भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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• निर्वाण-प्रकरण उ० ] * जीवन्मुक्तके द्वारा जगत्‌के स्वरूपका ज्ञान और स्वात्मभूत परमेश्वरकी पूजा * ५५३

रघुनन्दन ! जिसे संसारको क्षीण कर देनेवाले स्वाभाविक सत्य अर्थका साक्षात्कार हो गया है, वह पुरुष संकल्परहित हो जाता है; क्योंकि वह संकल्पको आत्मासे पृथक् जानता ही नहीं, इसलिये यह संकल्पाभास असत् है। जिसके आवरण क्षीण हो गये हैं और जिसकी सारी इच्छाएँ शान्त हो गयी हैं, वह परमानन्दरूपी अमृतसे परिपूर्ण हो जाता है और निरतिशयानन्द-स्वरूप ब्रह्म-सत्तासे ही सुशोभित होता है। जैसे पूर्णिमाके चन्द्रमासे सारा आकाश-मण्डल उदीत हो जाता है, वैसे ही जिसकी बुद्धि ज्ञानालोकसे प्रकाशित है और जो समस्त संदेहरूपी घोर अन्धकारात्मक कुहासेको छिन्न-भिन्न कर देनेके लिये वायुके समान है, उस पुरुषसे सारा देश उद्भासित हो उठता है। विचारजन्य तत्त्वज्ञानसे देखनेपर जिसका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता, वह सदाके लिये सत्ताहीन है; इसलिये जगत्‌का रूप स्वरूपरहित है और ब्रह्म स्वयं अपने ही रूपमें स्थित है।

श्रीराम ! जैसे स्वप्नद्रष्टा पुरुषको स्वप्न सत्-सा प्रतीत होता है, वैसे ही अज्ञानियोंकी दृष्टिमें मेरा शरीर भी सत् ही है; परंतु मेरी दृष्टिमें वह निश्चय ही उसी प्रकार असत् है, जैसे सुषुप्त पुरुषकी दृष्टिमें स्वप्न। उसके साथ जो मेरा व्यवहार होता है, वह व्यवहारमात्रके लिये ब्रह्म-स्वरूप ही है; परंतु वे जो कुछ देखते हैं, भले ही देखा करें, उनसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। मैं उनके वसिष्ठरूपमें तो कुछ नहीं हूँ, किंतु स्व-स्वरूपमें दृढतासे स्थित हूँ। यह व्यापक ब्रह्मसत्ता मानो तुम्हारे ही लिये वसिष्ठरूपसे प्रकट हुई है और मेरी यह वाणी भी ब्रह्म-सत्तारूप ही है। जिसे प्रतिकूल दुःख आदि भी अनुकूल प्रतीत होते हैं, उस शुद्ध ब्रह्मस्वरूप तत्त्वज्ञानीके हृदयमें न तो भोगोंकी इच्छा ही जाग्रत् होती है और न मोक्षकी ही। मनुष्योंका जो यह बन्धन और मोक्षका भ्रम है, यह तो स्वभावके ही अधीन है। यह संसार-पीड़ा तो मोहके कारण ही उत्पन्न हुई है। कैसा आश्चर्य है जो गौके खुरमें सागरका भ्रम हो रहा है। जब-जब ज्ञान-रूप सूर्य अपने पूर्ण प्रकाशसे स्थित होता है, तब-तब भोगरूपी अन्धकारका नाश हो जाता है और उनका अस्तित्व रहते हुए भी वह अनुभवमें नहीं आता। यों भोगान्धकारके नष्ट हो जानेपर बुद्धि आदि दृग्गोचर समूह अज्ञानकी सत्तासे रहित हो जाता है और ब्रह्माकार-वृत्तिके प्रकाशसे उद्भासित हो उठता है। इसलिये यह दीपकके प्रकाशकी तरह द्रव्यभूत होकर चारों ओर भासित होने लगता है। (सर्ग ३८-३९)

जीवन्मुक्तके द्वारा जगत्‌के स्वरूपका ज्ञान, स्वभावका लक्षण तथा विश्व और विश्वेश्वरकी एकता और स्वात्मभूत परमेश्वरकी पूजाका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! विषयभोग भवरूपी महान् रोग है, भाई-बन्धु आदि सुदृढ बन्धन हैं और धन-सम्पत्ति महान् अनर्थके कारण हैं—यों समझकर अपने द्वारा आत्मामें ही शान्ति-लाभ करना चाहिये। जैसे सुषुप्ति-अवस्थामें पड़े हुए पुरुषको स्वप्नका भान नहीं होता और स्वप्नद्रष्टाको सुषुप्तिका ज्ञान नहीं होता, वैसे ही ब्रह्मस्वरूपमें स्थित पुरुषको जगत्‌का भान नहीं होता और जगजालमें फँसा हुआ ब्रह्मस्वरूपसे अनभिज्ञ रहता है। परंतु जिसकी बुद्धि पूर्णतया शान्त हो गयी है तथा जो जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानी हैं, वह दृश्य और जगत्‌के प्रकाशमान रूपको वैसे ही जानता है, जैसे जागृत और स्वप्नद्रष्टाको क्रमशः उनके रूपकी जानकारी होती है। तत्त्वज्ञानीको इस सम्पूर्ण जगत्‌के यथार्थ स्वरूपका ठीक-ठीक ज्ञान हो जाता है, जिससे वह शरत्कालीन मेघके समान शुद्धात्मा होकर मनीषियोंके मान्य हो जाते हैं।

रामभद्र ! जैसे जहाँ सूर्य रहेंगे वहाँ प्रकाशका होना अवश्यम्भावी है, उसी प्रकार जहाँ तत्त्वज्ञानमयी बुद्धि होगी, वहाँ विषयोंसे पूर्ण वैराग्य रहेगा ही। जब सम्पूर्ण चित्त,