संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जो कर्ता, कर्म और करण आदि सामग्रियोंसे रहित, द्रष्टा, दृश्य और दर्शनसे शून्य तथा उपादेय पदार्थोंसे हीन है, दीवालरूपी आधारके बिना ही आविर्भूत हुआ है। तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो जानेसे जाग्रत्-कालमें जो राग और वासनासे रहित सुषुप्ति-अवस्था प्राप्त होती है, उसे तत्त्वज्ञ पुरुष स्वभाव कहते हैं, और उसमें परिनिष्ठित हो जाना मुक्ति कहलाती है। ऐसी निष्ठा प्राप्त हो जानेपर तत्त्वज्ञानीको कर्ता, कर्म और करणसे हीन, द्रष्टा, दृश्य और दर्शनसे शून्य तथा बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंसे रहित ब्रह्म जगद्रूपसे स्थित जान पड़ता है अर्थात् जगत् ब्रह्मस्वरूप ही प्रतीत होता है। उस समय उस ज्ञानीको ऐसा लक्षित होता है कि प्रकाशमान वस्तुमें प्रकाशमान वस्तु प्रकाशित हो रही है, पूर्णमें पूर्ण स्थित है और द्वैताद्वैतरहित प्रत्यगात्मामें द्वैताद्वैतशून्य ब्रह्म ही अखण्ड एकरस्रूपसे स्थित है। वस्तुतः तो ब्रह्मके सृष्टिरूपमें स्थित होनेपर भी आकाशमण्डलके सदृश शान्त एवं सत्यस्वरूप स्वयं परमात्मा ही अपने सत्यस्वरूपमें शिला-जठरकी भाँति अक्षुब्ध हुआ स्थित है। जैसे भविष्यमें जिस नवीन नगरका निर्माण करना होता है, उसका नक्शा पहलेसे ही चित्तमें वर्तमान रहता है, उसी तरह यह पूर्ण प्रकाशस्वरूप जगत् ब्रह्ममें ही स्थित है। जैसे गन्धर्वनगर एवं तल-मलिनता आदि दोषोंका बाध हो जानेपर आकाश अकस्मात् ही अपने शून्यस्वभावसे दीखने लगता है, उसी तरह तत्त्वज्ञान हो जानेपर जब सृष्टि उत्पत्ति-विनाशसे रहित मिथ्या सिद्ध हो जाती है, तब हठात् आनन्दघन ब्रह्म ही विशेषरूपसे भासित होने लगता है।
रघुकुलभूषण राम ! जैसे किसी सहायककी अपेक्षा किये बिना ही वायुमें स्पन्दन होता है और जैसे सूर्य आदिकी प्रभाका प्रसार होता है, वैसे ही यह जगत् परब्रह्म परमात्मामें स्थित है और उसीसे प्रादुर्भूत होता है। जैसे जलमें द्रवत्व, आकाशमें शून्यता और वायुमें स्पन्दन ओतप्रोत है, वैसे ही परब्रह्म परमात्मामें अनिर्वचनीय विवर्तरूप यह जगत् है। महाचिद्रूप महाकाशमें जो यह जगत् भासित होता है, वह चिद्रूप ही है, जो मणिमें उसकी निर्मलताकी तरह स्फुरित होता है। जैसे वायु और उसके स्पन्दनका भेद कथनमात्र है, वास्तविक नहीं, वैसे ही विश्व और विश्वेश्वरका भेद भी असत्-रूप ही है। जो तीनों कालोंमें सत् है और जिसमें द्वैतकी सम्भावना नहीं है, वह महाचिन्मात्रस्वरूप ब्रह्म ही विश्व-रूपमें भासता है। वास्तवमें तो न विश्व ही सत् है और न विश्वका स्वरूप ही। जो रूप ब्रह्मका है, वही रूप जगत्का है तथा जो रूप आकाशका है, वही रूप उसके गुण सारी शून्यताका है; फिर इनमें द्वैत-अद्वैतका होना असम्भव है। पत्थरपर खुदी हुई सेनामें पाषाणत्वकी तरह एकात्मा, सर्वव्यापक, निर्मल, चिन्मात्र, सर्वरूप परब्रह्म परमात्माके स्थित रहते कार्य-कारणकी विचित्रता कहाँसे और कैसे सम्भव हो सकती है तथा द्वैतके सम्भव न होनेके कारण आकाशमें आकाशशून्यता कैसे हो सकेगी।
वत्स राम ! ज्ञान-प्राप्तिके लिये पूर्ण विवेकरूपी उपचारसे यथाप्राप्त पूजन-सामग्रीद्वारा बुद्धिपूर्वक स्वभाव-रूप परमेश्वरकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि विचार, शम, सत्सङ्ग और त्यागरूपी पुष्पोंद्वारा पूजित हुआ परमेश्वर तुरत मोक्षरूपी फल प्रदान करता है। सज्जन-शिरोमणे ! वह परमेश्वर तो अपना आत्मा ही है। एक-मात्र यथार्थ अनुभवरूपी पूजन-सामग्रीसे पूजित होनेपर, जो सर्वोत्तम मोक्ष-फल प्रदान करनेवाला है, वह आत्मा-रूपी ईश्वर जहाँ वर्तमान है, वहाँ उसे छोड़कर भला, कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो किसी दूसरेका आश्रय ग्रहण करेगा। मनुष्यको अपने अन्दर शमरूपी अमृतके सिंचन-से विवेकको धीरे-धीरे ऐसा बढ़ाना चाहिये, जिससे वह विषयोंकी भ्रान्तिसे पुनः नष्ट न हो जाय। उसे चाहिये कि वह देहकी सत्ताकी अवहेलना करके उसमें स्थित तात्त्विक वस्तुका साक्षात्कार करे और लज्जा, भय,