपलोगोंको किसी दूसरे साधनकी आवश्यकता न होगी। आपलोग चिरकालतक बढ़ते रहें।

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! इस प्रकारका विश्वामित्रजीका भाषणरूप श्रीरामचन्द्रजीकी भावी चरित्ररूप दुर्लभ कथा सुनकर श्रीवसिष्ठ आदि सभी श्रेष्ठ योगीन्द्र तथा सिद्ध पुनः भगवान् श्रीरामकी चरणकमलरजके आदरमें यानी नमस्कारमें तथा उनके स्मरण में स्थित हो गये। जानकीपति श्रीरामकी भावी कथा सुननेसे भगवान् वसिष्ठजी तथा और दूसरे महर्षि भी तृप्त नहीं हो सके। इसलिये उन सबने दूसरोंके द्वारा 'कहे गये उन गुणसागर भगवान्‌के गुणोंका पुनः श्रवण किया तथा सुने हुए गुणोंका दूसरोंसे वर्णन किया। तदनन्तर महर्षि भगवान् वसिष्ठजी मुनिवर विश्वामित्रजीसे कहने लगे।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—मुनि विश्वामित्रजी ! इन श्रोताओंको आप साफ-साफ बतला दीजिये कि ये राजीवलोचन रघुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पूर्वमें देव या मनुष्य क्या थे।

श्रीविश्वामित्रजीने कहा—सज्जनो! आप सब लोग इन्हीं श्रीरामचन्द्रजीमें विश्वास कीजिये कि परमपुरुष परब्रह्म परमात्मा ये ही हैं। इन्होंने ही विश्वके कल्याणके लिये विष्णुरूपसे क्षीरसागरका मन्थन किया था। गूढ़ अभिप्रायसे भरे उपनिषदादि शास्त्रोंके तत्त्वगोचर साक्षात् परब्रह्म ये ही हैं। परिपूर्णपरमानन्द, समस्वरूप, श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित भगवान् विष्णुरूप यही श्रीरामचन्द्रजी जब भक्तिसे भलीभाँति प्रसन्न होते हैं, तब सब प्राणियोंको परम पुरुषार्थरूप मोक्ष देते हैं। कुपित होकर यही श्रीरामचन्द्रजी शिवरूपसे संसारका संहार करते हैं और यही ब्रह्मारूपसे विनाशशील संसारकी रचना करते हैं। यही विश्वके आदि, विश्वके उत्पादक, विश्वके धाता, पालनकर्ता तथा महासखा भी हैं। यही भगवान् ऋक्, यजु., सामवेदमय हैं, तीनों गुणोंसे परे अति गहन यही हैं और शिक्षा, कल्प आदि छः अङ्गोंसे समन्वित वेदात्मा अद्भुत पुरुष भी यही हैं। विश्वका पालन करनेवाले चतुर्भुज विष्णुभगवान् यही हैं, विश्वके रचयिता चतुर्मुख ब्रह्मा यही हैं और सारे संसारका संहार करनेवाले त्रिलोचन भगवान् शिव भी यही हैं। ये अजन्मा होते हुए भी

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका वर्णन * ५१५


अपनी योगमायाके सम्बन्धसे अवतार लेते हैं। ये सबसे महान् हैं। ये सदा जागते रहते हैं और रूपरहित हुए भी ये विश्वरूप हैं। ये भगवान् ही इस विश्वको अपने संकल्पसे धारण करते हैं। ये राजा दशरथजी धन्य हैं, जिनके पुत्र परमपुरुष परमात्मा हुए। वह दशग्रीव रावण भी धन्य है, जिसका ये अपने चित्तसे चिन्तन करेंगे। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले विष्णुभगवान् ही श्रीरामचन्द्रजीके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। ये ही श्रीरामचन्द्रजी सच्चिदानन्दघन अविनाशी परमात्मा हैं। अपनी इन्द्रियोंको रोक रखनेवाले योगीलोग ही श्रीरामचन्द्रजीको वस्तुतः जानते हैं। हमलोग तो इनके इस सगुण साकार स्वरूपका ही निरूपण या दर्शन करनेमें समर्थ हैं। वसिष्ठजी! हमलोगोंने ऐसा सुना है कि ये ही भगवान् श्रीरामचन्द्रजी रघुवंशके पापोंका सर्वथा विनाश करनेवाले हैं। अब आप कृपाकर इन्हें व्यवहारमें लगाइये।

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज! यों कहकर महामुनि विश्वामित्रजी चुपचाप बैठ गये। तदनन्तर महातेजस्वी वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीसे कहने लगे।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—चिन्मय महापुरुष महाबाहु श्रीराम! यह विश्रामका समय नहीं है। उठो और इस संसारके लिये आनन्दकारक बनो। पुत्र! विनाशशील राज्य कार्योंका अवलोकन करके देवताओं और मुनियोंको संकटसे उद्धार करनेके भारका वहन करो और सुखी रहो।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! गुरु वसिष्ठजीके उपर्युक्त वचनोंको सुनकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी समाधिसे सचेत हो गये और सावधान होकर कहने लगे।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—महामुने! वेदों, आगमों, पुराणों और स्मृतियोंमें भी गुरु-वाक्यका पालन करना ही विधि कहा गया है और उसके विरुद्ध आचरण करना निषेध कहा गया है। यों कहकर उन महात्मा वसिष्ठजीके चरणोंमें अपने सिरसे नमस्कार कर सबके आत्मस्वरूप करुणासागर श्रीरामचन्द्रजी सबसे बोले—'सभ्य पुरुषो! आप सब लोग हमारे इस निर्णयको अच्छी तरह सुन लीजिये। इससे आपलोगोंका बड़ा कल्याण होगा। कल्याणकामी पुरुषके लिये इस संसारमें परमात्मज्ञान तथा परमात्मज्ञानी गुरुसे बढ़कर कुछ भी नहीं है।'

सिद्ध आदि सब लोगोंने कहा—श्रीरामचन्द्रजी! आप जैसा कह रहे हैं, वैसा ही आपकी दयासे हमलोगोंके मनमें पहलेसे ही स्थित है और अब तो वह सब आपके इस संवादसे और भी विशेष दृढ़ हो गया है। महाराज श्रीरामचन्द्रजी! आप सुखी होइये, आपको नमस्कार है। अब हमलोग वसिष्ठजीसे भी अनुमति लेकर जहाँसे आये थे, वहीं जा रहे हैं।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! यों कहकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुति करते हुए वे सब-के-सब चल दिये। श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर पुष्पोंकी वृष्टि होने लगी। श्रीरामचन्द्रजीकी यह सब कथा मैंने तुमसे कह सुनायी। इसी क्रमयोगसे तुम भी साधन करते हुए सुखी रहो। मुनिवर वसिष्ठजीकी वचन-पंक्तिरूपी रत्नमालासे विभूषित यह जो श्रीरामचन्द्रजीकी कथा मैंने तुमसे कही है, वह सम्पूर्ण कवियों और योगियोंके लिये सेवनयोग्य है तथा परम गुरुकी दयादृष्टिसे वह मुक्तिमार्गको देती है। जो कोई मनुष्य वसिष्ठजी और श्रीरामचन्द्रजीके इस संवादको प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक सुनेगा, वह किसी अवस्था में रहते हुए भी एकमात्र श्रवणसे ही मुक्त हो जायगा और परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेगा।

(सर्ग १२८)

निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध सम्पूर्ण

निर्वाण-प्रकरण ( उत्तरार्ध )

कल्पना या संकल्पके त्यागका स्वरूप, कामना या संकल्पसे शून्य होकर कर्म करनेकी प्रेरणा, दृश्यकी असत्ता तथा तत्त्वज्ञानसे मोक्षका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जब पुरुष देह, प्राण आदिमें अहंता, ममता आदि कल्पनाओंको त्याग देगा, तब फिर उससे कोई भी कर्म नहीं बन सकता। ऐसी दशामें शरीरके भरण-पोषणकी चेष्टासे भी विरत हो जानेके कारण उस देहधारी जीवका शरीर शीघ्र ही गिर सकता है। अतः जीवित पुरुषके लिये यह कल्पना-त्यागपूर्वक व्यवहार कैसे सम्भव है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जीवित पुरुषके लिये ही कल्पनाओंका त्याग सम्भव है। जो जीवित नहीं है, उसके लिये नहीं। इस कल्पना-त्यागका यथार्थ स्वरूप क्या है, यह बतलाता हूँ, सुनो। कल्पना-के स्वरूपको जाननेवाले विद्वान् अहम्भावना ( आत्माको देहमात्र मान लेने ) को ही कल्पना कहते हैं तथा आत्माको आकाशके समान अपरिमित, अनन्त और व्यापक जानकर परमात्माके वास्तविक स्वरूपका निरन्तर चिन्तन करना ही तत्त्वज्ञ पुरुषोंके मतमें कल्पनाका या संकल्पका त्याग कहलाता है। संकल्पशून्य होकर चुपचाप स्थित रहनेसे ही उस परमपदकी प्राप्ति होती है, जहाँ उच्च कोटिका साम्राज्य भी तिनकेके समान तुच्छ प्रतीत होता है। समस्त कर्म और उनके विस्तृत फलोंको सोये हुए पुरुषकी भाँति सर्वथा भूलकर प्रारब्धा-नुसार प्राप्त हुए कार्यके लिये संकल्पशून्य होकर मनुष्यको चेष्टा करते रहना चाहिये। अपने कर्मोंमें यदि वासना-रहित प्रवृत्तिका अभ्यास हो जाय तो यही उच्चकोटिका धैर्य है, जो भावी जन्मरूपी ज्वरका निवारण कर देता है। वासना और संकल्पसे शून्य होकर प्रारब्धवश प्राप्त हुए कार्यका अनुसरण करते हुए चाकके ऊपर घूमनेवाले घट आदिकी भाँति धीरे-धीरे उपरत होते हुए कर्मोंमें लगे रहना चाहिये।

सम, शान्त, कल्याणमय, सूक्ष्म, द्वित्व और एकत्वसे रहित, सर्वत्र व्यापक, अनन्त तथा शुद्धस्वरूप परब्रह्म परमात्माके प्राप्त होनेपर किसलिये कौन खिन्न हो सकता है ? जो पुरुष संकल्पशून्य और शान्त हो गया है अर्थात् जिसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति हो गयी है, उसे अपने शरीरके रहने या न रहनेसे कोई प्रयोजन नहीं है तथा इस लोकमें किसी कर्मके किये जाने अथवा न किये जानेसे भी उसका कोई, किञ्चित् मात्र भी प्रयोजन नहीं है। रघुनन्दन ! जैसे सुवर्ण ही कड़े और बाजूबन्दके रूपमें प्रतीत होता है; किंतु वास्तवमें सुवर्णसे पृथक् इन आभूषणोंके नामरूप-की सत्ता नहीं है, उसी प्रकार यह जो कुछ जगत्रूपमें दिखायी देता है, प्रतीतिमात्र ही है। परमात्मासे पृथक् इसकी सत्ता नहीं है। परमात्मासे भिन्न इसकी सत्ताका अनुभव न होनेको ही ज्ञानी पुरुषोंने इस जगत्का नाश माना है। जगद्-भ्रमका निवारण हो जानेपर इसके अधिष्ठानरूपसे अवशिष्ट जो परमात्मा है, वही परमार्थ सत्य है।

श्रीरामजीने पूछा—प्रभो ! 'मैं' और 'मेरा' इत्यादि जो दृश्य है, उसको असत् मानकर उसका चिन्तन न करनेवाले ज्ञानी पुरुषको कर्मोंके त्यागसे कौन-सा अशुभ और कर्मोंके सम्पादनसे कौन-सा शुभ फल प्राप्त होता है।

श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! जबतक देहरूपी उपाधि विद्यमान है, तबतक इस भावनामय सूक्ष्म कर्मका क्या त्याग हो सकता है और क्या अनुष्ठान । देहके रहते हुए यह जीव-चेतन बाह्य और आभ्यन्तर जिस-जिस वस्तुकी भावना करता है, वह-वह तत्काल उसको

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * समूल कर्मत्यागके स्वरूपका विवेचन * ५१७


प्रतीत होने लगती है। भले ही, उसका आकार सत्य हो या भ्रमसे भरा हुआ असत्य। यदि वह किसी वस्तु-की भावना नहीं करता तो इस संसार-भ्रमसे पूर्णतया मुक्त हो जाता है। वह भ्रम सत्य हो या असत्य, इस विचारसे क्या प्रयोजन है ? बोध होनेके पश्चात् इस दृश्यकी प्रतीतिके स्वयं ही लय हो जानेसे जो इसका अत्यन्ताभाव सिद्ध होता है, उसीको जगत्‌का त्याग, अनासक्ति एवं मोक्ष माना गया है। इसलिये जबतक यह शरीर विद्यमान है, तबतक कर्मोंका सर्वथा त्याग नहीं हो सकता। परंतु जो अज्ञानी कर्मका आदर करते हैं, वे उनके मूलको नहीं छोड़ते हैं। मनका जो वासनात्मक सङ्कल्प है, वही अपने कर्मका मूल है। जबतक यह शरीर है, तबतक ज्ञानके बिना उस मानसिक सङ्कल्पका उच्छेद नहीं हो सकता। परंतु जो तत्त्वज्ञानके द्वारा मनके संकल्पोंका निवारण कर देता है, वह संसाररूपी वृक्षका मूलोच्छेद कर डालता है। (सर्ग १-२)

समूल कर्मत्यागके स्वरूपका विवेचन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब यह सर्व-सम्मत सिद्धान्त है कि न तो असत् वस्तुकी सत्ता हो सकती है और न सत्-वस्तुका अभाव ही, तब दृश्य विषयोंके प्रति उत्सुकताका निवारण स्वयं सुगम होजाता है। (क्योंकि दृश्यकी असत्ताका प्रतिपादन किया जा चुका है। जो वस्तु है ही नहीं, उसका चिन्तन कोई समझदार मनुष्य कैसे करेगा ?) विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह अपने शुभाशुभ कर्मको नष्ट कर दे। आत्माके साथ कर्मका कोई सम्बन्ध नहीं है। आत्मा कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनोंसे रहित है। इस तत्त्वज्ञानके द्वारा कर्मोंका नाश स्वतः सिद्ध हो जाता है। समस्त कर्मोंके मूलभूत मानसिक संकल्पका विनाश करनेसे संसार पूर्णतः शान्त हो जाता है। जब कर्मके मूल कारणका भलीभाँति विचार किया जाता है, तब समस्त कर्मोंका अभाव अपने-आप ही सिद्ध हो जाता है। (क्योंकि जब चित्त और उसका सङ्कल्प ही मिथ्या है, तब उससे होनेवाला कर्म सत्य कैसे हो सकता है ?) अथवा चिन्मय आत्मा अपने भीतर जिस चित्त नामक कर्मबीजका—क्रिया, करण और कर्त्तारूप त्रिपुटीका निर्माण करता है, वह उस आत्मासे किञ्चिन्मात्र भी भिन्न नहीं है। इसलिये बाहर और भीतर (जाग्रत् तथा स्वप्न-सुषुप्तिमें) जो पदार्थोंकी प्रतीति होती है, वह आत्म-स्वरूप ही है, आत्मासे भिन्न नहीं है।

किंतु वास्तवमें रघुनन्दन ! सम्पूर्ण कर्मोंका विस्तार यह शरीर है। उसका मूल अहंकार है और शाखा-प्रशाखाएँ संसार। चिन्तन या भावनाका जहाँ बाध हो जाता है, उस अहंकारशून्य स्थितिसे इस संसारका मूलोच्छेद हो जानेके कारण वह उसी तरह शान्त हो जाता है, जैसे स्पन्दनशून्य वायु। जैसे नदीके प्रवाहमें पड़ा हुआ तृण-काष्ठ आदि सब कुछ स्वभावतः बहता रहता है, उसी प्रकार ज्ञानियोंकी कर्मेन्द्रियोंसे किसी प्रकारके मनोविकारके बिना ही अर्धसोये पुरुषकी भाँति स्वाभाविक चेष्टा होती रहती है। वासनाशून्य निरतिशय ब्रह्मानन्दके प्राप्त हो जानेपर विषय-सुख अत्यन्त नीरस हो जाते हैं। फिर न वे बाहर अपना प्रभाव डाल पाते हैं, न भीतर। विषयों और वासनाओंसे रहित, शान्त और ब्रह्मानन्द-अनुसंधानसे हीन जो सङ्कल्परहित स्थिति है, उसीको कर्मत्याग कहते हैं। दीर्घकालके भूले हुए कर्मकी भाँति विषयोंका पुनः स्मरण न होना कर्मत्याग कहलाता है। जो मिथ्या ज्ञान रखनेवाले पुरुष मूल-त्यागके बिना केवल कर्मेन्द्रिय-संयमरूप त्याग करते हैं, वे मूढ़ पशु तुल्य हैं। उनको वह कर्मत्यागरूपिणी पिशाची खा जाती

५१८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * - [संक्षिप्त योगवासिष्ठ


है। किंतु जो मूलसहित कर्मत्यागके द्वारा शान्ति पा चुके हैं, उनके लिये इस जगत्‌में किसी कर्मके करने या न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है। जिसका समूल त्याग कर दिया जाता है, वही वास्तवमें त्याग है। मूलका उच्छेद किये बिना जो ऊपरसे कर्मका त्याग किया जाता है, वह वृक्षकी जड़ न काटकर उसकी शाखा काटनेके समान व्यर्थ है। जिस कर्मरूपी वृक्षकी जड़ न काटकर केवल शाखामात्रका उच्छेद किया जाता है, वह पुनः सहस्रों शाखाओंसे विस्तारको प्राप्त हो केवल दुःख देनेके लिये बढ़ता रहता है। प्रिय रामभद्र ! संकल्पशून्यता-रूप त्यागसे ही वास्तवमें कर्मत्याग सिद्ध होता है, दूसरे किसी क्रमसे नहीं। ज्ञानके द्वारा कर्मत्यागके सिद्ध हो जानेपर वासनारहित जीवन्मुक्त पुरुष घरमें रहे या वनमें, दीन-हीन अवस्थाको पहुँच जाय या लौकिक उन्नतिको प्राप्त हो, उसके लिये सभी अवस्थाएँ एक-सी हैं। जिसका चित्त शान्त है, उस पुरुषके लिये घर ही दूरवर्ती निर्जन वन है। परंतु जिसका चित्त शान्त नहीं है, उस पुरुषके लिये निर्जन वन भी जनसमुदायसे भरा हुआ नगर है। (सर्ग ३)


संसारके मूलभूत अहंभावका आत्मबोधके द्वारा उच्छेद करके परमात्मस्वरूपसे स्थित होनेका उपदेश

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— रघुनन्दन ! चेतन आत्माके स्वरूपका तत्त्वतः बोध प्राप्त होनेपर जब अहंता आदिके साथ ही सम्पूर्ण जगत् शान्त हो जाता है, तब तेल समाप्त होनेपर बुझे हुए दीपककी भाँति सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चका त्याग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं। 'कर्मोंका त्याग त्याग नहीं है। 'जहाँ जगत्‌का भान ही नहीं है, वह एकमात्र शुद्ध आत्मा ही अहंता आदि विकारोंसे रहित एवं अविनाशी है।'—इस प्रकारका बोध ही वास्तविक त्याग कहा गया है। 'यह स्त्री, पुत्र, धन आदि सब मेरे हैं, यह शरीर, इन्द्रिय आदि ही मैं हूँ,' इस प्रकारकी अहंता-ममताका सर्वथा अभाव होनेपर जो शेष रहता है वही कल्याणमय, शान्त, बोधस्वरूप परमात्मा है। उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है। परमात्माके यथार्थ ज्ञानके द्वारा अहंताका क्षय हो जानेपर ममताका आधारभूत सारा संसार ही विनष्ट हो जाता है। फिर सर्वत्र परिपूर्ण एकमात्र शान्तस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही स्थित रहता है।

अहंकारकी भावना करनेवाला जीवात्मा एकमात्र अहं-भावनाका त्याग कर देनेमात्रसे बिना किसी विघ्न-बाधाके शान्तस्वरूप हो जाता है। यह मुक्ति इतने ही मात्र साधनसे सिद्ध हो जाती है। तब फिर संसारमें भटक-कर व्यर्थ कष्ट क्यों उठाया जाय ? 'मैं देह आदि नहीं हूँ। विशुद्ध चेतनमात्र हूँ।' इस बुद्धिको भी यदि कोई द्वैतभ्रम ही कहे तो उसके लिये यह उत्तर है कि यह बुद्धि परमार्थ-स्वभावको छोड़कर और कुछ भी नहीं है। चिन्मय परमात्मा तो आकाशके समान विशद है। उसमें भ्रम कहाँ ठहर सकता है ? न भ्रम है, न भ्रमका साधन है, न भ्रमका फल है और न भ्रमका कोई आश्रय ही है। यह जो कुछ दिखायी देता है, सब अज्ञानजनित ही है। ज्ञानका प्रकाश होते ही यह अज्ञानजन्य अन्धकार नष्ट हो जायगा। यह जो सब ओर फैला हुआ प्रपञ्च दृष्टिगोचर होता है, वास्तवमें यह है ही नहीं, केवल एक शान्तस्वरूप परमात्मा ही है।

निर्वाण-प्रकरण उ०] * उपदेशके अधिकारीका निरूपण करते हुए भुशुण्ड और विद्याधरका संवाद * ५१९

जो अपने अंदरकी मनोवृत्तिको जीत रहा है या जीत चुका है, वही विवेकका पात्र है और उसे ही पुरुष कहते हैं; क्योंकि उसीने पुरुषार्थ करके अपना जीवन सफल किया है। जब मनुष्य अस्त्र-शस्त्रोंकी मार और रोगोंकी पीड़ाएँ भी सह लेता है, तब 'मैं यह शरीर आदि नहीं हूँ' इतनी-सी भावनामात्रको सह लेनेमें कौन-सा कष्ट है; क्योंकि संसारके जितने पदार्थ हैं, उन सबका अङ्कुर (कारण) अहंभाव ही है। इसलिये ज्ञानके द्वारा उस अहंभावका उन्मूलन हो जानेपर संसार-की जड़ अपने आप उखड़ जाती है। जैसे मुँहसे निकली हुई भाप निःसार होनेपर भी सारवान् स्वच्छ दर्पणको मलिन कर देती है और उसके मिट जानेपर वह दर्पण पुनः स्वच्छ हो जाता है, उसी प्रकार इस अहंमात्ररूपी निःसार बाष्पसे भी सारवान् परमात्मारूपी दर्पण मलसे आवृत-सा हो जाता है; किंतु उस अहंभावके शान्त होते ही शुद्ध स्वच्छरूपसे प्रकाशित होने लगता है। अहंभावशून्य परब्रह्म परमात्मामें विलीन हुई यह अहंता भी ब्रह्मरूप ही हो जाती है, अतः उसका पृथक् कोई नाम रूप नहीं रह जाता। अहंकार ही इस जगत्‌का बीज है। परंतु ज्ञानाग्निके द्वारा जब वह अहंकाररूपी बीज दग्ध हो जाता है, तब जगत् और बन्धन इत्यादिकी कल्पना ही नहीं रह जाती।

वह परब्रह्म परमात्मा सत्स्वरूप और कल्याणमय है। जैसे घट-बुद्धिसे घटमें एकदेशिता होनेपर मृत्तिकाके स्वरूपका विस्मरण हो जाता है, उसी प्रकार अहंतासे परमात्माके स्वरूपकी विस्मृति हो जाती है। अहंकाररूपी बीजसे ही यह दृश्य-प्रपञ्चकी सत्ता-रूपिणी लता उत्पन्न हुई है, जिसमें अनन्त जगतरूपी फल पैदा होते और नष्ट होते रहते हैं। नित्य परमात्म-तत्त्वके ज्ञानसे जब अहंकारको सर्वथा नष्ट कर दिया जाता है, तब यह संसाररूपिणी मृगतृष्णा सर्वथा शान्त हो जाती है। निष्पाप रघुनन्दन ! किसी दूसरे सहायक साधनोंके बिना ही अपने प्रयत्नमात्रसे सिद्ध होनेवाली अहंभावकी निवृत्तिके सिवा मुझे दूसरा कोई कल्याणकारी साधन नहीं दिखायी देता। (सर्ग ४)


उपदेशके अधिकारीका निरूपण करते हुए वसिष्ठजीके द्वारा भुशुण्ड और विद्याधरके संवादका उल्लेख—विद्याधरका इन्द्रियोंकी विषयपरायणताके कारण प्राप्त हुए दुःखोंका वर्णन करके उनसे अपने उद्धारके लिये प्रार्थना करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--रघुनन्दन ! जैसे स्वच्छ निर्मल वस्तुपर तेलकी एक बूँद भी पड़ जाय तो अपना प्रभाव डाल देती है, उसी प्रकार शुद्ध चित्तवाले पुरुषको दिया हुआ थोड़ा-सा भी उपदेश उसपर अपना प्रभाव डाल देता है। परंतु जिनका चित्त अहंभावके कारण बड़ा हुआ है, उन्हें दिया हुआ उपदेश उसी तरह लागू नहीं होता, जैसे दर्पणमें मोती नहीं घुस सकता। इस विषयमें विद्वान्‌लोग इस प्राचीन इतिहास-का उदाहरण दिया करते हैं, जिसे बहुत दिन पहले सुमेरु पर्वतके शिखरपर भुशुण्डजीने मुझसे कहा था।

प्राचीन कालकी बात है, सुमेरु पर्वतके शिखरकी एक एकान्त गुफामें किसी समय अध्यात्मचर्चाके प्रसङ्गमें मैंने भुशुण्डजीसे पूछा—'भुशुण्डजी ! यह तो बताइये, कौन ऐसा मूढ़बुद्धि, आत्मज्ञान-शून्य तथा चिरंजीवी पुरुष है, जिसका आपको स्मरण है ?' प्रिय श्रीराम ! मेरे इस प्रकार पूछनेपर भुशुण्डजीने यह उत्तर दिया।

५२० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भुशुण्डजी बोले—महर्षे ! पूर्वकालमें लोकालोकान्तर पर्वतकी चोटीपर एक विद्याधर रहता था। उसकी इन्द्रियाँ उसके वशमें नहीं थीं। इसके कारण उसे बड़ा खेद था। अतएव वह सूख-सा गया था। यद्यपि उसे आत्मतत्त्वका ज्ञान नहीं था, तथापि वह श्रेष्ठ और विचारशील था। उसने अनेक प्रकारसे तप किये थे, यम और नियमोंका पालन किया था। इससे उसकी आयु कभी क्षीण नहीं होती थी। इसीलिये वह पहले चार कल्पोंतक जीवित रहा। तदनन्तर चौथे कल्पके अन्तमें उचित कारण-सामग्री जुट जाने अर्थात् चिरकालसे अभ्यस्त तप और नियम आदिका प्रभाव पड़नेसे उसके भीतर विवेकका उदय हुआ। उसने सोचा--'बारंबार जन्म, बारंबार मरण और बारंबार वृद्धावस्थाकी प्राप्ति न हो, इसका क्या उपाय है। अबतक संसारबन्धनसे मुक्त न होनेके कारण मुझे लज्जा होती है; अतः ऐसी कौन-सी एक वस्तु है, जो सदा निर्विकारभावसे स्थित रहती है।' यों सोचकर पाँच प्राण, दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा स्थूलशरीर--इन अठारह अवयवोंसे युक्त अपनी पुरीको चिरकालतक धारण करनेसे विरक्त-चित्त होकर वह विद्याधर कुछ पूछनेके लिये मेरे पास आया। अब उसे संसारमें कोई रस नहीं मिल रहा था। मेरे समीप आकर उसने बड़े आदरके साथ मुझे नमस्कार किया, तब मैंने भी उसका आतिथ्य-सत्कार किया। तत्पश्चात् अवसर पाकर उसने यह उत्तम बात कही।

विद्याधरने कहा—भुशुण्डजी ! जो परम उदार, दुःखहीन, क्षय और वृद्धिसे वर्जित तथा आदि और अन्तसे रहित है, उस पावन पदका आप मुझे शीघ्र उपदेश दीजिये। महर्षे ! इतने समयतक मैं जडस्वरूप बनकर मोहकी प्रगाढ निद्रामें सोया हुआ था। अब तीव्र वैराग्यके कारण अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे मैं जाग उठा हूँ। मनके महान् रोग कामसे मैं बहुत पीड़ित हूँ। अज्ञानकी वृत्तियों और दुर्वासनाओंमें पड़कर क्षुब्ध हूँ। मेरी चेष्टाओंका अन्त होना बहुत कठिन हो रहा है। अहम्भावके रूपमें स्थित जो मोह है, उससे आप मेरा

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * उपदेशके अधिकारीका निरूपण करते हुए भुशुण्ड और विद्याधरका संवाद * ५२१

शीघ्र उद्धार कीजिये। पहले सहस्रों बार उपभोगमें लाये हुए शब्दादि विषयोंसे ही अत्यन्त तुच्छ सुखके लिये जो इन्द्रियोंद्वारा सम्पर्क स्थापित किया जाता है, वह अपने आपको धोखा देना है। ऐसी विडम्बनाओंसे बारंवार ठगे जाकर मनुष्य चिरकालसे अत्यन्त खिन्न रहते हैं। विषय-भोग आरम्भमें रमणीय प्रतीत होते हैं। किंतु वे क्षणमें ही नष्ट हो जानेवाले हैं। उनमें शीघ्र ही विकार पैदा हो जाता है। वे संसारबन्धनके हेतु हैं; अतएव बड़े भयकर हैं।

मेरा नेत्र सुन्दर रूप निहारनेके लिये अत्यन्त चञ्चल तथा सुन्दरी नारीका मुँह देखनेके लिये लालायित रहता था। बाह्य और आभ्यन्तर प्रकाशकी सहायतासे मनको दूषित करनेके लिये विषयोंके साथ सम्बन्ध स्थापित करके इसने मुझे भारी दुःखमें डाल दिया। नारीके शरीरमें जो ये वस्त्र और आभूषण आदि हैं, ये ही उसकी शोभा बढ़ा रहे हैं, वास्तवमें वह रक्त-मांस आदि- का पिण्ड है। इस तरहका विचार न करके केवल रूपमात्रका अनुसरण करनेके स्वभावसे युक्त होनेके कारण ये नेत्र अयोग्य विषयकी ओर भी दौड़ पड़ते हैं।

तात ! यह घ्राणेन्द्रिय इस संसारमें अनर्थकी प्राप्तिके लिये ही चारों ओर दौड़ लगा रही है। तेज दौड़नेवाले घोड़ेकी भाँति इसे मैं रोक नहीं पाता हूँ। मेरी यह रसना शास्त्रके अनुसार भक्ष्याभक्ष्यका विचार न करके चिरकालसे नाना प्रकारके रसोंका आस्वादन कर रही है। इसने मुझे गजराजों और गीदड़ोंसे भरे हुए दुःखके पहाड़ोंपर चढ़ाकर बड़ा तंग किया है। जैसे ग्रीष्म ऋतुमें प्रचण्ड किरणोंसे तपते हुए सूर्यके तापको रोकना असम्भव है, उसी प्रकार मेरी त्वगिन्द्रियमें जो दूसरोंके आलिङ्गनकी लम्पटता आ गयी है, उसे मैं रोक नहीं सकता। मुने ! जैसे नयी-नयी घास चरनेकी इच्छा हरिणको विषम सङ्कटमें (तिनकोंसे ढके हुए कूपमें) डाल देती है, उसी प्रकार मेरी ये श्रवणशक्तियाँ सुमधुर शब्दोंके रसास्वादनकी अभिलाषा लेकर मुझे विषम संकटमें डाल देती हैं। विनम्र सेवकोंके मुखसे निकली हुई, प्रियकारिणी (आनन्ददायिनी), विनयपूर्ण तथा वाद्यगीतकी मधुर ध्वनिसे मिली हुई सुन्दर शब्द- सम्पत्तियोंका मैंने श्रवण किया है।

खनखनाते हुए मणियोंके आभूषण जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, ऐसी सुन्दरी स्त्रियों तथा जो अपनी सौन्दर्य-सम्पदासे सबके मनको हर लेती हैं, ऐसी राज्यलक्ष्मीयों, दिशाओं तथा समुद्र और पर्वतोंकी तटभूमियोंका मैंने बारंबार अवलोकन किया है। मैंने विनयशालिनी प्रियतमाओंद्वारा लाये गये, स्वादिष्ठ मधुर आदि रसोंके चमत्कारोंसे मनको मोह लेनेवाले तथा उत्तम गुणोंसे सुशोभित छः प्रकारके रसोंका चिरकालतक आस्वादन किया है। मैंने सब ओर भोगभूमियोंमें रेशमी मुलायम वस्त्रों, सुन्दर कामिनीयों, मनोहर हारों, फूल-बिछी शय्याओं तथा शीतल, मन्द, सुगन्ध हवाओंका बिना किसी विघ्न- बाधाके भलीभाँति स्पर्श (आलिङ्गन) प्राप्त किया है। मुने ! चन्दन, अगुरु आदि ओषधियों, भाँति-भाँति के फूलों तथा ढेर-के-ढेर कपूर एवं कस्तूरी आदिके संचयसे प्रकट होनेवाली सुगन्धोंका, जो मन्द-मन्द वायुसे प्रेरित होकर मेरी नासिकातक पहुँचती थीं, मैंने दीर्घकालतक अनुभव किया है। मैंने शब्द आदि विषयोंका बारंबार श्रवण, स्पर्श, दर्शन, रसास्वादन तथा सुगन्ध-सेवन किया है। पर अब तो तीव्र वैराग्यके कारण ये विषय मेरे लिये रसहीन हो गये हैं। अतः शीघ्र बताइये, अब मैं पुनः किस वस्तुका सेवन करूँ? चिरकालतक अकण्टक राज्य किया, सुन्दरियोंका उपभोग किया और शत्रुओंकी बड़ी भारी सेनाओंको मिट्टीमें मिला दिया। यह सब करके अब कौन-सी अपूर्व वास्तविक वस्तु शेष है, जिसकी प्राप्ति की जाय?

विषयोंकी इन दुरन्त वनश्रेणियोंमें इन्द्रियरूपी लुटेरोंने मुझे चिरकालतक उसी तरह ठगा है, जैसे धूर्त

५२२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

किसी भोले-भाले बच्चेको ठग लेते हैं। मतवाले हाथी ऐरावतके कुम्भस्थलको विदीर्ण कर देना सरल है; परंतु कुमार्गमें प्रवृत्त हुई अपनी इन इन्द्रियोंको रोकना सरल नहीं है। जो लोग जितेन्द्रिय तथा महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं, वे ही इस भूतलपर मनुष्य कहे जाने योग्य हैं, इनके अतिरिक्त शेष मानवोंको तो मैं मांसकी बनी हुई चलती-फिरती मशीनें समझता हूँ। भोगोंकी आशाका परित्याग कर देनेके सिवा दूसरे कोई ऐसे साधन नहीं हैं, जो इन्द्रियरूपी महान् रोगोंकी शान्ति कर सकें। इनकी शान्तिके लिये न तो ओषधियों, न तीर्थ और न मन्त्र ही लाभकारी सिद्ध होते हैं। जैसे विशाल वनमें बहुत-से-लुटेरे यात्रा करनेवाले अकेले पथिकको महान् कष्टमें डाल देते हैं, उसी प्रकार विषयोंकी ओर दौड़नेवाली इन इन्द्रियोंने मुझे अत्यन्त खेदजनक अवस्थामें पहुँचा दिया है। गहरे गड्ढे और इन्द्रियाँ एक-सी ही हैं, दोनों ही प्राणियोंको नीचे गिरानेमें अत्यन्त कुशल हैं। उनमें दोषरूपी विषधर सर्प वास करते हैं तथा इनमें विषयरूपी लाखों सूखे काँटे होते हैं। राक्षस और अपनी इन्द्रियाँ दोनों एक-से स्वभाववाले हैं। दोनों अपने ही पालन-पोषणमें तत्पर, अनार्य, दुःसाहसी तथा अन्धकारमें विहार करनेवाले होते हैं। जीर्ण बाँस आदिकी लकड़ियाँ और इन्द्रियाँ भीतरसे खोखली, निस्सार, टेढ़ी, गाँठवाली तथा एकमात्र जलानेके ही योग्य होती हैं। दुखियोंका उद्धार करनेवाले महामन् ! इस प्रकार इन इन्द्रियोंके कारण मैं विपत्तिके समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। मेरे पास आत्मरक्षाका कोई साधन नहीं है। आप स्वयं ही कृपा करके मेरा उद्धार कीजिये; क्योंकि संसारमें जो कोई भी श्रेष्ठ संत-महात्मा हैं, उनका समागम बड़े-से-बड़े शोकको हर लेनेवाला है, ऐसा सभी सत्पुरुष कहते हैं। (सर्ग ५-६)


भुशुण्डजीद्वारा विद्याधरको उपदेश—दृश्य-प्रपञ्चकी असत्ता बताते हुए संसार-वृक्षका निरूपण

भुशुण्डजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! विद्याधरके उस पवित्र वचनको सुनकर मैंने उसके प्रश्नके अनुसार सुस्पष्ट पदोंसे युक्त वाणीद्वारा उसे इस प्रकार उत्तर दिया—'विद्याधर ! यह बड़ी अच्छी बात है कि तुम अपने कल्याणके लिये जाग उठे हो। सौभाग्यका विषय है कि तुम्हें चिरकालके बाद संसाररूपी अन्धकारपूर्ण कूपसे ऊपर उठनेकी इच्छा हुई है। आज विवेकसे युक्त हुई तुम्हारी पवित्र बुद्धि अग्निसे व्याप्त सुवर्णकी भाँति अद्भुत शोभा पा रही है। मुझे विश्वास है कि विवेकसे निर्मल हुई तुम्हारी बुद्धि मेरी उपदेशवाणीके तात्पर्यको सुन्दर ढंगसे अनायास ही ग्रहण कर सकती है; क्योंकि स्वच्छ दर्पणमें पदार्थोंका प्रतिबिम्ब अनायास ही प्रकट हो जाता है। इस समय मैं जो कुछ कहूँ, वह सब तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिये; क्योंकि मैंने चिरकालतक अनुसन्धान करके इस विचारको निश्चित किया है। अतएव तुम्हें इस विषयमें कोई दूसरा विचार नहीं करना चाहिये। जो कुछ अहंकार आदि तुम्हारे अन्तःकरणमें प्रतीत हो रहा है, वह सब तुम नहीं हो। इन दृश्योंमें ही कोई आत्मा है, जिसे ढूँढ़कर प्राप्त करना है, ऐसा विचारकर यदि चिरकालतक अपने भीतर ढूँढ़ते रहोगे तो भी तुम्हें अपने स्वरूपभूत आत्माकी उपलब्धि नहीं होगी। इसलिये दृश्यमात्र ही जिसका लक्षण है, उस अज्ञानको छोड़कर तुम उसके साक्षीको आत्मा समझो।

जैसे मृगतृष्णामें जलकी प्रतीति होनेपर भी वास्तवमें वहाँ जल नहीं होता है, उसी प्रकार सारा विश्व अवस्तु-रूप होनेके कारण सद्रूपसे प्रतीत होनेपर भी असत् ही है। अथवा ऐसा समझो कि यह जो कुछ भासित होता है, वह सब ब्रह्म ही है या यों समझो कि वह कुछ

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * संसार-वृक्षके उच्छेदके उपाय तथा ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन * ५२३


भी नहीं है अथवा कोई अनिर्वचनीय वस्तु ही है। तुम अहन्ताको ही इस विश्वका बीज—मूलकारण समझो; क्योंकि उसीसे पर्वत, समुद्र, पृथ्वी और नदी आदिके सहित यह जगत्-रूपी वृक्ष प्रकट हुआ है और इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्तिरूपी रससे परिपूर्ण जो ऊपरके भुवन हैं, वे ही इस वृक्षके मूल भाग हैं। चारों युग इसमें लगे हुए घुन हैं। अज्ञान ही इसकी उत्पत्तिकी भूमि है। जीवमात्र इसपर बसेरे लेनेवाले करोड़ों पक्षी हैं। भ्रान्ति-ज्ञान इस वृक्षका विशाल तना है और तत्त्वज्ञानसे उपलब्ध होनेवाला मोक्ष ही इस वृक्षको दग्ध करनेवाली अग्नि है। इन्द्रियोंद्वारा विषयोंकी उपलब्धि और मनसे होनेवाले संकल्प-विकल्प आदि इस वृक्षके विविध भाँति-भाँतिके सौरभ (सुगन्ध) हैं। विशाल आकाश महान् वन है। ऋतुएँ इसकी विचित्र शाखाएँ हैं, दसों दिशाएँ उपशाखाएँ हैं। इस तरह संसाररूपी वृक्ष अपने मूलभागसे पातालको, मध्यभागसे सम्पूर्ण दिशाओंको और शिखाभागसे अन्तरिक्षको परिपूर्ण करके वास्तवमें असद्रूप होता हुआ भी सद्के समान प्रतीत होता है।

(सर्ग ७)


संसार-वृक्षके उच्छेदके उपाय, प्रतीयमान जगत्‌की असत्ता, ब्रह्ममें ही जगत्‌की प्रतीति तथा सर्वत्र ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन

भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! पातालसहित यह पृथ्वी जिसका आवार (मूलभाग) है, लोकालोकपर्यन्त फैले हुए पर्वतोंकी कन्दराएँ जिसकी वेदी हैं, ऐसा यह संसार-रूपी वृक्ष अहंकाररूप बीजसे उत्पन्न होता है। ज्ञानरूपी अग्निसे जब इसका बीज दग्ध हो जाता है, तब कुछ भी उत्पन्न नहीं होता। यहाँ जो कुछ प्रतीत हो रहा है, सब असत्य ही है। मायाके हाथी-घोड़ोंकी तरह कहींसे यों ही पैदा हो गया है। संकल्प-विकल्पको त्याग देनेमात्रसे इस संसार-भ्रमका नाश हो जाता है। शुद्धात्मन् ! तुम पहले पतनके हेतुभूत अविवेक-पदमें स्थित थे। किंतु अब उससे भिन्न उस पुण्यमयी दूसरी विवेक-पदवीको प्राप्त हो गये हो, जो तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली है। अतः मेरा अनुमान है कि इस मनके द्वारा अब फिर तुम नीचे नहीं गिरोगे। इसलिये तुम मन और वाणीकी चेष्टासे रहित, निर्मल, सच्चिदानन्द परमात्मपदका आश्रय लेकर सम्पूर्ण दृश्यसमूहको त्याग दो।

निष्पाप विद्याधर ! दृश्यको याद न रखते हुए सब प्रकारके तापसे शून्य एवं शान्त सच्चिदानन्दघन-स्वरूपसे स्थित रहो। अहंकारकी सत्ता नहीं है, इस भावनासे अहंकाररहित होकर यदि तुम्हारा चेतन-स्वरूप चिन्मय परमात्मामें पूर्णरूपसे मिलकर एक हो जाय तो दूसरी कोई प्रकाशित वस्तु है ही नहीं, फिर तुम्हारे स्वरूपभूत ब्रह्मकी किससे उपमा दी जाय।

चिन्मय परमात्मासे भिन्न माने गये इस जगत्‌के स्फुरणको तुम चिन्मय परमात्मासे ही उत्पन्न हुआ जानो; क्योंकि काष्ठ, जल और दीवार सबमें ही परब्रह्म परमात्मा विराजमान है। सभी स्थानोंमें सृष्टिका समूह परस्पर गुँथा हुआ स्थित है। ब्रह्म और जगत्‌में जो भेद कहा गया है, वह असत् है। जैसे सुवर्ण और कटकमें भेद नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्म और जगत्‌में भी भेद नहीं है।

(सर्ग ८-१०)

५२४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चिन्मय परब्रह्मके सिवा अन्य वस्तुकी सत्ताका निराकरण, जगत्की निःसारता तथा सत्सङ्ग, सत्-शास्त्र-विचार और आत्मप्रयत्नके द्वारा अविद्याके नाशका प्रतिपादन

भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! जैसे 'महाकाशमें घटाकाश उत्पन्न हुआ है' अपने मनसे इस तरहकी कल्पना करना भ्रममात्र ही है; उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें प्रपञ्चात्मक, असद्रूप अहंभावकी भावना केवल भ्रम ही है । सम्पूर्ण कल्पनाओंका अधिष्ठान वह ब्रह्म परम सूक्ष्म है । उसीकी कल्पना यह आकाश आदि जगत् है । देश, काल आदि जगत् तथा इसके सहस्रों अवान्तर कार्यरूपी विस्तारोंमें भी एकमात्र घन, सूक्ष्म, चिन्मय ब्रह्मके विस्तारके सिवा दूसरा कोई वास्तविक रूप हो, यह सम्भव नहीं है । चिन्मय परमात्माका विस्तार होनेसे ही काल, आकाश, नौका, जल, स्थल, निद्रा, जाग्रत् और स्वप्नमें भी जगत् उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता है। विद्याधर ! यह जगत् किसी पटपर अङ्कित हुए विशाल राज्यके चित्रके समान सुन्दर जान पड़ता है । इसमें सहस्रों खुर (पैर), मस्तक, नेत्र, हाथ और मुख, मुखोंकी चेष्टाएँ तथा तर्क-वितर्क दृष्टिगोचर होते हैं । इसमें परिमित जगहमें ही नाना प्रकारके पर्वत, शरीर, दिशा, देश और नदी आदि दृश्य वस्तुओंका चित्रण हुआ है । यह भीतरसे शून्य और निःसार है । अनेक प्रकारके रंगोंसे रँगा हुआ है । वैराग्य-मात्रके प्रकट होते ही इसका विनाश हो जाता है। इस चित्रमय जगत्‌में देवता, असुर, गन्धर्व, विद्याधर, बड़े-बड़े नाग और मनुष्य आदि प्राणी अङ्कित हैं । जैसे नूतन चित्र अंगुलियोंद्वारा किया गया मर्दन नहीं सह सकता, उसी तरह यह जगत् विचारको नहीं सहन कर पाता अर्थात् जैसे हाथसे रगड़नेपर चित्र मिट जाता है, उसी तरह विवेकपूर्वक विचार करनेपर यह जगत् भी नहीं टिक पाता है । मानसिक संकल्प-विकल्पसे ही यह प्रकाशमें आता है । हृदयको क्षुब्ध कर देनेवाली काम-वासनारूप जालके समूहोंसे निबद्ध, सम्पूर्ण आवर्त-रूपी विकारोंसे युक्त, स्त्री-पुत्र आदिमें फैलते हुए स्नेहसे मिश्रित तथा मिथ्या होनेके कारण अज्ञात विषयोंके बारंबार आस्वादनके द्वारा प्रसारको प्राप्त हुआ जो जीवात्माका संकल्प है, वह चित्रलिखित विशाल राज्यके रूपमें वर्णित यह संसार है । विद्याधर ! मन, अहंकार, बुद्धि आदि जो कुछ भी विकल्पक ज्ञान है, उस सबको तुम एकमात्र अविद्या ही समझो, जो पुरुष-प्रयत्नसे शीघ्र नष्ट हो जाती है ।

इतना प्रसंग सुनानेके बाद श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! संसार-सागरको पार करनेकी इच्छावाले विरक्त श्रेष्ठ पुरुषके साथ तथा परमात्मज्ञानीके साथ भी बैठकर इस संसारके विषयमें विवेकी मनुष्यको विचार करना चाहिये (कि यह क्या है ? इसका परिणाम, मूल और सार क्या है ? तथा इससे मुक्त होनेका क्या उपाय है ?)। विवेकी पुरुषको उचित है कि वह जहाँ-कहींसे भी विरक्त, ईर्ष्यारहित एवं परमात्मज्ञानी श्रेष्ठ पुरुषको ढूँढ़ निकाले और यत्नपूर्वक उसका संग और सेवा करे । ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान रखनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! तुम यह अच्छी तरह जान लो कि श्रेष्ठ पुरुषका संग सिद्ध हो जानेपर साधकको महान् श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त होती है, जिससे अविद्याका आधा भाग तत्काल नष्ट हो जाता है । इस प्रकार अविद्याका आधा भाग तो सत्संग-से नष्ट होता है और एक चौथाई भाग शास्त्रोंके तात्पर्यकी आलोचनासे दूर हो जाता है; फिर जो चतुर्थ भाग शेष रह जाता है, उसे मनुष्यको अपने प्रयत्नसे परमात्म-साक्षात्कारके द्वारा नष्ट कर देना चाहिये । यदि संसार-बन्धनसे मुक्त होनेकी एकमात्र उत्कट इच्छा उत्पन्न हो जाय तो वह इच्छा वैराग्यके द्वारा उस पुरुषको भोगों और उसके साधनोंसे दूर हटा देती है । भोग-इच्छाका नाश हो जानेपर अविद्याका चतुर्थ अंश अपने यत्नसे नष्ट

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास * ५२५


हो जाना है। सत्संग, शास्त्रोंके अर्थका विवेकपूर्वक विचार और अपना प्रयत्न—इन सब साधनोंकी एक साथ प्राप्ति होनेपर एक ही समयमें अथवा एक-एक साधनके प्राप्त होनेपर क्रमशः अविद्यारूपी मलका नाश होता है। अविद्याका नाश हो जाना ही जिसका एकमात्र स्वरूप है, ऐसा जो अविद्याकी निवृत्तिके पश्चात् तत्त्व शेष रहता है, उस नाम और अर्थसे रहित परम वस्तुको वास्तवमें नित्य सत्य होनेके कारण सत् और प्रतीत न होनेके कारण असत् भी कहा गया है। यह परमार्थ वस्तु आनन्दघन, जरा आदि विकारोंसे रहित, अनन्त और एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही है। संकल्पमात्रसे स्फुरित होनेवाला नाम-रूपात्मक जगत् तो वास्तवमें है ही नहीं। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयकी जो त्रिपुटी है, उसके मोहसे तुम सर्वथा रहित हो। अतः निर्वाण ब्रह्मरूपसे सर्वत्र व्याप्त हुए सदा शोकशून्य अवस्था में स्थित हो।

(सर्ग ११-१२)


त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास और उनके गृह, नगर, देश, लोक एवं त्रिलोकके साम्राज्यकी कल्पनाका विस्तार

भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! किसी समयकी बात है, कहीं किसी कल्पवृक्षमें उसकी युगल शाखामें ब्रह्माण्डरूपी गूलरका फल प्रकट हुआ। उसके भीतर तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंके राजा इन्द्र उसी तरह निवास करते थे, जैसे शहदके छत्तेमें मधु-मक्खियोंका स्वामी। वे गुरुके उपदेश और अपने अभ्याससे अविद्याके आवरणका नाश करके महात्मा हो गये थे। अपने अन्तःकरणमें सदा परमात्माके स्वरूपका चिन्तन करते रहते थे। पूर्वापरका ज्ञान रखनेवाले विद्वानोंमें उनका सबसे ऊँचा स्थान था। तदनन्तर एक समय प्रभावशाली भगवान् नारायण और शिव आदि, जब कहीं अपने लोकातीत परमधाममें विराजमान थे, उस समय उन देवराज इन्द्रने अकेले ही अस्त्र-शस्त्ररूपी अग्निज्वालाको धारण करनेवाले महापराक्रमी असुरोंके-साथ युद्ध किया, उसमें उनकी पराजय हुई और उन्हें तुरंत ही युद्धभूमिसे भागना पड़ा। शत्रु उनके पीछे पड़ गये थे; अतः वे बड़े वेगसे दसों दिशाओंमें भागते फिरे। उन्हें कहीं भी ऐसा आश्रय नहीं मिला, जहाँ वे विश्राम ले सकें। इतनेमें ही उनके शत्रुओंकी दृष्टि कहीं इधर-उधर चली गयी। उस समय इन्द्रको छिपनेके लिये थोड़ा-सा अवसर मिल गया। उन्होंने अपने संकल्पजनित स्थूल साकार रूपको शान्त करके अपने अन्तःकरणके भीतर ही सूक्ष्मभूतमें विलीन कर दिया और अत्यन्त अणुरूप होकर बाहर सूर्यकी किरणोंमें स्थित किसी त्रसरेणुके भीतर संकल्पमात्रसे प्रवेश किया, वहाँ उन्हें शीघ्र ही विश्राम प्राप्त हुआ। फिर तो उन्हें युद्धकी बात भूल गयी और इसीलिये वहाँसे बाहर निकलनेका संकल्प भी निवृत्त हो गया। वहाँ उन्होंने अपने रहनेके लिये एक घरकी कल्पना की और क्षणभरमें उन्हें अनुभव हुआ कि घरका निर्माण हो गया और मैं उसमें रह रहा हूँ। उस संकल्पकल्पित भवनके भीतर एक कमलके आसनपर बैठकर वे उसी तरह आनन्दका अनुभव करने लगे, जैसे अपने स्वर्गीय सदनमें सिंहासनपर बैठकर किया करते थे।

उस घरमें रहते हुए इन्द्रने एक ऐसा कल्पित नगर देखा, जिसके परकोटे और महल मणि, मोती तथा मूँगे आदिसे बने हुए थे। उस नगरके भीतर जाकर देवराजने जब इधर-उधर दृष्टिपात किया, तब उन्हें एक देश दिखायी दिया, जो अनेकानेक पर्वत, ग्राम, गोशाला, नगर और काननोंसे सुशोभित था। तत्पश्चात् वैसे ही संकल्पसे युक्त हुए इन्द्रने एक विराट् लोकका